माता सीता का रावण द्वारा अपहरण और जटायु का संघर्ष | Valmiki Ramayan – Part 31

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सुनहरा मृग बने हुए मारीच को जब राम का बाण लगा, तब वह अपने वास्तविक रूप में आ गया और राम की आवाज में ही जोर से “हा! लक्ष्मण! हा! सीते!” पुकारते हुए जमीन पर आ गिरा। उसकी इस कपटपूर्ण आवाज को सुनकर सीता अत्यधिक घबरा गईं। लक्ष्मण ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यह राक्षसों की कोई चाल हो सकती है, क्योंकि राम अत्यंत पराक्रमी हैं और वे किसी भी संकट को स्वयं ही परास्त करने में सक्षम हैं। किंतु सीता अपने पति की रक्षा की चिंता से अत्यंत भयभीत हो चुकी थीं। जब उनके बार-बार कहने पर भी लक्ष्मण बड़े भाई के आदेश का उल्लंघन कर उन्हें अकेला छोड़ने को तैयार नहीं हुए, तब व्याकुलता में सीता ने उन्हें अत्यंत कड़वे वचन कह दिए।

सीता ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया कि उनके मन में खोट है और वे अपने बड़े भाई का अनिष्ट चाहते हैं, इसीलिए भाई का आर्तनाद (दर्द भरी पुकार) सुनकर भी वे उनकी सहायता के लिए नहीं जा रहे हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि पति के बिना वे जीवित नहीं रह सकतीं, इसलिए उनके जीवन की रक्षा का भी कोई लाभ नहीं है यदि राम की सहायता के लिए लक्ष्मण नहीं जाते।

सीता के इन कठोर और मर्मभेदी वचनों से लक्ष्मण को तीव्र रोष और आघात पहुँचा। उस क्रोध और उत्तेजना की स्थिति में वे देवताओं आदि को माता सीता की रक्षा का भार सौंपते हुए, बड़े भाई के आदेश का उल्लंघन कर उस आवाज की दिशा में तेजी से आगे बढ़ गए। (यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मूल वाल्मीकि रामायण में ‘लक्ष्मण रेखा’ का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।)

रावण का राम के आश्रम में आना

लक्ष्मण के जाने के बाद माता सीता दुःख और चिंता से संतप्त होकर अकेली आश्रम में बैठी रहीं। उस समय उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी, बालों में फूल गूँथे हुए थे और तन पर आभूषण सुशोभित हो रहे थे। ये आभूषण उन्हें अत्रि ऋषि की पत्नी माता अनुसूया ने स्नेहवश उपहार स्वरूप दिए थे, जिन्हें वे राम के कहने पर धारण करती थीं।

इसी समय रावण एक साधु (ब्राह्मण) का वेश धारण कर वहाँ आ पहुँचा। सीता ने अपना अतिथि-धर्म निभाते हुए उसे आसन ग्रहण करने के लिए दिया और पैर धोने हेतु जल प्रदान किया। आश्रम में जो कंद-मूल उपलब्ध थे, वे उन्होंने अतिथि को भोजन के रूप में अर्पित किए। उस समय सीता अत्यधिक दुःखी थीं, इसलिए उनकी बातचीत करने की कोई इच्छा नहीं थी, किंतु रावण द्वारा परिचय पूछे जाने पर किसी साधु-ब्राह्मण का अनादर न हो, इस भाव से उन्होंने अपना पूरा परिचय दे दिया और यह भी बता दिया कि वे यहाँ वन में क्यों निवास कर रही हैं।

सीता का अपहरण

सीता ने जब उस साधु बने अतिथि से उसका परिचय पूछा, तो रावण ने अपना वास्तविक परिचय देते हुए माता सीता के समक्ष अपनी पटरानी बनने का प्रस्ताव रख दिया। यह सुनते ही सीता ने उसे कड़ी फटकार लगाई। रावण ने अपने बल और पराक्रम का बखान करके उन्हें प्रलोभित करने का भी प्रयास किया, किंतु सीता ने क्रोधित होकर उसे पूरी तरह धिक्कार दिया।

तब रावण ने अपने क्रूर और वास्तविक रूप को प्रकट कर दिया। उसी क्षण उसका मायावी रथ भी आकाश में प्रकट हो गया। बलपूर्वक उसने माता सीता को पकड़कर अपने रथ में बैठा लिया।

जटायु द्वारा सीता की रक्षा का प्रयास

सीता को लेकर रावण का रथ आश्रम से कुछ दूर ही उड़ा था कि रोते-बिलखते हुए सीता की वह पुकार वृद्ध गिद्धराज जटायु ने सुन ली। जटायु राम के आश्रम के पास ही एक ऊंचे वृक्ष पर निवास करते थे। जब राम पंचवटी आए थे, तब वे जटायु से मिले थे और जटायु ने उनके पिता के मित्र होने के नाते उन्हें यह वचन दिया था कि वे उनकी हर प्रकार से सहायता और रक्षा करेंगे।

जटायु ने रावण को ललकारा और उसे समझाया कि वह ऐसा जघन्य और पापपूर्ण कृत्य न करे। जब रावण उनकी बात नहीं माना, तब जटायु ने कहा कि यद्यपि रावण अधिक बलवान है और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है, फिर भी वे उसे माता सीता को नहीं ले जाने देंगे और अपनी अंतिम सांस तक उसे रोकने का प्रयास करेंगे।

