वस्त्र-हरण प्रसंग
गोपियों की कृष्णभक्ति को प्रेम-क्रीड़ा का रूप भागवत के जिस प्रसंग के आधार पर दिया गया है, उनमें से पहला प्रसंग यही है—अर्थात गोपियों द्वारा उन्हें पति रूप में पाने के लिए व्रत रखना और कृष्ण द्वारा उनके वस्त्रों को चुराना। इस प्रसंग पर अनेक विचार और मत दिए गए हैं, पर उससे पहले यह देखते हैं कि यह प्रसंग भागवत में किस प्रकार वर्णित किया गया है।
कुमारी गोपकन्याओं द्वारा कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए व्रत
शरद ऋतु के बाद हेमंत ऋतु आई। हेमंत ऋतु के प्रथम मास (अर्थात मार्गशीर्ष यानी अगहन) में ब्रज की कुमारी कन्याएँ एक महीने तक बड़ी निष्ठा और श्रद्धा से देवी कात्यायनी के लिए कठिन व्रत रखती थीं। इस बार भी ब्रज की कुमारी कन्याएँ देवी कात्यायनी की पूजा और व्रत करने लगीं।
एक महीने तक इस व्रत का पालन करते हुए वे भद्रकाली की पूजा करती थीं और उनसे श्यामसुंदर श्रीकृष्ण को पति के रूप में माँगती थीं। वे सब आपस में श्रीकृष्ण की लीला और उनके नामों का गान करते हुए यमुना जल में स्नान करने के लिए जाती थीं।
श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों का वस्त्र चुराना

कात्यायनी देवी के व्रत के दौरान एक दिन सब कुमारियों ने प्रतिदिन की भाँति यमुना के तट पर अपने-अपने वस्त्र उतार दिए और भगवान श्रीकृष्ण के गुणों का गान करती हुई बड़े आनंद से जल-क्रीड़ा करने लगीं।
भगवान से गोपियों की अभिलाषा छिपी नहीं थी। उनका अभिप्राय जानकर, अपने सखा ग्वालबालों के साथ उनकी साधना सफल करने के लिए वे यमुना तट पर पहुँचे। यद्यपि ग्वालबाल भी उनके साथ थे, पर उन्होंने अकेले ही गोपियों के वस्त्र उठा लिए और एक ऊँचे कदंब के वृक्ष पर चढ़ गए। अन्य ग्वालबालों ने वस्त्र नहीं लिए थे। बाद में कृष्ण को छोड़कर अन्य ग्वालबाल वहाँ से चले गए।
श्रीकृष्ण और ग्वालबाल हँसते हुए गोपियों से परिहास की बातें कहने लगे, “तुम यहाँ आकर इच्छा हो तो अपने-अपने वस्त्र ले जाओ। मैं तुम लोगों से सच-सच कहता हूँ, हँसी बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ। तुम लोग व्रत करते-करते दुबली हो गई हो। तुम्हारी इच्छा हो तो अलग-अलग आकर या एक साथ ही आकर अपने वस्त्र ले जाओ।”
उनकी ये मसखरी भरी बातें सुनकर गोपियाँ प्रेम से सरोबार हो गईं, लेकिन वे जल से बाहर नहीं आईं। वे जल में कण्ठ तक डूबी हुई थीं और ठंड से काँप रही थीं।
उन्होंने श्रीकृष्ण से उनके वस्त्र लौटा देने की याचना की। उन्होंने स्वयं को उनकी दासी बताते हुए कहा कि जो कृष्ण कहेंगे, वे वैसा ही करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, “तुम तो धर्म का मर्म भली-भाँति जानते हो। हमें कष्ट मत दो, हमारे वस्त्र हमें दे दो, नहीं तो हम जाकर नंदबाबा से कह देंगी।”
श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों के दोष का परिमार्जन
श्रीकृष्ण के कहने पर गोपियाँ अपने हाथों से गुप्तांगों को छुपाकर जल से बाहर आईं। श्रीकृष्ण ने उनसे अब गंभीरता से कहा—
“अरी गोपियों! तुमने जो व्रत लिया है, उसे अच्छी तरह से निभाया है—इसमें संदेह नहीं। परंतु इस अवस्था में वस्त्रहीन होकर तुमने जल में स्नान किया है, इससे जल के अधिष्ठाता देव वरुण और यमुनाजी का अपराध हुआ है। अतः इस दोष की शांति के लिए तुम अपने हाथ जोड़कर सिर से लगाओ और उन्हें झुककर प्रणाम करो, फिर अपने-अपने वस्त्र ले जाओ।”
