पांडवों की परदादी सत्यवती कौन थीं? जन्म और विवाह की कथा (भाग 5)

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धृतराष्ट्र एवं पाण्डु की दादी, यानी कौरवों और पाण्डवों की परदादी का नाम सत्यवती था। वह हस्तिनापुर के राजा शांतनु की दूसरी पत्नी थीं। पहली पत्नी गंगा के चले जाने के बाद शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया था। गंगा से शांतनु को भीष्म और सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुए। सत्यवती चेदि देश के राजा उपरिचर वसु की जैविक पुत्री थीं, जिनका पालन-पोषण मल्लाहों के सरदार द्वारा किया गया था। अपने असली पिता और भाई के बारे में जानने के बाद सत्यवती के मन में रानी और राजमाता बनने की लालसा उत्पन्न हुई। उनकी यह लालसा भी महाभारत के विनाशकारी युद्ध के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार थी, इसलिए सत्यवती का जन्म और जीवन इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है।

सत्यवती के पिता राजा उपरिचर वसु की कथा

पुरू वंश के एक राजकुमार वसु की कठिन तपस्या से घबराकर देवताओं के राजा इंद्र ने उनसे मित्रता कर ली, उन्हें बहुत से उपहार दिए और उन्हें चेदि देश का राजा बनने के लिए राजी कर लिया। वह परम पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा थे। इंद्र ने उन्हें एक विशाल विमान और बाँस की एक छड़ी भी भेंट की थी। इंद्र ने ही उन्हें एक ऐसी वैजयंती माला (इंद्र माला) दी थी, जिसमें पिरोए हुए कमल कभी मुरझाते नहीं थे; साथ ही, यह युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों से उनकी रक्षा भी करती थी। सदा इंद्र के दिए हुए विमान में धरती से ऊपर चलने के कारण ही राजा वसु ‘उपरिचर’ नाम से विख्यात हुए।

चेदि राज्य का राजा बनने पर उपरिचर वसु ने बाँस की वह छड़ी पहले जमीन में गाड़ी, फिर ऊँचे स्थान पर रखकर उसमें देवराज इंद्र की पूजा की। इंद्र देव ने उपरिचर वसु और उनके चेदि राज्य को आशीर्वाद दिया। तभी से राज्याभिषेक के अवसर पर छड़ी गाड़ने की प्रथा चल पड़ी।

समय आने पर राजा उपरिचर वसु के अपनी पत्नी गिरिका से पाँच पुत्र हुए। उनके नाम थे—बृहद्रथ, प्रत्यग्रह, मणिवाहन (जिसका नाम कुशाभ्य भी था), मावेल्ल और यदु। इन पाँचों ने अलग-अलग देश बसाए, जो उनके नामों से जाने गए। महारथी बृहद्रथ मगध का राजा हुआ।

सत्यवती का जन्म

राजा उपरिचर वसु और एक शापवश मछली बनी अप्सरा अद्रिका के संयोग से दो जुड़वा बच्चे—एक पुत्र और एक पुत्री हुए। मल्लाहों ने मछली के पेट से निकले दोनों बच्चों को चेदिराज को दे दिया। राजा ने बिना यह जाने कि ये दोनों उनके ही बच्चे हैं, पुत्र को अपना लिया, लेकिन पुत्री को छोड़ दिया क्योंकि उसके शरीर से मछली की दुर्गंध आती थी।

मत्स्य यानी मछली के पेट से उत्पन्न होने के कारण उस बालक का नाम मत्स्य पड़ा। वह बड़ा होकर प्रसिद्ध राजा बना, लेकिन बालिका मल्लाहों के सरदार (निषादराज) दाशराज के पास रहकर पली-बढ़ी और वही आगे चलकर सत्यवती कहलाई। उसके शरीर से मछली की जो गंध आती थी, वह एक योजन तक फैली रहती थी, इसलिए उसे योजनगंधा या मत्स्यगंधा भी कहा जाता था। उसका एक नाम ‘काली’ भी मिलता है।

सत्यवती से वेदव्यास का जन्म

विवाह से पहले ऋषि पाराशर (जो ऋषि शक्ति के पुत्र थे) के संयोग से सत्यवती ने ऋषि वेदव्यास को जन्म दिया। पाराशर ऋषि के वरदान के कारण उनके शरीर की गंध सुगंध में परिवर्तित हो गई। उन्हीं के वरदान के कारण जन्म लेते ही वेदव्यास बड़े हो गए और समस्त वेद-पुराणों के ज्ञाता हुए। वेदव्यास का रंग काला था और उनका पालन-पोषण यमुना के द्वीप पर हुआ था, इसलिए उनका नाम ‘कृष्ण द्वैपायन’ पड़ा। बाद में उन्होंने समस्त वेदों के मंत्रों का संग्रह कर उन्हें चार भागों (चार वेदों) में बाँट दिया, इस कारण वे वेदव्यास के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अन्य अनेक ग्रंथों की रचना की, जिसमें महाभारत भी शामिल है।

