जनसमान्य में रावण के विषय में जो धारणा है उसमें एक यह भी है कि वह बहुत बड़ा शिव भक्त था। किन्तु रामायण में उसकी भक्ति को कुछ भिन्न प्रकार से बताया गया है। यह कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के सर्ग 16 में आता है। यह ऋषि अगस्त और श्रीराम के संवाद के रूप में हैं। ऋषि अगस्त राम की सभा में रावण के विषय में कथा सुना रहे थे।
ऋषि अगस्त ने पहले रावण द्वारा उसके बड़े सौतेले भाई कुबेर की अलकापुरी पर आक्रमण का विवरण देते हैं। अलकापुरी वह राज्य था जिसे कुबेर ने हिमालय में कैलाश पर्वत के पास तब बसाया था जब रावण ने उससे लंका छीन लिया था।
शक्ति प्राप्त करने के लिए उसने ब्रह्मा जी की तपस्या की थी और उनसे देवता, दैत्य, राक्षस, नाग, यक्ष, गंधर्व किसी के हाथों नहीं मरने का वरदान प्राप्त कर लिया था। इसी वरदान के कारण वह अपने को अजेय मनाने लगा था।
भगवान विष्णु को वह अपना शत्रु मानता था क्योंकि उन्होने ही मातृकुल के उसके पूर्वज राक्षसों को पराजित कर लंका छोड़ कर रसातल में रहने के लिए विवश कर दिया था।
किन्तु भगवान शिव के प्रति उसके किसी विशेष भक्ति या द्वेष का विवरण नहीं है। उनसे अथवा उनकी शक्ति से उसकी प्रथम भेंट अलकापुरी विजय के बाद ही हुई। रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार है:
भगवान शिव द्वारा रावण का दर्प भंग करना (सर्ग 16 )
कुबेर की अलकापुरी को जीतने के बाद रावण का अभिमान और बढ़ गया। यह उसका पहला पूर्ण सैन्य-अभियान था, जिसमें कड़े प्रतिरोध के बावजूद उसने पूर्ण विजय प्राप्त की। पुष्पक विमान अब उसके पास था।

अतः कैलाश से नीचे आते ही वह उस पर्वत के समीप के उस वन में प्रविष्ट हो गया, जिसमें भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ था। यह वन स्वर्णिम रंग का था। यहाँ पहुँचते ही एक विचित्र घटना हुई। पुष्पक विमान यहाँ आकर रुक गया। इच्छानुसार गति से चलने वाले विमान के वहाँ रुक जाने से रावण को बड़ा विस्मय हुआ। इसके कारण पर सभी विचार-विमर्श करने लगे। तभी उनकी दृष्टि छोटे से आकार के नंदीश्वर पर पड़ी। वे भगवान शिव के प्रधान सेवक थे। उनका वर्ण श्याम और पीत था। वे नीचे खड़े थे और निर्भीक दृष्टि से रावण को देखते हुए बोले, “हे दशग्रीव! यहाँ भगवान शिव जी क्रीडा कर रहे हैं। अतः तू यहाँ से चला जा। गरुड़, नाग, यक्ष, देवता, गंधर्व, राक्षस—कोई भी जीवधारी इस पर्वत पर नहीं जा सकता।”
इतना सुनकर रावण अत्यधिक क्रोध में “कौन है यह शिव?” कहते हुए विमान से नीचे आया। नंदी त्रिशूल लेकर अचल खड़े रहे। नंदीश्वर का वानर जैसा मुख देख कर रावण अट्टहास करता हुआ उनका मज़ाक उड़ाने लगा। इस पर कुपित होकर नंदीश्वर बोले, “हे दशानन! मेरे वानर रूप की अवज्ञा करके तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया है। अतः मेरे समान रूप वाले पराक्रमी वानर तेरे वंश का मूलोच्छेद करने के लिए उत्पन्न होंगे। वे तेरे अहंकार को तो दूर करेंगे ही, तेरे मंत्रियों और पुत्रों का दर्प भी खंडित करेंगे। मैं तुझे अभी ही मार डालता, पर अपने बुरे कर्मों के कारण तू तो पहले ही मर चुका है। मरे को मारना उचित नहीं।”
