रावण ने एक ऋषिका वेदवती से दुष्कर्म का प्रयास किया जिससे रावण को शाप देने के बाद अग्नि में अपना शरीर उसकी आँखों के सामने ही भस्म कर लिया। परंतु क्रूर रावण पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
रसातल अभियान से लौटे समय उसने अनगिनत स्त्रियों का अपहरण किया और उन्हें बलात अपने महल में रखा। उसके इस कृत्य का विरोध उसके छोटे भाई विभीषण ने किया था।
किसी में इतनी शक्ति नहीं थी कि उसकी मनमानियों को रोक सके। उसकी स्वेछाचारिता और अत्याचार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था लेकिन देवलोग पर आक्रमण करते समय जब उसने अपने बड़े भाई की होने वाली बहू के साथ दुष्कर्म किया तो उसे ऐसा शाप मिला जिस कारण इसके बाद उसका किसी स्त्री से दुष्कर्म करने का साहस नहीं हुआ। हाँ, सहमति प्राप्त करने के लिए वह उन्हें उत्पीड़ित करता था जैसा कि माता सीता के साथ किया था उसने।
इस शाप की कथा ऋषि अगस्त्य श्रीराम की सभा में तरह सुनाते हैं, जिसका वर्णन सर्ग 26 में है।
कैलाश पर्वत शिखर के पास रावण का सैन्य शिविर
रावण ने इन्द्र के देवलोक पर आक्रमण के लिए जाने के क्रम में कैलाश पर्वत-शिखर पर अपने बड़े सौतेले भाई कुबेर के वासस्थान के पास पहुँच कर अपनी सेना का शिविर लगाया।
रात्रि के समय जब समस्त सेना सो गई, तब रावण शुभ्र चाँदनी में लेटे हुए पर्वत-शिखर के सौंदर्य को निहारने लगा। उसने देखा, उस वन में विद्याधर और किन्नर-गण अपनी स्त्रियों के साथ गायन-वादन करते हुए क्रीडा कर रहे थे। कुबेर के भवन से अप्सराओं के गायन-वादन के मधुर स्वर भी आ रहे थे। फूलों की सुगंध से समस्त वन सुवासित हो रहा था।
अप्सरा रंभा से दुष्कर्म
तभी उसकी नजर अप्सरा रंभा पर पड़ी। ऐसा लग रहा था कि वह किसी उत्सव में सम्मिलित होने के लिए शीघ्रता से जा रही थी। नीले रंग के वस्त्र में उसका सौंदर्य और निखर रहा था।
काम के वशीभूत होकर रावण रंभा से प्रणय-निवेदन करने लगा। उसने यह भी कहा कि वह उसके स्वामी (कुबेर) का स्वामी है, इसलिए उसकी अवहेलना करना संभव नहीं है।
उसकी कुत्सित बातें सुन कर रंभा काँप उठी और हाथ जोड़ कर बोली, “आप मेरे बड़े हैं, अगर कोई मेरा अपमान करे तो आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए। धर्मानुसार मैं आपकी पुत्रवधू हूँ; क्योंकि आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकूबर से मेरा विवाह होने वाला है, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। मैं अपने होने वाले पति नलकूबर से मिलने जा रही हूँ, इसलिए आपको मुझे जाने देना चाहिए। वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।”
रंभा भय से काँपती हुई बार-बार अपने को जाने देने के लिए अनुरोध करती रही, लेकिन रावण ने उसके विलाप को अनसुना कर बलपूर्वक दुष्कर्म किया।
नलकूबर का रावण को शाप

रंभा रोते हुए नलकूबर के पास पहुँची और उसके चरणों में गिर पड़ी। पूछने पर उसने सारा हाल कह सुनाया। नलकूबर ने ध्यान लगा कर सारा वृत्तांत जान लिया। उसने उसी समय हाथ में जल लेकर विधिपूर्वक आचमन किया और रंभा को देखते हुए रावण को शाप देते हुए कहा:
“हे रंभा! जिस प्रकार उसने तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध आचरण किया है, अगर फिर वह किसी दूसरी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसा करेगा, तो उसके सिर के सात टुकड़े हो जाएंगे।”
नलकूबर के इस शाप को ब्रह्मा और अन्य देवताओं ने स्वर्गीय वाद्यों के वादन और पुष्पों की वर्षा द्वारा अनुमोदित कर इस पर प्रसन्नता व्यक्त की; क्योंकि उन्होंने इसे रावण की मृत्यु का उपाय समझा।
जब रावण को इस शाप का समाचार मिला, तब से उसने अकामा (अनिच्छुक) स्त्रियों के साथ दुष्कर्म त्याग दिया। दूसरी तरफ वह जिन स्त्रियों को पहले ले गया था, उन्हें जब उसके शाप का पता चला, वे भी बड़ी प्रसन्न हुईं।
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