सत्यवती की महत्त्वाकांक्षा

इसी बीच सत्यवती को किसी ऋषि से पता चला कि वह वास्तव में चेदिराज उपरिचर वसु की पुत्री थीं। उन्हें यह भी पता चला कि उनका जुड़वा भाई मत्स्य एक राजा था। उनके मन में यह विचार आया कि यदि उनके शरीर से दुर्गंध नहीं आती, तो उनके पिता ने उन्हें भी अपना लिया होता और वह भी आज एक राजकुमारी होतीं। उनमें राजकुमारियों के रूप और गुण दोनों थे। यहीं से उनमें रानी और राजमाता बनने की लालसा जागी। उनकी यह लालसा उन्हें पालने वाले मल्लाहों के सरदार (निषादराज) दाशराज से भी छिपी नहीं थी। वह भी चाहते थे कि ऐसा ही हो और उनकी पुत्री का विवाह उनके जैसे किसी उपयुक्त राजा से ही हो।

शांतनु और सत्यवती का मिलन

इधर हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पहली पत्नी गंगा उन्हें छोड़कर चली गई थीं। दोनों का एक पुत्र देवव्रत था, जो अब शांतनु के पास ही रहता था। दोनों पिता-पुत्र आनंदपूर्वक रह रहे थे। चार वर्ष बीत गए। एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के निकटवर्ती वन में गए। वहाँ उन्हें एक अद्भुत सुगंध का अनुभव हुआ। इसके स्रोत का पता लगाने के लिए वे आगे बढ़े, तो उन्हें एक मल्लाह-कन्या दिखाई दी, जो अनुपम रूपवती तो थी ही, साथ ही उसके शरीर से एक अद्भुत सुगंध आ रही थी। पूछने पर उस कन्या ने स्वयं को निषादराज दाशराज की कन्या सत्यवती बताया, जो अपने पिता की आज्ञा से धर्मार्थ नाव चलाती थी।

सत्यवती के पिता की विवाह के लिए शर्त

उस कन्या की सहमति से शांतनु ने उसके पिता निषादराज के समक्ष उस कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। इस पर निषादराज ने कहा—“यदि आप इस कन्या को अपनी धर्मपत्नी बनाने के लिए मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्य को साक्षी रखकर मेरी इस इच्छा को पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कीजिए, क्योंकि आप सत्यवादी हैं।” किंतु राजा बिना इच्छा सुने उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा लेने के लिए तैयार नहीं हुए। तब निषादराज ने अपनी शर्त बताई—“इस कन्या के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा, आपके बाद उसी का राजा के पद पर अभिषेक किया जाए, अन्य किसी राजकुमार का नहीं।” परंतु राजा शांतनु ऐसा वर देने के लिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि उनकी पहली पत्नी गंगा से एक पुत्र था और धर्म के अनुसार बड़ा पुत्र ही उत्तराधिकारी होता था, इसलिए यह शर्त उन्हें धर्मविरुद्ध लगी।

राजकुमार देवव्रत का पिता की चिंता का कारण जानना

कन्या के पिता की शर्त के कारण शांतनु यद्यपि कन्या का वरण किए बिना ही लौट आए, किंतु उस कन्या का चिंतन उनके मन से नहीं निकला। उनकी इस उदासी को उनके पुत्र देवव्रत ने भाप लिया। राजा शांतनु ने देवव्रत से उस कन्या के विषय में कुछ नहीं कहा, केवल इतना बताया कि यद्यपि उनका पुत्र देवव्रत अकेले सौ पुत्रों के बराबर था, किंतु यदि किसी कारण से उस पर कोई विपत्ति आ जाएगी, तो उनकी वंश-परंपरा का अंत हो जाएगा, क्योंकि वह उनका इकलौता पुत्र था।

देवव्रत अपने पिता की चिंता का कारण जानकर उनके परम हितैषी वृद्ध मंत्री के पास गए और उनसे पिता के शोक के वास्तविक कारण के विषय में पूछा। इस पर मंत्री ने बताया कि महाराज एक कन्या से विवाह करना चाहते हैं। तब वे पिता के सारथी से मिले और उन्होंने निषाद-कन्या तथा उसके पिता की शर्त के बारे में बताया।

देवव्रत का सत्यवती के पिता से मिलना

इसके बाद राजकुमार देवव्रत कुछ वृद्ध क्षत्रियों के साथ निषादराज के पास गए और उनसे अपने पिता के लिए उनकी कन्या का हाथ माँगा। निषादराज दाशराज ने अपनी शर्त दोहरा दी। साथ ही, उसने अपनी कन्या के जन्म का वृत्तांत भी सुनाया और बताया कि वह वास्तव में निषाद वंश की नहीं, बल्कि आर्य वंश के एक राजा की संतान थी और अपने वंश तथा गुणों के अनुरूप शांतनु ही उसके योग्य पति हो सकते थे। सत्यवती वास्तव में चेदिराज वसु की पुत्री थीं, जिनका पालन-पोषण निषादराज ने किया था।

