माता सीता के परित्याग और विशेष रूप से उनके भूगर्भ में समा जाने के पश्चात् श्रीराम अपने व्यक्तिगत जीवन में अत्यंत दुखी और व्यथित रहने लगे थे। किंतु उन्होंने अपने इस व्यक्तिगत शोक को कभी भी राजकीय, प्रशासनिक या धर्मकार्यों में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने लव और कुश का पालन-पोषण एक आदर्श पिता की भांति किया, फिर भी उनका अधिकांश समय राज्य की सेवा और धार्मिक अनुष्ठानों में ही व्यतीत होता था।
राम राज्य की प्रशासनिक एवं प्रजापालक विशेषताएँ
श्रीराम के शासनकाल की प्रशासनिक और राजनीतिक कुशलता के कारण ‘रामराज्य’ विश्वभर में प्रसिद्ध और अत्यंत लोकप्रिय हुआ। श्रीराम अपनी प्रजा के हर सुख-दुख में सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे। वे प्रजाजन के लिए हर समय सुलभ थे; किसी भी नागरिक को उनके दर्शन या न्याय पाने के लिए प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी।
राम राज्य में न तो कोई प्राकृतिक आपदा आती थी और न ही किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु होती थी। प्रकृति सदैव अनुकूल रहती थी, खेत भरपूर अन्न पैदा करते थे और समस्त प्रजा धन-धान्य से समृद्ध थी। किसी भी नागरिक को दैहिक, दैविक या भौतिक ताप (कष्ट) नहीं झेलना पड़ता था।
कालचक्र के अनुसार, समय बीतने पर कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी जी साकेत धाम पधार गईं। श्रीराम ने अपनी माताओं का विधि-विधान से श्राद्ध-कर्म संपन्न किया। इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते हुए श्रीराम को ग्यारह हजार वर्ष व्यतीत हो गए।
श्रीराम की विदेश नीति और न्यायप्रियता
अपार समृद्धि, अतुलित सैन्य बल और शक्ति होने के बावजूद श्रीराम ने कभी किसी अन्य राजा का राज्य अन्यायपूर्वक नहीं हड़पा। उन्होंने कभी कोई अनावश्यक युद्ध नहीं किया। उस काल के सभी जनपदों और राज्यों से श्रीराम के राजनीतिक व कूटनीतिक संबंध अत्यंत मधुर थे। यद्यपि उन्होंने कई नए राज्यों और सुंदर नगरों की स्थापना की, किंतु ये राज्य किसी राजा को पीड़ित या विस्थापित करके नहीं बसाए गए थे। यही राम राज्य की सबसे बड़ी विशेषता थी।
पारिवारिक स्नेह और राजकुमारों का राज्य विस्तार

अपने भाइयों और सगे-संबंधियों के प्रति श्रीराम का स्नेह जीवनभर एक समान बना रहा। श्रीराम और उनके तीनों भाइयों के दो-दो पुत्र हुए:
- श्रीराम: कुश और लव
- भरत जी: तक्ष और पुष्कल
- लक्ष्मण जी: अंगद और चंद्रकेतु
- शत्रुघ्न जी: सुबाहु और शत्रुघाती
ये सभी आठों राजकुमार अपने पितरों की भांति ही धर्मनिष्ठ, पराक्रमी और सद्गुणी थे। श्रीराम ने अपने भाइयों के पुत्रों के लिए नए राज्यों का निर्माण करवाया, किंतु यह सुनिश्चित किया कि इसमें किसी के साथ अन्याय न हो।
नए राज्यों और नगरों का निर्माण
1. शूरसेन राज्य (शत्रुघ्न जी के पुत्र)
शत्रुघ्न जी ने पूर्व में ही श्रीराम के आदेशानुसार यमुना तट पर उपद्रव मचाने वाले लवणासुर का वध करके शूरसेन राज्य की स्थापना की थी। बाद में उन्होंने दो राजधानियाँ बनाकर इसे अपने दोनों पुत्रों (सुबाहु और शत्रुघाती) में विभाजित कर दिया।
2. तक्षशिला और पुष्कलावत (भरत जी के पुत्र)
केकेय देश के राजा युधाजित (भरत जी के मामा) ने अपने पुरोहित ब्रह्मर्षि गार्ग्य के हाथों श्रीराम के पास संदेश भेजा। उन्होंने सिंधु नदी के दोनों तटों पर बसे गंधर्व देश के राजा शैलुष गंधर्व को पराजित कर वहाँ नए नगर बसाने का सुझाव दिया।
श्रीराम ने भरत जी को उस क्षेत्र को जीतने का आदेश दिया। भरत जी ने अयोध्या में ही अपने पुत्रों तक्ष और पुष्कल का राज्याभिषेक किया और गंधर्वों को परास्त कर दो अत्यंत सुंदर नगर बसाए— तक्षशिला (राजा तक्ष) और पुष्कलावत (राजा पुष्कल)।
3. कारूपथ और मल्ल देश (लक्ष्मण जी के पुत्र)
श्रीराम ने लक्ष्मण जी के पुत्रों के लिए राज्य चुनते समय स्पष्ट निर्देश दिया था— “ऐसा क्षेत्र चुना जाए जिससे किसी अन्य राजा को कष्ट न हो, आश्रमों का विनाश न हो और हम पर अन्याय का दोष न आए।”
भरत जी के सुझाव पर कारूपथ देश को चुना गया। अयोध्या में ही अंगद और चंद्रकेतु का राज्याभिषेक किया गया। अंगद के लिए अंगदिया नगर और कुश्ती (मल्लविद्या) में निपुण चंद्रकेतु के लिए चंद्रकान्ता नगर बसाया गया, जो आगे चलकर मल्ल देश कहलाया। लक्ष्मण और भरत एक वर्ष तक इन राजकुमारों के साथ रहकर राज्य संचालन में उनका सहयोग करते रहे।
विश्वबंधुत्व और महाप्रयाण
श्रीराम के 11,000 वर्षों के लंबे शासनकाल में न तो देश के भीतर कोई असंतोष था और न ही विदेशों से कोई शत्रुता। सुग्रीव, विभीषण आदि सुदूर देशों के राजाओं से उनकी प्रगाढ़ मित्रता आजीवन बनी रही। तीनों भाई धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए सुखपूर्वक अयोध्या में रहे।
अंततः समय आने पर चारों भाइयों ने एक साथ ही इस धरा से विदा ली। श्रीराम की लोकप्रियता इतनी अगाध थी कि उनके प्रस्थान के समय प्राणियों के एक बहुत बड़े समूह ने उनके साथ सरयू नदी में जलसमाधि ले ली।
यदि आपने इस श्रृंखला का पिछला भाग नहीं पढ़ा है, तो पढ़ें: श्रीराम ने लक्ष्मण का परित्याग क्यों किया था? (भाग 71)“