नंदीश्वर के इन वचनों की देवताओं ने नगाड़े बजा कर और पुष्प-वृष्टि कर प्रशंसा की।
किन्तु रावण उनके शाप की परवाह किए बगैर स्वयं भगवान शिव को ही ललकारते हुए बोला, “हे रुद्र! तुम्हारे जिस पर्वत के कारण मेरे पुष्पक विमान की गति बंद हो गई, उसे मैं उखाड़ कर ही फेंक देता हूँ।”
ऐसा कहते हुए उसने पर्वत को उठाने के लिए उसके नीचे अपना हाथ लगाया। इससे पर्वत में कंपन हुआ। इस कंपन से पर्वत पर स्थित जीव-जंतु और शिव के गण भयभीत हो गए। तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को हल्के से दबा दिया। उनके इस हल्के से दबाव को भी रावण नहीं झेल पाया। उसका हाथ पर्वत के नीचे फँसा रह गया। क्रोध और पीड़ा से वह चीत्कार कर उठा।
रावण का चीत्कार इतना भयानक था कि दिशाएँ काँप उठीं। उसके मंत्री गण विस्मित रह गए। लाख प्रयत्न करने पर भी वह अपना हाथ पर्वत के नीचे से नहीं निकाल पाया। तब मंत्रियों ने उसे भगवान शिव के ही शरण में जाने का सुझाव दिया। रावण के पास इसके अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था।
रावण ने भगवान शिव को प्रणाम किया और सामवेद के विविध मंत्रों से उनकी स्तुति करने लगा। एक हजार वर्षों तक वह उसी अवस्था में रोते-गिड़गिड़ाते हुए शिव से मुक्ति के लिए प्रार्थना करता रहा। तब भगवान शिव बोले, “दशानन! तेरी वीरता से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारी अति तीव्र चीत्कार (रव) से तीनों लोक थर्रा उठें। इसलिए आज से तुम्हारा नाम ‘रावण’ होगा। सब तुमको लोकों को रुलाने वाला ‘रावण’ कह कर पुकारेंगे। अब तुम जिधर जाना चाहते हो, जाओ।”
रावण ने कहा, “अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो जो वर मैं मांग रहा हूँ वह मुझे दीजिए। देवताओं, गंधर्वों, दानवों, राक्षसों, गुह्यकों, नागों से तथा अन्य बलवान प्राणियों से तो मैं अवध्य हूँ, मनुष्यों को मैं कुछ गिनता नहीं। ब्रह्मा जी से मैं दीर्घायु प्राप्त कर चुका हूँ। अब जो मेरी आयु शेष रह गई है, वह मेरे किसी भी कर्म से नष्ट न हो। इसके अतिरिक्त आप मुझे एक शस्त्र भी दीजिए।”
भगवान शिव ने रावण की दोनों बातें मान लीं। उसे उसकी शेष आयु भी दी और ‘चंद्रहास’ नामक एक तलवार भी दी। ‘चंद्रहास’ तलवार देते हुए भगवान शिव बोले, “इस तलवार का कभी अनादर मत करना। अगर इसका अनादर किया, तो यह मेरे पास चली आएगी।”
इसके बाद रावण उनको प्रणाम कर पुष्पक विमान से पृथ्वी पर वापस आ गया। अब उसकी शक्ति और बढ़ गई थी। इस अभिमान में उसने पृथ्वी पर घूम-घूम कर पराक्रमी क्षत्रियों को सताना आरंभ कर दिया। अनेक तेजस्वी क्षत्रिय उसकी आज्ञा नहीं मानने के कारण परिवार सहित मारे गए। अनेक राजाओं ने उसकी शक्ति को अजेय मान कर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।
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