कृष्णाष्टकम: आदि शंकराचार्य रचित श्रीकृष्ण स्तुति (अर्थ सहित)

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आदि गुरु शंकराचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रशंसा में संस्कृत भाषा में इन आठ श्लोकों की इस स्तुति की रचना की है, इसीलिए इसे ‘कृष्णाष्टकम’ नाम दिया गया है। शंकराचार्य की अन्य स्तुतियों की तरह ये आठ श्लोक भी अपनी मधुरता और गेयता के कारण बहुत ही लोकप्रिय हैं। ये श्लोक इस प्रकार हैं:

(कंस और चारुण का मर्दन करने (मारने) वाले वसुदेव के पुत्र, जो कि (माता) देवकी के परमानंद के कारण हैं, उस जगत गुरु कृष्ण को मैं प्रमाण करता हूँ।) 

(अतसी के फूलों के माला से सजे हुए, रत्नों के कंगन, नूपुर और हार से चमकते हुए जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।)

(दैवीय) तेज से सुसज्जित चंद्रमा के समान तेजशील उनका मुख काले घुंघराले बालों के लत और सुंदर कर्ण आभूषण से सजा हुआ है। ऐसे जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।   

जिनके शरीर पर चन्दन का सुगन्धित लेप है। जिनके मुख पर प्यारी मुस्कान है। जिनके चार भुजाएँ हैं। जिनके सिर पर सुंदर माला है। उस जगत गुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ। 

जिनकी सुंदर आँखें पूर्ण खिली हुई कमाल के समान हैं। जिनके शरीर का रंग वर्षा वाले मेघ के समान नीला है। जो कि यादव कुल के सिर के आभूषण की तरह हैं। उस जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ (प्रमाण करता हूँ)।

जो रुक्मिणी संग क्रीड़ा करते हैं। जो पीले रंग के वस्त्र से सुसज्जित हैं। जो तुलसी सुवास से आकर्षित होते हैं। उस जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

जो गोपिकाओं के प्रिय हैं। गोपियों के क्रीड़ा से जिन के वक्ष स्थल में कुमकुम का लेप लगा है। जो हमेशा लक्ष्मी के साथ रहते हैं। जो भगवान शिव के जीवन स्वांस हैं। उस जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।  

krishnashtak

जिस के चौड़े वक्ष स्थल पर श्रीवत्स का चिह्न है। जो वनमाला (वनीय फूलों की माला) से सुसज्जित हैं। जिनके हाथों में शंख और चक्र है। उस जगतगुरु कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।

फलश्रुति (इस कृष्णाष्टक सुनने का फल)

(जो कोई भी इस आठ श्लोक से प्रतिदिन सुबह भगवान कृष्ण की प्रार्थना  करता है। उसके करोड़ो पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं। और उसे भक्ति की प्राप्ति होती हैं।

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