रावण का दिग्विजय और मेघनाद को मायावी शक्तियों की प्राप्ति | पार्ट 85

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रावण का दिग्विजय (सर्ग 24)

वाल्मीकि रामायण के सर्ग 23 में रावण के रसातल अभियान का वर्णन है। सर्ग 24 का श्लोक 1 कहता है कि जब रावण लंका लौटा, तब उसने रास्ते में हर्षित अंतःकरण से राजर्षियों, देवताओं और दानवों की कन्याओं का हरण किया। रास्ते में अगर वह किसी कन्या (अविवाहिता) अथवा स्त्री (विवाहिता) को देख लेता, तो उसके बंधुजनों को मार कर उसे बलपूर्वक विमान में बैठा लेता था (श्लोक 2)।

इस तरह उसने कितनी ही राक्षस, असुर, मनुष्य, पन्नग (आकाशचारी), यक्ष की कन्याओं को अपने विमान में बैठा लिया (श्लोक 3)। वे सब भय और शोक से आर्तनाद कर रही थीं (श्लोक 4)। नागों, गंधर्वों, महर्षियों, दैत्यों और दानवों की सैकड़ों सुंदर, पर रोती हुई कन्याओं से विमान भरा हुआ प्रतीत होता था। वे सब अपने पुत्र, पिता, भाई, माता आदि का स्मरण कर रो रही थीं; साथ ही उन्हें अपने भविष्य का भी भय था कि पता नहीं क्या होगा उनके साथ। वे सब रावण को शाप देते हुए कह रही थीं,

“परस्त्रीगमन बहुत ही बुरा कर्म है, किन्तु यह अधम राक्षस परस्त्री में ही प्रीति रखता है, इसलिए यह परस्त्री के कारण ही मारा जाएगा।”

उन साध्वी स्त्रियों के विलाप को सुनता हुआ रावण लंकापुरी पहुँचा। राक्षसों ने उसके अपने नगर में उसका सत्कार किया।

तभी उसकी बहन शूर्पनखा रावण के सामने रोते हुए जमीन पर गिर पड़ी और बोली,

“हे राजन! तुम बलवान हो, अतः बलपूर्वक तुमने मुझे विधवा बना दिया। 14 हजार कालकेय दैत्यों को मारते समय तुमने मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय बलवान पति को भी शत्रु समझ कर मार डाला। तुम तो केवल नाम के भाई हो। मेरे पति को मार कर तो तुमने मानो मुझे ही मार डाला। बहनोई की रक्षा करने के बदले तुमने स्वयं उसे मार डाला, पर तुम्हें लज्जा नहीं आती।”

इस तरह शूर्पनखा अनेक तरह से विलाप कर रही थी। रावण ने बहन को ढाँढस देते हुए कहा,

“विजय की लालसा में युद्ध करते हुए मैं उन्मत्त-सा हो रहा था, मुझे अपने-पराए का ज्ञान नहीं रहा था। तुम रोओ नहीं। तुम्हें भयभीत होने की ज़रूरत नहीं है। मैं दान, मान और अनुग्रह से तुम्हें सदा प्रसन्न रखूँगा।”

रावण ने अपने मौसेरे भाई खर को 14 हजार राक्षसों का अधिपति बना कर दंडक वन में भेज दिया। उसके पास शूर्पनखा को भेजते हुए कहा, “खर अपने राक्षसों को जहाँ चाहे भेजे, जिसको जो चाहे दान दे, अतः (इन अधिकारों के बदले) वह तुम्हारी आज्ञा में रहेगा।” रावण ने दूषण को खर का सेनापति बनाया।

मेघनाद को मायावी शक्तियों की प्राप्ति, मधु-कुंभीनसी प्रसंग (सर्ग 25)

अपनी बहन को भाई खर के साथ दंडक वन में भेज कर रावण लंका नगर के अंदर एक अत्यंत सुरक्षित और सुंदर उपवन निकुंभिला गया। वहाँ उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद को काले मृगचर्म ओढ़े, दंड एवं कमंडल लेकर कोई अनुष्ठान करते देखा। उसने इसके विषय में अपने पुत्र से पूछा।

इस पर वहीं उपस्थित शुक्राचार्य ने कहा:  

“मेघनाद ने सात प्रसिद्ध यज्ञ- अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध, वैष्णव एवं महेश्वर यज्ञ को अत्यंत विस्तार से किया है। ऐसा कर इसने भगवान शिव से दुर्लभ वरदान प्राप्त किया है। वरदान के रूप में इसने इच्छाचारी, दिव्य और आकाश में स्थिर रहने वाला एक अद्भुत रथ पाया है। साथ ही इसे तामसी नाम्नी माया भी प्राप्त हुई है। इस माया के द्वारा अँधेरा छा जाता है। इसके अतिरिक्त इसे कभी रिक्त न होने वाले दो तरकश, दुर्जेय धनुष और संग्राम में शत्रुओं का नाश करने वाला एक बड़ा बलवान शस्त्र मिला है। आज ही यज्ञ समाप्त होने पर इसे ये समस्त वरदान मिले हैं। आज यज्ञ समाप्त होने पर हम दोनों आपसे मिलना चाहते थे।”