श्रीकृष्ण की ये बातें सुनकर गोपियों ने माना कि वस्त्रहीन होकर स्नान करने से उनके व्रत में त्रुटि आ गई है। अतः अपने व्रतों की निर्विघ्न पूर्ति के लिए उन्होंने समस्त कर्मों के साक्षी श्रीकृष्ण को प्रणाम किया, क्योंकि उन्हें प्रणाम करने से ही समस्त त्रुटियों और अपराधों का मार्जन हो जाता है। इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके वस्त्र लौटा दिए।
ब्रजकुमारी गोपियों ने कृष्ण के इस व्यवहार का बुरा नहीं माना, बल्कि वे अत्यधिक प्रसन्न हुईं। क्योंकि एक तो कृष्ण ने उनके व्रत की त्रुटि दूर कर दी थी, और दूसरे—वे तो उनके इष्ट थे ही, जिन्हें पाने के लिए वे व्रत कर रही थीं।
गोपियों की मनोकामना पूर्ति का वरदान
दूसरी तरफ, श्रीकृष्ण भी उनके मन की भावनाओं को भली-भांति जानते थे। उन्होंने उन गोपियों से कहा, “तुम्हारी साधना सिद्ध हो गई है। तुम आने वाली शरद ऋतु की रात्रि में मेरे साथ विहार करोगी। सतियों! इसी उद्देश्य से तुम लोगों ने यह व्रत और कात्यायनी देवी की पूजा की थी।”
उनकी आज्ञा पाकर वे सभी गोप-कुमारियाँ श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने की इच्छा न होने पर भी अपने-अपने घरों को लौट गईं। अपने इसी वचन को पूरा करने के लिए कृष्ण ने उनके साथ शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात्रि को रास किया था।
वस्त्र-हरण विषयक विवाद और विचार
इस प्रसंग के विषय में अनेक शंकाएँ और विचार व्यक्त किए जाते हैं, लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि:
गोपियों ने कृष्ण के व्यवहार को गलत नहीं माना, बल्कि अपनी गलती स्वीकार करते हुए उनके द्वारा त्रुटि बताए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की।
इस समय श्रीकृष्ण की आयु मात्र छह-सात वर्ष की थी।
गोपियाँ उन्हें ही पति रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत कर रही थीं और उन्होंने स्वयं को श्रीकृष्ण के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दिया था।
श्रीकृष्ण का प्रेम और भक्ति ही उनके जीवन का आधार था। यह समर्पण पूरी तरह आध्यात्मिक था और इसमें कोई भौतिक कामना नहीं थी। अन्यथा, सभी गोपियाँ एक साथ कृष्ण को पाने के लिए व्रत कर रही थीं, लेकिन किसी ने न तो अपनी भावना एक-दूसरे से छुपाई और न ही किसी के मन में कोई ईर्ष्या की भावना थी।
श्रीकृष्ण ने अपनी किसी भी लीला में कभी किसी सामाजिक और धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया था।
उन्होंने वस्त्रहीन होकर स्नान करने से व्रत में आए दोष का मार्जन करने तथा जल में इस प्रकार स्नान को धर्मविरुद्ध मानने की शिक्षा देने के लिए ही ऐसा किया था। जल-विहार करते समय निर्वस्त्र खड़े रहने के कारण ही नलकुबेर और मणिग्रीव को नारद जी ने वृक्ष बनने का शाप दिया था, जो आगे चलकर यमलार्जुन के वृक्ष बने और जिनका उद्धार श्रीकृष्ण ने किया था। उसी अपराध की तरफ कृष्ण ने गोपियों का ध्यान एक साधारण हँसी-मज़ाक के माध्यम से दिलाया था।
कृष्ण उस स्थान पर अपने ग्वालबाल सखाओं के साथ आए थे, लेकिन बाद में उनके सभी सखा वहाँ से चले गए थे। उन्होंने वस्त्र अकेले ही लिए थे, यानी उन्होंने गोपियों को उनकी गलती तो बताई, पर उन्हें किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष अपमानित नहीं किया था।
गोपियों की कृष्णभक्ति: स्वरूप और भागवत कथा का वर्णन – भाग 20
श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण पत्नियों से क्यों भोजन माँगा? – भाग 22




