‘शिव तांडव स्तोत्र’ भगवान शिव के सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रभावशाली स्तोत्रों में शामिल है। अपने भक्तिभाव के साथ-साथ यह साहित्यिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसे ताल के साथ बहुत अच्छे से गाया जा सकता है। भगवान शिव का यह अत्यंत प्रिय स्तोत्र है, इसी कारण हजारों सालों से आज भी इसकी लोकप्रियता कायम है।
ऐसा कहा जाता है कि ‘शिव तांडव स्तोत्र’ की रचना लंकापति रावण ने की थी। शिव तांडव स्तोत्र मुख्य रूप से भगवान शिव के ब्रह्मांडीय तांडव नृत्य का वर्णन करता है। इसमें मुख्य रूप से भगवान शिव के स्तुतिपरक श्लोक हैं।

रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त और परम विद्वान था, लेकिन उसमें एक कमी थी जो कि सभी जानते हैं—वह बहुत अहंकारी था। उसका जो स्वभाव था, वह उसने भगवान शिव को भी दिखाया। इस संबंध में जो कथाएँ अलग-अलग किताबों में मिलती हैं, उनमें थोड़ा-बहुत अंतर अवश्य है।
सबसे प्रसिद्ध कहानी यह है कि वह अपने आराध्य भगवान शिव को कैलाश से लंका ले जाना चाहता था। इसके लिए वह कैलाश पर्वत के पास पहुँच गया। भगवान शिव के प्रथम पार्षद नंदी जी ने जब उससे कहा कि शिव को उनकी मर्जी के बिना नहीं ले जाया जा सकता, तो वह अहंकार से बोला—”अगर शिवजी नहीं चलेंगे, तो मैं इस कैलाश पर्वत को ही उठाकर ले जाऊँगा।”
ऐसा कहकर उसने कैलाश पर्वत को अपने हाथों से उठाना शुरू कर दिया। पर्वत के हिलने से उसमें रहने वाले प्राणियों को कष्ट होने लगा, लेकिन शिव शांत बैठे रहे। जब रावण ने पर्वत को उठाने के लिए अपना हाथ उसके नीचे रख दिया, तब भगवान शिव ने धीरे से अपने बाएँ पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया। इससे पर्वत का भार इतना अधिक बढ़ गया कि रावण के लिए पर्वत को उठाना तो दूर, अपना हाथ उसके नीचे से निकालना भी मुश्किल हो गया।
अब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने धैर्य बनाए रखते हुए जल्दी से यह स्तोत्र रचकर गाया तथा भगवान शिव को सुनाया। इस स्तोत्र से शिव प्रसन्न हो गए और उसकी गलती को क्षमा कर दिया, जिससे रावण का अहंकार भी टूट गया।
इसी कथा का दूसरा संस्करण यह है कि शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर चढ़ते समय रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी। उसने वीणा बजाते हुए और स्तोत्र गाते हुए ऊपर चढ़ना शुरू किया। उसके गायन और वादन में नटराज शिव इस तरह तल्लीन हो गए कि माता पार्वती के याद दिलाने पर भी उन्हें इस बात का ध्यान नहीं रहा कि कोई व्यक्ति अनाधिकृत रूप से पवित्र कैलाश पर आ रहा है। पर जब उन्हें इसका ध्यान आया, तब तक रावण बहुत नज़दीक पहुँच चुका था।
रावण कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग से ऊपर चढ़ रहा था। भगवान शिव ने रावण को पैरों से हल्का सा धक्का दे दिया, जिससे वह पर्वत से खिसकते हुए नीचे गिरने लगा। उसकी कमर में बंधा वाद्ययंत्र उसके साथ घिसटता हुआ नीचे आया, जिससे कैलाश के दक्षिण भाग में निशान बन गया जो आज भी देखा जाता है।
कथा के इन अलग-अलग संस्करणों में अंतर भले ही हों, पर सभी कथाएँ इस बात पर सहमत हैं कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस स्तोत्र की रचना की थी और शिव इससे प्रसन्न भी हुए थे।
अब देखते हैं कि इस संस्कृत स्तोत्र में दिए गए श्लोकों का हिंदी अर्थ क्या है:
1. जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् ।डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥
हिन्दी अर्थ– जिन्होंने जटारुपी वन (अटवी) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें।
2. जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनी ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥2॥
हिन्दी अर्थ– जिनका मस्तक जटारुपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंगों से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं, उन भगवान शिव में मेरा निरंतर अनुराग हो।
3. धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
हिन्दी अर्थ– गिरिराज किशोरी पार्वती के शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनंदित हो रहा है। जिनकी निरंतर कृपादृष्टि से कठिन से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।
4. जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
हिन्दी अर्थ– जिनकी जटाओं में रहने वाले सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ प्रभापुंज दिशा रुपी स्त्रियों के मुख पर कुंकुम का लेप कर रहा है। मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का वस्त्र धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत आनंद करे।
5. सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥5॥