रावण ने इस बात पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की कि इसके लिए उसके पुत्र ने उसके शत्रु इन्द्र आदि देवताओं की पूजा की। इसके बाद वह अपने भाई विभीषण और पुत्र मेघनाद के साथ अपने महल स्थित पुष्पक विमान के पास गया और बिलखती हुई स्त्रियों को उतारा, जिन्हें वह हर कर लाया था।

उन सब स्त्रियों के प्रति अपने बड़े भाई रावण का दुष्ट अभिप्राय जानकर विभीषण ने कहा,

“हे राजन! यश, धन और कुलनाशक आचरणों से पाप होता है, यह जानते हुए भी तुम प्राणियों को सताते हो। जिस प्रकार तुमने इन स्त्रियों के बंधुजनों को नीचा दिखा कर इनका हरण किया है, उसी प्रकार मधु दैत्य ने तुम्हें नीचा दिखाने के लिए तुम्हारी बहन कुंभीनसी का हरण किया है।”

रावण ने मधु का परिचय पूछा। कुंभीनसी को भी वह तुरंत याद नहीं कर पाया। इस पर विभीषण ने याद दिलाया कि उन दोनों भाइयों के नाना सुमाली के बड़े भाई माल्यवान वृद्ध, विवेकशील और सम्मानीय राक्षस हैं। उनकी पुत्री अनला की पुत्री कुंभीनसी रावण और विभीषण की मौसेरी बहन है। वह रावण के अंतःपुर में ही रह रही थी।

कुंभीनसी को राक्षस मधु हर कर जिस समय ले गया, उस समय रावण अपने विजय-अभियानों में, विभीषण तपस्या में और मेघनाद यज्ञ-अनुष्ठान करने में व्यस्त था। कुंभकर्ण सो रहा था। इन सबकी अनुपस्थिति में रावण के रक्षकों एवं मंत्रियों को मार कर मधु ने उसका हरण किया। विभीषण ने कहा बहन का विवाह करवाना भाई का कर्तव्य होता है, लेकिन तुम ऐसा करवाने के बदले दूसरे की कन्याओं का हरण कर रहे थे; तुम्हारे इस बुरे कर्म का परिणाम तुरंत मिल गया।

[स्पष्टीकरण: इससे पहले सर्ग 9 में कुंभीनसी को सुमाली की पुत्री यानि कि रावण की सगी मौसी कहा गया है लेकिन यहाँ उसे माल्यवान की दौहित्री यानि रावण की मौसेरी बहन कहा गया है।]

विभीषण के इस प्रकार कहने पर रावण ने अपने द्वारा हरण कर लायी गई कन्याओं को तो नहीं मुक्त किया, अपितु चार हजार राक्षस-सेना लेकर मधु दैत्य पर आक्रमण करने चला। मधु को पराजित करने के बाद यह सैन्य दल देवताओं पर आक्रमण करता। इस अभियान में मेघनाद और कुंभकर्ण भी साथ थे। पर इसे अधर्मसंगत मानते हुए विभीषण ने इसमें भाग नहीं लिया और लंका में रह कर ही धर्माचरण करते रहे।

रावण जब मधु दैत्य की राजधानी मधुपुरी पहुँचा, उस समय मधु वहाँ नहीं दिखा। लेकिन उसकी बहन कुंभीनसी वहीं थी। वह भयभीत होकर अपने भाई रावण के पैरों में गिर कर रोने लगी। रावण द्वारा अभय देने पर उसने अपने पति का वध न करने की प्रार्थना की।

रावण इसके लिए मान गया, लेकिन मधु से मिलने की इच्छा जताई ताकि वह स्वर्गलोक के आक्रमण में उसे साथ ले जा सके। कुंभीनसी ने अपने पति को जगाया। कुंभीनसी ने अपने पति मधु को रावण द्वारा उसे बहनोई स्वीकार कर न मारने के वचन और स्वर्गलोक-विजय में उसकी सहायता की इच्छा प्रसन्नतापूर्वक सुनाई।

मधु इसके लिए तैयार हो गया। उसने उचित रीति से अपनी पत्नी के भाई रावण का सत्कार किया। एक रात्रि वहाँ विश्राम करने के बाद रावण आगे विजय-यात्रा पर गया। (लवणासुर इसी कुंभीनसी-मधु का पुत्र था जिसका वध श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न ने किया था।)

कैलाश पर्वत-शिखर पर अपने बड़े सौतेले भाई कुबेर के वासस्थान के पास पहुँच कर रावण ने सेना का शिविर लगाया।

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