राजकुमार देवव्रत का ‘भीष्म’ बनना

राजकुमार देवव्रत ने सभी लोगों के समक्ष यह प्रतिज्ञा की—“निषाद-कन्या सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न पुत्र ही हमारा राजा होगा।” परंतु दाशराज ने यह संदेह प्रकट किया कि देवव्रत की अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहने का उसे पूर्ण विश्वास था, किंतु हो सकता है कि उनके पुत्र उनकी प्रतिज्ञा का पालन न करें। इस पर राजकुमार देवव्रत ने इससे भी कठोर प्रतिज्ञा करते हुए कहा—“राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है, अब संतान के लिए भी अटल निश्चय कर रहा हूँ। आज से मेरा आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य व्रत रहेगा। मेरे पुत्र न होने पर भी स्वर्ग में मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे।”

देवव्रत की यह कठोर प्रतिज्ञा सुनकर निषादराज के रोंगटे खड़े हो गए और उन्होंने तुरंत कहा—“मैं यह कन्या आपके पिता को अवश्य देता हूँ।” उसी समय अंतरिक्ष में उपस्थित देवताओं, अप्सराओं और ऋषिगणों ने फूलों की वर्षा की और बोल उठे—“यह भयंकर प्रतिज्ञा करने वाले राजकुमार ‘भीष्म’ हैं।” उपस्थित लोगों ने भी इसका समर्थन किया। इसके बाद राजकुमार देवव्रत ‘भीष्म’ कहलाने लगे।

भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान

इसके बाद राजकुमार भीष्म उस कन्या सत्यवती को लेकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर आ गए और उन्हें अपने पिता शांतनु को सौंप दिया। इस समस्त वृत्तांत को सुनकर शांतनु ने प्रसन्न होकर भीष्म को स्वच्छंद मृत्यु (इच्छा-मृत्यु) का वरदान दिया, यानी उन्हें मृत्यु तभी आ सकती थी जब वे स्वयं चाहते।

शांतनु-सत्यवती विवाह और संतान

हस्तिनापुर में महाराज शांतनु और सत्यवती का विधिपूर्वक विवाह हुआ। समय आने पर शांतनु और सत्यवती को दो पुत्र हुए—बड़ा पुत्र चित्रांगद परम बुद्धिमान और महापराक्रमी था, तथा दूसरा पुत्र विचित्रवीर्य महान धनुर्धर था। जब विचित्रवीर्य अभी बालक ही थे, तभी राजा शांतनु की मृत्यु हो गई।

चित्रांगद की मृत्यु

शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद का राज्याभिषेक हुआ। राजा चित्रांगद अपनी वीरता के अभिमान में अन्य राजाओं का तिरस्कार करने लगे, जिसके कारण उनका कई राजाओं से अनावश्यक युद्ध भी हुआ। इसी तरह का एक युद्ध उनके ही नाम वाले गंधर्व चित्रांगद के साथ हुआ। इस द्वंद्व-युद्ध में वे गंधर्व चित्रांगद के हाथों मारे गए। द्वंद्व-युद्ध होने के कारण भीष्म उनकी सहायता नहीं कर सके। जीत के बाद गंधर्व चित्रांगद अपने देश चला गया।

विचित्रवीर्य का राजा बनना

महाराज चित्रांगद की मृत्यु के बाद भीष्म ने उनके छोटे भाई विचित्रवीर्य को कुरुदेश का राजा बनाया, जो अभी बालक ही थे। अपने बड़े सौतेले भाई भीष्म की देखरेख में वे शासन करने लगे। विचित्रवीर्य भीष्म का बहुत सम्मान करते थे और भीष्म भी इस अल्पवयस्क राजा की सब प्रकार से रक्षा व सहायता करते थे। वे माता सत्यवती से भी समय-समय पर परामर्श लेते थे।

वंश-वृद्धि के लिए भीष्म ने विचित्रवीर्य का विवाह कम उम्र में ही काशी की दो राजकुमारियों—अंबिका और अंबालिका—से करा दिया, किंतु क्षय रोग के कारण राजा विचित्रवीर्य की मृत्यु भी अल्प आयु में ही हो गई। उनके कोई संतान नहीं थी, अतः कुरु वंश के समाप्त होने का भय उत्पन्न हो गया। ऐसी स्थिति में भीष्म और सत्यवती की इच्छा से वेदव्यास ने विचित्रवीर्य की दोनों विधवा रानियों से नियोग-प्रथा के अनुसार दो पुत्र उत्पन्न किए, जिनके नाम धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए।

भीष्म का जन्म और गंगा-शांतनु मिलन की कथा (भाग 4)

कुरु वंश की पुनर्स्थापना- part 6

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