हिन्दी अर्थ– जिनकी चरण पादुकाएं इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम करने से उनके मस्तक पर विराजमान फूलों के कुसुम से धूसरित हो रही हैं। नागराज के हार से बंधी हुई जटा वाले वे भगवान चंद्रशेखर मुझे चिरस्थाई संपत्ति देनेवाले हों।
6. ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥6॥
हिन्दी अर्थ– जिन्होंने ललाट वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिनको इन्द्र नमस्कार किया करते हैं। चन्द्रमा (सुधाकर) की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह उन्नत विशाल ललाट वाला जटिल मस्तक हमें संपत्ति प्रदान करने वाला हो।
7. करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥
हिन्दी अर्थ– जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक् धक् जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव को भस्म कर दिया था। गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्रभंग रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान त्रिलोचन में मेरा मन लगा रहे।
8. नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥8॥
हिन्दी अर्थ– जिनके कंठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुए अंधकार के समान कालिमा अंकित है। जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार भार को धारण करने वाले चन्द्रमा के समान मनोहर कांतिवाले भगवान गंगाधर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।
9. प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥9॥
हिन्दी अर्थ– जिनका कंठ खिले हुए नील कमल समूह की श्याम प्रभा का अनुकरण करने वाली है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, संसार (भव), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।
10. अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥10॥
हिन्दी अर्थ– जो अभिमान रहित पार्वती जी के कलारूप कदम्ब मंजरी के मकरंद स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी के पान करने वाले भँवरे हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।
11. जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥11॥
हिन्दी अर्थ– जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए साँपों के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है। धीमे धीमे बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल स्वर के साथ जिनका प्रचंड तांडव हो रहा है, उन भगवान शंकर की जय हो।
12. दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥
हिन्दी अर्थ– पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिटटी के ढेले में, मित्र या शत्रु पक्ष में, तिनका या कमल के समान आँखों वाली युवती में, प्रजा और पृथ्वी के राजाओं में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा?
13. कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥13॥
हिन्दी अर्थ– सुन्दर ललाट वाले भगवान चन्द्रशेखर में मन को एकाग्र करके अपने कुविचारों को त्यागकर गंगा जी के तटवर्ती वन के भीतर रहता हुआ सिर पर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा?
14. निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका
निगुम्फनिर्भक्षरन्म ध्रुष्णीकामनोहर:|
तनोतु नो मनोमुदं विनोंदिनीमहनीशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषा चय: ||14 ||
देवांगनाओं के सिर में गुथे पुष्पों की मालाओ के झड़ते हुए सुगंध में पराग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगो की सुन्दरता परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सदा बढ़ाती रहे।
15. प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनों विवाहकालिकध्वनि:
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम || 15 ||
प्रचन्ड वाडवानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादि अष्ट महासिद्धिओ तथा चंचल नेत्रों वाली देव कन्याओ से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि, सब मंत्रो में परम श्रेष्ठ शिव मंत्र से मोहित सांसारिक दुखों को नष्ट करके विजय पाए।
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
हिन्दी अर्थ– जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र हि भगवान शंकर की भक्ति प्राप्त कर लेता है। इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है। बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मिं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
हिन्दी अर्थ– सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाए हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान शंकर उसे रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।
॥इति श्रीरावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥




