रास और महारास लीला कब हुआ था?
भागवत में एक ही रात्रि—यानि शरद पूर्णिमा की रात्रि का वर्णन है, जब कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला की थी। इस लीला को दो भागों में बाँटा गया है—रास और महारास। यह वर्णन इस प्रकार है:
रास लीला का वचन
श्रीकृष्ण ने गोपियों के वस्त्र-हरण के समय उनकी इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें एक रात्रि का संकेत दिया था। गोपियाँ भी इसी रात्रि की प्रतीक्षा कर रही थीं। शरद ऋतु में पूर्णिमा की रात्रि सभी प्रकार से सुहावनी थी। भगवान ने अपने उस वचन को पूरा करने का संकल्प किया। स्वयं आत्माराम (पूर्णकाम) होने पर भी वे प्रेमियों की इच्छा पूरी करने के लिए अपने संकल्प को साकार करते हैं।

बाँसुरी की धुन पर गोपियों का कृष्ण के पास आना
श्रीकृष्ण ने अपनी बाँसुरी पर ब्रज की गोप-कन्याओं के मन को हरने वाली कामबीज “क्लीं” की अस्पष्ट एवं मधुर तान छेड़ी। यद्यपि इन गोप-कन्याओं का मन तो पहले से ही उनके वश में था, लेकिन इस ध्वनि ने उनका भय, संकोच, धैर्य और लोक-मर्यादा का ज्ञान भी हर लिया।
बाँसुरी की इस ध्वनि को सुनकर सभी कन्याएँ अत्यंत वेग से उस स्थान की ओर चल पड़ीं। यद्यपि उन सबने अलग-अलग भी श्रीकृष्ण को पति-रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत और साधना की थी, लेकिन उस समय उन्हें अपनी किसी भी सखी का भान नहीं रहा और वे सब अकेली ही श्रीकृष्ण की तरफ तेजी से दौड़ पड़ीं।
ये गोपियाँ उस समय अपने घरों में जो भी कार्य कर रही थीं, उसे ज्यों-का-त्यों छोड़कर भागी चली आईं। कोई दूध दुह रही थी, तो कोई भोजन बना रही थी, कोई भोजन परोस रही थी, कोई छोटे बच्चों को दूध पिला रही थी, कोई पति की सेवा कर रही थी, तो कोई शृंगार कर रही थी। वे अपने ये सभी कार्य छोड़कर जिस अवस्था में थीं, उसी तरह भागीं। पिता, पति, भाई और बंधु-बांधवों के रोकने पर भी वे नहीं रुक पाईं।
जो गोपियाँ घरों के अंदर थीं और जिन्हें बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिला, उन्होंने वहीं अपनी आँखें बंद कर लीं और श्रीकृष्ण के रूप-माधुर्य तथा उनकी लीलाओं का मानसिक ध्यान करने लगीं। ध्यान में ही श्रीकृष्ण उनके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने मन-ही-मन बड़े प्रेम और आवेग से उनका आलिंगन किया। परमात्मा के उस दिव्य आलिंगन से उनके पुण्य और पापमय शरीर का परित्याग हो गया और उन्होंने वह दिव्य शरीर प्राप्त कर लिया, जिससे वे भगवान की लीलाओं में सम्मिलित हो सकती थीं।
कृष्ण द्वारा गोपियों की परीक्षा
गोपियों को अपने पास आया हुआ देख कर श्रीकृष्ण ने विनोदभरी वाक्चातुरी से उनका स्वागत किया, उनकी कुशलता पूछी और उनके वहाँ आने का कारण पूछा। उन्होंने रात के समय वन में खतरों और उनके घरवालों के परेशान होने का हवाला देकर उन्हें वापस लौटने के लिए कहा। उन्होंने स्त्रियों का धर्म समझाते हुए कहा कि कुलवधुओं को घर पर रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान की लीलाओं को सुनने, उनके रूप के दर्शन और ध्यान से उनके प्रति जैसी अनन्य भक्ति की प्राप्ति होती है, वैसी उनके समीप भौतिक रूप से रहने से भी नहीं होती है, इसलिए गोपियों को अपने घरों को लौट जाना चाहिए।
श्रीकृष्ण के ये अप्रिय वचन सुनकर गोपियाँ उदास और खिन्न हो गईं। वे कुछ बोल नहीं सकीं और चुपचाप खड़ी रहीं। जिस कृष्ण के लिए उन्होंने अपनी सारी कामनाएँ और सारे सांसारिक भोग छोड़ दिए थे, उनके ऐसे वचन सुनकर उनकी आँखों से अविरल धारा बहने लगी। उन्होंने रुँधे गले से कहा कि “हे कृष्ण! तुम तो घाट-घाट के वासी हो और हमारे हृदय की बात भली-भांति जानते हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणों से प्रेम करती हैं। तुम स्वतंत्र और हठीले हो और तुम पर हमारा कोई वश नहीं है। फिर भी, तुम अपनी ओर से हमें वैसे ही स्वीकार कर लो, जैसे आदि पुरुष भगवान नारायण कृपा करके अपने मुमुक्षु भक्तों को अपनाते हैं।”
गोपियों ने कातर स्वर में उनसे अनेक प्रकार से निवेदन किया। गोपियों की व्यथित और व्याकुल वाणी सुनकर श्रीकृष्ण द्रवित हो गए।
गोपी-कृष्ण की क्रीड़ा या रास लीला
यद्यपि भगवान आत्माराम हैं और अपने-आप में ही पूर्ण आनंदित रहते हैं, उन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य बाह्य वस्तु की अपेक्षा नहीं होती, फिर भी उन्होंने हँसकर गोपियों के साथ दिव्य क्रीड़ा आरंभ की। अपने स्वरूप में एकरस स्थिर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी भाव-भंगिमाएँ और चेष्टाएँ गोपियों के अनुकूल कर लीं। गोपियों से घिरे हुए और वैजयंती माला पहने हुए श्रीकृष्ण की शोभा ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे तारों के बीच चंद्रमा सुशोभित हो रहा हो।
श्रीकृष्ण और गोपिकाएँ वृंदावन की कुंजों को शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे। कभी गोपियाँ श्रीकृष्ण के गुणों और लीलाओं का गान करतीं, तो कभी श्रीकृष्ण गोपियों के प्रेम और सौंदर्य के गीत गाते। इसके पश्चात सभी यमुना तट पर आए और श्रीकृष्ण तरह-तरह की क्रीड़ाओं से उन्हें आनंदित करने लगे।
गोपियों को श्रीकृष्ण का विरह
श्रीकृष्ण ने रास-लीला करते हुए जब गोपियों को अत्यधिक सम्मान दिया, तो इससे उनमें यह अहंकार आ गया कि वे समस्त स्त्रियों में श्रेष्ठ हैं। उनके इस अहंकार को ताड़कर भगवान उनके बीच से अचानक अंतर्ध्यान हो गए।
श्रीकृष्ण को अपने पास नहीं पाकर गोपियाँ अत्यंत व्याकुल हो गईं। कृष्ण-प्रेम के मद में मतवाली होकर गोपियाँ स्वयं श्रीकृष्णमय हो गईं। वे श्रीकृष्ण की विभिन्न चेष्टाओं का अनुकरण करने लगीं। उनका अनुकरण करते हुए गोपियों की भाव-भंगिमाएँ और चाल-ढाल बिल्कुल श्रीकृष्ण जैसी हो गई। वे अपने आपको भूलकर यही अनुभव करने लगीं कि “मैं ही कृष्ण हूँ”।
वे सभी मिलकर ऊँचे स्वर में श्रीकृष्ण के गुणों का गान करने लगीं और एक वन से दूसरे वन तथा एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी में उन्हें ढूँढने लगीं। वे वनस्पतियों से उनका पता पूछने लगीं। श्रीकृष्ण को ढूँढते-ढूँढते वे अत्यंत कातर हो चुकी थीं। भाव का आवेश और अधिक प्रगाढ़ होने पर वे श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का जीवंत अभिनय करने लगीं—कोई कृष्ण बनी, तो कोई पूतना, कोई तृणावर्त बनी, तो कोई बालकृष्ण की लीला करने लगी, कोई बाँसुरी बजाकर गायों को बुलाने लगी। इस प्रकार सभी गोपियाँ पूरी तरह कृष्णमय हो गईं।
कृष्ण के पदचिह्नों का अनुकरण
इसी समय उन्हें एक स्थान पर श्रीकृष्ण के चरण-चिह्न दिखाई दिए। जब वे उन चिह्नों के साथ आगे बढ़ीं, तो उन्हें उनके साथ किसी ब्रज-युवती के भी पद-चिह्न दिखाई दिए। इसे देखकर वे और अधिक व्याकुल हो गईं और आपस में कहने लगीं कि यह कौन भाग्यशालिनी ‘आराधिका’ है, जिससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण हमें छोड़कर उसके साथ एकांत में समय बिताने के लिए चले गए हैं!
