कृष्ण के रास लीला की विभिन्न व्याख्याएँ
रास-लीला की अनेक तरह से व्याख्या की गई है। ‘रास’ शब्द ‘रस’ से निकला है। इसे भगवान के लीलरूपी रस या उनकी कला का रस माना जा सकता है। रास-लीला के समय आयु के अनुसार श्रीकृष्ण अभी बालक ही थे और गोपियाँ उनसे उम्र में बड़ी थीं, अतः साधारण स्त्री-पुरुष की क्रीड़ा के अर्थ से इसकी अलग व्याख्या संभव है।
आध्यात्मिक रूप से इसकी व्याख्या आत्मा और परमात्मा के मिलन के रूप में की गई है। जैसे- श्रीकृष्ण की बाँसुरी की धुन सुनकर गोपियाँ जैसी थीं, उसी अवस्था में अपने सारे कार्य छोड़कर चली आई थीं—यह परमात्मा की पुकार पर आत्मा के दौड़े आने की प्रतीकात्मक कथा मानी जाती है।
एक व्याख्या यह भी है कि जिस एक वर्ष के अंदर ब्रह्माजी ने सभी गोपों को छुपाकर रखा था, उस बीच में जिन भी गोपियों का विवाह हुआ, वे सब वास्तव में विभिन्न गोपों के रूप में श्रीकृष्ण से ही विवाहित हुईं थीं।
श्रीकृष्ण अन्य जीवधारियों की तरह शरीरधारी नहीं हैं, वे अरूप हैं। उनका रक्त-मांस का जो शरीर दिखता है, वह वास्तव में प्राकृत नहीं है। उनके समस्त कार्य उनके संकल्प से हुए हैं, शरीर से नहीं। दूसरी ओर, गोपियों की बातों से स्पष्ट है कि वे कृष्ण के अंतर्यामी, योगेश्वर परमात्मा के रूप को अच्छी तरह जानती थीं। उन्होंने मधुर भाव से श्रीकृष्ण से प्रेम किया था, जिसमें दास्य-भाव भी शामिल था। यह प्रेम पूर्णतः निःस्वार्थ और निष्पाप था।

रास-लीला के संबंध में राजा परीक्षित और शुकदेव जी का संवाद
इस प्रसंग को सांसारिक दृष्टि से देखने वाले लोग इस विषय में कई प्रकार के प्रश्न उठाते हैं। इस संबंध में भागवत की कथा सुनने वाले राजा परीक्षित ने स्वयं शुकदेव जी से प्रश्न किया था। उनके अनुसार, “गोपियाँ तो कृष्ण को अपना प्रियतम मानती थीं, उनके प्रति उनमें ब्रह्म-भाव नहीं था। इस प्रकार उनकी दृष्टि प्राकृत गुणों से आसक्त दिखती है। ऐसी स्थिति में उनके लिए गुणों के प्रवाह रूप इस संसार की निवृत्ति कैसे संभव हुई?”
इसका उत्तर देते हुए शुकदेव जी ने उन्हें याद दिलाया था कि शिशुपाल भगवान के प्रति द्वेष-भाव रखने पर भी प्राकृत शरीर को छोड़कर अप्राकृतिक (दिव्य) शरीर से उनका पार्षद बना। इसलिए, भगवान से केवल संबंध हो जाना ही पर्याप्त होता है, भले ही वह संबंध द्वेष, क्रोध, भय, स्नेह, नातेदारी या काम का ही क्यों न हो। चाहे जिस भी भाव से भगवान में नित्य-निरंतर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जाएँ, वे जुड़ती तो भगवान से ही हैं; इसलिए वृत्तियाँ भगवानमय हो जाती हैं और उस जीव को भगवान की प्राप्ति हो जाती है।
परीक्षित ने पुनः प्रश्न किया कि भगवान ने अपने अंश सहित पूर्ण रूप में अवतार ग्रहण किया था और उनके अवतार का उद्देश्य ही धर्म की स्थापना करना था, तो फिर उन्होंने स्वयं धर्म के विपरीत पर-स्त्री का स्पर्श कैसे किया? यद्यपि श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं और उन्हें किसी वस्तु की कामना नहीं है, फिर भी उन्होंने यह निंदनीय कार्य किस कारण से किया?
श्री शुकदेव जी ने उसका उत्तर इस प्रकार दिया: “गोपियों, उनके पतियों और संपूर्ण शरीरधारियों के अंतःकरण में जो आत्मारूपीय विराजमान हैं, जो सबके साक्षी और परमपति हैं, वही भगवान अपना दिव्य शरीर प्रकट कर यह लीला कर रहे थे। इसे सामान्य पुरुष की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे सर्वशक्तिमान हैं और कामना-रहित हैं। जैसे भगवान शिव ने हलाहल विष पी लिया था, लेकिन अगर कोई अन्य साधारण मनुष्य वैसा करे, तो वह जलकर भस्म हो जाएगा।”
कृष्ण की रास लीला क्या मर्यादा का उल्लंघन था? – भाग 26