वीर जटायु ने अपनी तीखी चोंच, विशाल पंखों और पंजों से रावण पर भीषण आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। इस संघर्ष के दौरान रावण की पकड़ कुछ ढीली पड़ने के कारण माता सीता रथ से कूदकर नीचे जमीन पर आ गईं। इधर, क्रुद्ध रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंख, पैर और शरीर का पिछला भाग काट डाला, जिससे वे गंभीर रूप से घायल होकर असहाय अवस्था में भूमि पर गिर पड़े।

जटायु की यह मरणासन्न स्थिति देखकर सीता दौड़ती हुई उनके पास पहुँचीं और उन्हें सहलाते हुए रोने लगीं। तभी रावण उन्हें दोबारा पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। पूरी तरह बदहवास हो चुकी सीता रावण से बचने के लिए आसपास के वृक्षों को पकड़कर उनसे लिपट जाती थीं।

तब रावण ने उनके लंबे केशों (बालों) को पकड़कर खींचना शुरू किया। एक स्त्री और कुलवधू का यह अपमान तथा मर्यादा का घोर उल्लंघन देखकर एक ओर जहाँ दंडकारण्य के ऋषि-मुनि अत्यंत व्यथित हुए, वहीं दूसरी ओर उनके मन में यह संतोष भी हुआ कि अब रावण और समस्त राक्षसों का विनाश निश्चित हो चुका है। स्वयं ब्रह्माजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से रावण द्वारा सीता के केश-कर्षण (बाल पकड़ने) रूपी इस जघन्य अपमान को देखकर कहा— “बस, अब कार्य सिद्ध हो गया!” (अर्थात इस अप्रतिम अपमान और पाप के बाद अब भगवान राम राक्षसों को जीवित नहीं छोड़ेंगे।)

राम का नाम पुकारती और रोती-बिलखती हुई सीता को उनके बाल पकड़कर रावण ने जबरन दोबारा रथ पर बैठा लिया और रथ को आकाश की ओर उड़ा ले गया। रावण की गिरफ्त में विवश हुईं सीता दुःख, क्रोध और भय से रोते हुए रावण को लगातार कोसे जा रही थीं और किसी तरह स्वयं को छुड़ाने का प्रयास कर रही थीं।

रावण के साथ पीली साड़ी में रथ पर सवार, रोती-बिलखती सीता के बालों में लगे फूल और आभूषण बिखर-बिखर कर नीचे गिरते जा रहे थे। वे नीचे धरती की ओर यह देखने के लिए निहार रही थीं कि कहीं उन्हें राम या लक्ष्मण आते हुए दिख जाए। वे ऊँचे स्वर में चीखते हुए कह रही थीं— “यदि मेरे पति आएं, तो उन्हें बताना कि रावण मेरा अपहरण करके ले जा रहा है!”

सीता-हरण संबंधी कुछ प्रचलित भ्रांतियाँ और तथ्य

  • रावण का शाप: कुछ लोगों का मानना है कि रावण को यह शाप था कि यदि वह किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसका स्पर्श करेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। ऐसे में उसने अपहरण कैसे किया? वास्तविकता यह है कि रावण को जो शाप मिला था, वह बलात्कार (अनिच्छा से बलपूर्वक भोग) करने के विरुद्ध था। इसीलिए लगभग एक वर्ष तक अशोक वाटिका में रहने के बावजूद उसने सीता को स्पर्श करने का साहस नहीं किया। शाप मिलने से पूर्व भी उसने कई बार स्त्रियों के अपहरण किए थे, इसलिए उसने सीता को बलपूर्वक अपने महल में न रखकर अशोक वाटिका में रखा था।
  • शिव धनुष उठाने का प्रसंग: कुछ कथाओं में यह कहा जाता है कि जिस शिव धनुष को रावण नहीं उठा पाया था, उसे सीता उठा लेती थीं, इसलिए वे रावण से अधिक शक्तिशाली थीं। किंतु वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई विवरण नहीं मिलता है। शिव धनुष उठाने का संबंध शारीरिक बल से नहीं, बल्कि भक्ति और पवित्रता से था।
  • छाया सीता का प्रसंग: ‘रामचरितमानस’ के अनुसार, माता सीता का तेज इतना प्रखर था कि रावण उन्हें स्पर्श तक नहीं कर सकता था। इसलिए रावण के आने से पहले ही असली सीता अग्नि में समा गईं और उनकी जगह उनकी ‘प्रतिच्छाया’ (छाया सीता) वहाँ रही, जिसे रावण अपने साथ लंका ले गया था।

सीता द्वारा वानरों को देखकर अपने आभूषण गिराना

रावण का रथ तीव्र गति से उड़ता हुआ पंचवटी की भौगोलिक सीमा से बाहर निकल गया। माता सीता अभी भी स्वयं को छुड़ाने और किसी प्रकार सहायता पाने का निरंतर प्रयास कर रही थीं। तभी उनकी दृष्टि दंडकारण्य के ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे हुए पाँच वानरों पर पड़ी।

और कोई अन्य उपाय न देख उन्होंने रावण की नजर बचाकर अपने वस्त्रों में बंधे कुछ आभूषण उन वानरों के बीच नीचे गिरा दिए। रावण उस समय अत्यधिक भयभीत और पशोपेश में था तथा जल्द से जल्द लंका पहुँचना चाहता था, इसलिए उसकी नजर इस पर नहीं पड़ी। शीघ्र ही उसका रथ पंपा सरोवर को पार करता हुआ लंका की ओर आकाश मार्ग से आगे बढ़ चला।

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