कुछ दूर चलने के बाद उस गोपी के पैर के निशान दिखना बंद हो गए और केवल श्रीकृष्ण के पैरों के निशान अधिक गहरे हो गए। इससे गोपियों ने अनुमान किया कि श्रीकृष्ण ने अपनी उस प्रेयसी को अपने कंधों पर उठा लिया होगा। एक स्थान पर उन्होंने अनुमान लगाया कि यहीं श्रीकृष्ण ने अपनी प्रेयसी के लिए फूल तोड़े होंगे और उसकी चोटी में लगाए होंगे। इस प्रकार गोपियाँ श्रीकृष्ण के पैरों के निशानों को देखते हुए अपनी सुध-बुध खोकर एक वन से दूसरे वन में भटक रही थीं।
गोपी का अभिमान टूटना और पछतावा
इधर श्रीकृष्ण सभी गोपियों को छोड़कर जिस एक गोपी को अपने साथ ले गए थे, उसे भी यह अभिमान हो गया कि वह अन्य गोपियों से श्रेष्ठ है, इसलिए कृष्ण ने उसे सबसे अधिक सम्मान दिया है। रास्ते में उसने अपने थके होने का कारण बताकर कृष्ण से स्वयं को अपने कंधों पर उठाने के लिए कहा। जब वह उनके कंधे पर बैठने लगी, उसी क्षण श्रीकृष्ण अंतर्ध्यान हो गए।
यह गोपी संभवतः श्री राधा जी हो सकती हैं, यद्यपि श्रीमद्भागवत में सीधे तौर पर राधाजी के नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इस एक प्रसंग के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा प्रत्यक्ष वर्णन नहीं है जिससे यह पता चले कि सभी गोपियों में कोई एक गोपी कृष्ण को सबसे अधिक प्रिय थी। इसी एक संकेत के आधार पर आगे चलकर अनेक साहित्यिक और काव्य-ग्रंथों में राधा का एक संपूर्ण और अलौकिक चरित्र विकसित हुआ।
इधर वह गोपी रोने और पछताने लगी तथा दुखी होकर अचेत हो गई। तब तक बाकी गोपियाँ भी चरणों के निशान ढूँढते हुए वहीं आ पहुँचीं। उन्होंने उस सखी को जगाया। तब उस सखी ने उन सबको बताया कि उसे श्रीकृष्ण का अपार प्रेम और सम्मान प्राप्त हुआ था, किंतु उसके अहंकार के कारण श्रीकृष्ण अंतर्ध्यान हो गए हैं।
इसके बाद वे सब श्रीकृष्ण को ढूँढते हुए उस सीमा तक गईं जहाँ तक चाँदनी फैली हुई थी, किंतु उसके आगे घने वृक्षों और वनस्पतियों के कारण सघन अंधकार था। उन्होंने सोचा कि यदि वे उन्हें और आगे ढूँढने गईं, तो श्रीकृष्ण और आगे चले जाएँगे, इसलिए वे उससे आगे नहीं बढ़ीं।
गोपियाँ पूरी तरह श्रीकृष्णमय हो चुकी थीं। उन्हें श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी और बात की सुध नहीं थी—यहाँ तक कि अपने शरीर की भी सुध नहीं रही, ऐसे में उन्हें घर की याद कैसे आती! वे सभी यमुना जी के तट पर ‘रमणरेती’ वाले स्थान पर लौट आईं और साथ मिलकर श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का गान करने लगीं। यही करुणामय और प्रेम से सरोबार गीत ‘गोपी-गीत’ कहलाया।




