शिव रुद्राष्टकम: रचयिता, अर्थ और तुलसीदास रचित इस स्तोत्र का महत्व

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‘शिव रुद्राष्टकम’ भगवान शिव का एक अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र है। शिव के ही एक अन्य अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र ‘शिव तांडव स्तोत्र’ के विपरीत, यह उनके रुद्र रूप की मधुर भाव से वंदना करता है। रुद्र भगवान शिव का ही एक भयंकर रूप माना जाता है। ‘अष्टम’ या ‘अष्टक’ ऐसी प्रार्थना को कहते हैं, जिसमें आठ छंद होते हैं। ये छंद साहित्य की दृष्टि से ‘जगति छंद’ या ‘भुजङ्गमप्रयात छंद’ में लिखे गए हैं।

इसकी संगीत और गायन की विशेषता के कारण इसे गाने से मन को अद्भुत शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।

शिव रुद्राष्टकम की रचना 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी सुप्रसिद्ध रचना ‘रामचरितमानस’ के उत्तर कांड में शिव की स्तुति करते हुए की थी। यह मानस के सबसे प्रसिद्ध स्तोत्रों में से एक है। काकभुशुंडि प्रसंग में अपने शिष्य को शाप से मुक्त करने के लिए एक गुरु द्वारा यह स्तोत्र भगवान शिव को सुनाया गया था। इससे शिव ने प्रसन्न होकर न केवल शिष्य को शापमुक्त कर दिया, बल्कि उसे आशीर्वाद भी दिया। माना जाता है कि जो कोई इस ‘शिव रुद्राष्टकम’ का पाठ करता है, उस पर भगवान शिव सतत कृपा बनाए रखते हैं।

यह स्तोत्र इस तरह है:

हे ईशानदिशा के ईश्वर, हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप और सबके स्वामी शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूं। निज स्वरूप में स्थित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन, आकाश रूप शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूं।

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवर को मैं नमस्कार करता हूं।

तुषाराद्रि यानि हिमालय। इन्दु चंद्रमा। चारु यानि सुंदर। जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।

जिनके कानों में कुंडल शोभा पा रहे हैं। सुंदर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्न मुख, नीलकंठ और दयालु हैं। सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाल पहने हैं, उन सर्वप्रिय और सबके नाथ श्री शंकरजी को मैं भजता हूं।

भानु यानि सूर्य। कोटि करोड़। पाणी हाथ। भाव गम्यम यानि भावना से प्राप्त होने वाले। प्रचंड, श्रेष्ठ तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्य के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूं।

मोहापहारी अर्थात मोह को हरने वाला। प्रसीद प्रसन्न होना। कल्पांतकारी कल्प का अंत यानि प्रलय  करने वाला। कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुरासुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालनेवाले हे प्रभो, प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए।

सर्व भूताधिवासम सभी प्राणियों में निवास करने वाले। जब तक मनुष्य श्री पार्वतीजी के पति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में, न ही परलोक में सुख-शांति मिलती है और अनके कष्टों का भी नाश नहीं होता है। अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइए।

मैं न तो योग जानता हूं, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आप को ही नमस्कार करता हूं। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म के दुख समूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा कीजिए। हे शंभो, मैं आपको नमस्कार करता हूं।

ऐसा माना जाता है कि इस रुद्रष्टक स्तोत्र को प्रतिदिन शिव को सुनने से शिव प्रसन्न होकर संसार के सभी दुखों से मुक्ति देते हैं। साथ ही मोक्ष प्रदान करते हैं। 

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