वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने पृथ्वीलोक छोड़कर अपने परमधाम लौटने का निर्णय लिया, तब उनके साथ अयोध्या के प्रजाजन, वानर, रीछ, राक्षस, ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों ने भी अपने प्राण त्यागने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
श्रीराम ने उन्हें समझा-बुझाकर रोकना चाहा, लेकिन उनकी अनन्य भक्ति और दृढ़ संकल्प को देखकर अंततः उन्हें साथ चलने की अनुमति देनी पड़ी। किंतु, पाँच विशेष व्यक्तियों को श्रीराम ने जलसमाधि लेने की अनुमति नहीं दी और उन्हें पृथ्वी पर ही जीवित रहने का आदेश दिया।
लोग श्रीराम के साथ प्राण त्याग क्यों करना चाहते थे?
श्रीराम के साथ अपने शरीर का उत्सर्ग करने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण थे:
- अनन्य भक्ति: वे सभी श्रीराम के अनन्य भक्त थे और उनके बिना इस धरती पर जीवित रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
- मोक्ष की प्राप्ति: वे जानते थे कि श्रीराम के परमधाम पधारते समय ब्रह्मलोक (साकेत धाम) का द्वार खुला रहेगा। अतः बिना किसी कठिन तपस्या के उन्हें सहज ही वह परम पद प्राप्त हो जाएगा।
- अवतार कार्य की पूर्णता: रीछ और वानर आदि विभिन्न देवताओं, गंधर्वों तथा यक्षों के अंश से प्रकट हुए थे। उन्होंने ब्रह्मा जी के आदेश से श्रीराम की सेवा के लिए यह शरीर धारण किया था। श्रीराम के प्रस्थान के बाद उनका भूलोक पर रहने का उद्देश्य समाप्त हो चुका था।
वे 5 कौन थे जिन्हें जीवित रहने का आदेश मिला?
अन्य भक्तों की भाँति हनुमान जी, द्विविद, मैंद, जांबवान और राक्षसराज विभीषण ने भी श्रीराम से सरयू जल में शरीर त्याग करने की अनुमति माँगी। किंतु श्रीराम ने इन्हें रोकते हुए आदेश दिया— “तुम पाँचों तब तक जीवित रहो, जब तक कि प्रलय या कलियुग न आ जाए।”
इसके पश्चात् जब द्वापर युग के अंत में भगवान ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया, तब जांबवान, मैंद और द्विविद की मृत्यु हुई। जबकि हनुमान जी और विभीषण आज भी कलियुग में जीवित हैं और प्रलयकाल तक रहेंगे।
1. विभीषण को धरती पर रहने का आदेश
सुग्रीव की भाँति विभीषण भी श्रीराम के अंतिम दर्शन करने औ

र उनके साथ ही शरीर त्यागने की लालसा में अयोध्या आए थे। किंतु श्रीराम ने उन्हें अनुमति न देते हुए आदेश दिया कि वे लंका में भगवान विष्णु की निरंतर आराधना करते हुए धर्मपूर्वक राज्य का पालन करें। हालांकि, उनके साथ आए कुछ अन्य राक्षसों को श्रीराम ने अपने साथ जलसमाधि लेने की अनुमति दे दी थी।
विभीषण ने लंका में वैष्णव धर्म की स्थापना करते हुए लंबे समय तक शासन किया। वे सप्तचिरंजीवियों में से एक हैं और आज भी जीवित हैं।
2. हनुमान जी को अमरता का आदेश
हनुमान जी के लिए श्रीराम का स्पष्ट आदेश था— “तुमने दीर्घकाल तक जीवित रहने का निश्चय किया है, अपनी इस प्रतिज्ञा को व्यर्थ न करो। जब तक संसार में मेरी कथाओं का प्रचार-प्रसार रहेगा, तब तक तुम मेरी आज्ञा का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरण करो।”
हनुमान जी ने प्रभु की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया। माना जाता है कि आज भी जहाँ कहीं भी श्रीराम कथा या संकीर्तन होता है, वहाँ हनुमान जी किसी न किसी रूप में उपस्थित रहते हैं।
3. मैंद और द्विविद
ये दोनों सुग्रीव के पराक्रमी सेनापति थे और इन्होंने राम-रावण युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाई थी। ये श्रीराम के परम भक्त थे। किंतु श्रीराम की आज्ञानुसार ये द्वापर युग तक जीवित रहे। आगे चलकर श्रीकृष्ण अवतार के समय कालचक्र के प्रभाववश इन्होंने श्रीकृष्ण से शत्रुता की और मारे गए।
4. ऋक्षराज जांबवान
रीछराज जांबवान भी श्रीराम के महान भक्त थे। वे भी द्वापर युग तक जीवित रहे। किंतु श्रीकृष्ण अवतार के समय वे अपने आराध्य देव को तुरंत पहचान नहीं सके, जिसके कारण स्यमंतक मणि को लेकर श्रीकृष्ण और जांबवान के बीच 21 दिनों तक भयंकर द्वंद्व युद्ध हुआ।
जब जांबवान जी को अहसास हुआ कि श्रीकृष्ण ही उनके प्रभु श्रीराम हैं, तब उन्होंने युद्ध रोककर क्षमा माँगी। उन्होंने स्यमंतक मणि और अपनी पुत्री जांबवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। देवी जांबवती आगे चलकर श्रीकृष्ण की आठ प्रमुख पटरानियों में से एक बनीं।
