माता सीता स्वर्ण मृग क्यों पाना चाहती थीं? | Valmiki Ramayan – Part 30

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राम-रावण युद्ध संभव हो पाया सीता द्वारा सुनहरे रंग के एक बहुत ही सुंदर मृग को देखकर उसे पाने की इच्छा के कारण। इस संबंध में कई तरह के प्रश्न किए जाते हैं। जैसे—सीता मृग को क्यों मरवाना चाहती थीं? क्या राम मांसाहारी थे? भगवान होकर भी वे मृग के छल को क्यों नहीं जान पाए? मृग का स्वरूप अप्राकृतिक था, फिर भी सीता उसके लालच में क्यों आ गईं? इत्यादि।

लेकिन अगर पूरा प्रसंग पढ़ा जाए तो इन सारे सवालों के जवाब रामायण में ही मिल जाते हैं। सुनहरे माया-मृग का प्रसंग इस प्रकार है।

Sita and Golden Deer Ramayan Story

रावण को सीता हरण के लिए सलाह

अकंपन और शूर्पणखा द्वारा राम के विरुद्ध उकसाने और सीता के अपहरण की सलाह देने पर रावण इसके लिए तैयार हो गया। विभीषण आदि कुछ सभासदों ने उसे ऐसा करने से मना किया, लेकिन उसने उनकी बात नहीं मानी।

योजना के अनुसार रावण राम से प्रत्यक्ष रूप से उस समय युद्ध नहीं करना चाहता था। उसके अनुसार, पत्नी से वियोग में जब राम मानसिक रूप से कमजोर हो जाएँगे, तब उन पर आक्रमण करके उन्हें हराना उचित रहेगा।

राम द्वारा राक्षस-वध का वचन

दूसरी तरफ, राम दंडकारण्य के मुनियों को राक्षसों के संहार का वचन दे चुके थे। लेकिन अकारण राक्षसों पर आक्रमण करना अधर्म होता। इसी उद्देश्य से वे पंचवटी आए थे, ताकि राक्षसों की तरफ से शत्रुता की पहल हो। अर्थात् वे स्वयं किसी उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

शूर्पणखा द्वारा सीता पर हमला करने और उसके भाइयों खर तथा दूषण द्वारा राम पर आक्रमण करने के बाद, उनके युद्ध में मारे जाने से दंडकारण्य के राक्षस लगभग समाप्त हो चुके थे। लेकिन अन्य राक्षसों का नाश भी आवश्यक था।

सीता हरण की योजना में मारीच का शामिल होना

राम-लक्ष्मण से छिपाकर सीता को ले जाने के लिए छल करना आवश्यक था, क्योंकि दोनों में से एक-न-एक भाई हमेशा सीता के पास रहते थे। इसके लिए रावण ने मारीच से सहायता माँगी।

मारीच रूप बदलने में माहिर था, लेकिन वह राम की शक्ति को जानता था। वह राम की पत्नी के अपमान के परिणामों से भी परिचित था। इसलिए उसने रावण को इस योजना को छोड़ देने के लिए समझाया। एक बार तो रावण उसकी बात मान गया, लेकिन जब शूर्पणखा के कहने पर उसने दोबारा यह योजना बनाई, तब उसने मारीच की बात नहीं मानी। विवश होकर मारीच को रावण का साथ देना पड़ा।

माया-मृग का पंचवटी आना और राम-लक्ष्मण का संदेह

रावण की योजना के अनुसार मारीच सुनहरे रंग वाला (सोने का नहीं) एक सुंदर मृग बन गया। वह राम के आश्रम के आसपास घूमने लगा, जहाँ सीता उसे देख सकें।

जब सीता ने उसे देखा तो उन्होंने अपने पति और देवर को शस्त्र लेकर आने के लिए पुकारा। उन्होंने वास्तव में ऐसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। लेकिन उस मृग को देखते ही लक्ष्मण को उसके मारीच होने का संदेह हुआ। इसका कारण यह था कि यह मृग असामान्य था। मारीच द्वारा सुंदर पशुओं का रूप धारण करके शिकार के लिए आए राजाओं को छल से मारने के कारनामे लक्ष्मण ने सुन रखे थे।

लेकिन सीता ने प्रसन्न होकर अपने पति से कहा कि इस सुंदर मृग को पकड़कर ले आइए। यह हम लोगों के मन बहलाव के लिए रहेगा। वे इसे अपने साथ अयोध्या भी ले जाना चाहती थीं।

इसी उद्देश्य से उन्होंने कहा कि यदि यह जीवित नहीं पकड़ा जा सके तो इसे मारकर इसका चर्म भी ले आएँ, क्योंकि वह भी एक अनोखा मृगचर्म होगा। स्पष्टतः वे मृग को मांस के लिए नहीं मारना चाहती थीं।

राम क्षत्रिय थे और क्षत्रिय के लिए शिकार करना मान्य था। मृगचर्म का प्रयोग वनवासी तपस्वी भी पहनने तथा आसन के रूप में करते थे।

राम का माया-मृग के पीछे जाना

पत्नी और भाई दोनों की बात सुनकर राम ने उस मृग को पकड़ने का निश्चय किया। क्योंकि यदि वह कोई दुष्ट मायावी राक्षस होता, तो भी उसे मारना उचित ही होता।

लेकिन वे राक्षसों द्वारा किए जाने वाले प्रतिशोध के प्रति भी सावधान थे। इसलिए लक्ष्मण को सीता के पास छोड़कर स्वयं उस सुनहरे मृग को पकड़ने के लिए गए।

अपने पीछे राम को आते देखकर मृग बना मारीच दिखते-छिपते, कभी पास तो कभी दूर जाकर भाग रहा था। राम उसे मारना नहीं, बल्कि जीवित पकड़ना चाहते थे। इसलिए वे भी उसके पीछे आश्रम से बहुत दूर निकल गए।

अब राम ने सोचा कि यह इस तरह पकड़ में नहीं आ रहा है, इसलिए इस पर तीर चलाना चाहिए।

दूसरी तरफ, मारीच सोच रहा था कि केवल एक भाई उसके पीछे आया है। वह दूसरे भाई को भी आश्रम से बाहर निकालने की तरकीब सोचने लगा, ताकि रावण सीता का अपहरण कर सके।

लक्ष्मण को आश्रम से बाहर निकालने के लिए छल

राम ने बाण छोड़ दिया। बाण लगते ही दर्द से छटपटाता हुआ मारीच अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गया। राम को एक अत्याचारी राक्षस के मारे जाने पर संतोष हुआ।

लेकिन अगले ही पल मारीच ने राम की आवाज में लक्ष्मण और सीता को जोर से पुकारा। यह सुनते ही राम समझ गए कि राक्षस कोई चाल चल रहा है। वे तुरंत आश्रम की ओर लौट चले।

इधर, मारीच की वह पुकार सीता और लक्ष्मण ने भी सुनी। सीता ने राम के किसी संकट में होने की आशंका से लक्ष्मण को वहाँ जाने के लिए कहा।

लेकिन लक्ष्मण ने बड़े आश्वस्त स्वर में कहा कि यह राक्षसों की कोई चाल हो सकती है। राम किसी संकट में पड़ ही नहीं सकते।

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