हस्तिनापुर का कुरु वंश
कुरु वंश की वंशावली पुराणों में ब्रह्मा जी से शुरू की गई है। ब्रह्मा के पुत्र अत्री, अत्री के चंद्रमा, चंद्रमा के बुध, बुध के पुरुरवा और पुरुरवा के पुत्र आयु हुए। आयु के पुत्र नहुष, नहुष के ययाति और ययाति के पुरु हुए। भरत, पुरु के ही वंश में हुए थे, और भरत के वंशज राजा कुरु हुए।
दुष्यंत के पुत्र भरत—भूमन्यु—सुहोत्र—अजमीढ़—ऋक्ष—संवरण—कुरु—अश्ववान (अविक्षित)—जनमेजय—धृतराष्ट्र—प्रतीप—शांतनु (शांतनु के दो भाई और थे; बड़े भाई देवापि तपस्या के लिए वन में चले गए थे, इसलिए शांतनु और बाह्लिक ने राज्य प्राप्त किया)—देवव्रत (भीष्म), चित्रांगद, विचित्रवीर्य (चूँकि देवव्रत ने सिंहासन न लेने का प्रण लिया था, इसलिए क्रमशः चित्रांगद और विचित्रवीर्य राजा बने, लेकिन ये दोनों भाई बिना उत्तराधिकारी छोड़े ही मर गए)—धृतराष्ट्र, पांडु (धृतराष्ट्र बड़े थे, लेकिन दृष्टिहीन होने के कारण छोटे भाई पांडु राजा बने। पांडु द्वारा सिंहासन त्याग के बाद पुनः धृतराष्ट्र राजा बने, लेकिन वास्तविक शक्ति उनके बेटे दुर्योधन के हाथों में थी)।
शाप के कारण कुरु वंश में शांतनु का जन्म
कुरु वंश में शांतनु का जन्म एक शाप के कारण हुआ था। शांतनु पूर्वजन्म में ‘महाभिष’ नामक एक परम प्रतापी और धर्मपरायण राजा थे। उस समय उनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। अपने पुण्यकर्मों के कारण मृत्यु के बाद महाभिष को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई और सभी देवताओं का उन्हें सम्मान प्राप्त हुआ।
महाभिष को ब्रह्मा जी का शाप
एक बार जब वे ब्रह्मा जी की सभा में अन्य अनेक देवताओं और राजर्षियों आदि के साथ बैठे थे, उसी समय देवनदी गंगा ब्रह्मा जी के पास आईं। तभी वायु के झोंके से गंगा जी का वस्त्र ऊपर की ओर उठ गया। उपस्थित अन्य लोगों ने अपनी आँखें झुका लीं, लेकिन महाभिष ने ऐसा नहीं किया और निःशंक होकर देवनदी की ओर देखते ही रहे। उनकी यह अशिष्टता ब्रह्मा जी को बुरी लगी और उन्होंने शाप दिया—“तुम मनुष्य लोक में जन्म लेकर फिर पुण्यलोक में आओगे। जिस गंगा ने यहाँ तुम्हारे चित्त को चुरा लिया है, वही मनुष्यलोक में तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी। जब तुम्हें गंगा पर क्रोध आ जाएगा, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे।”
महाभिष ने जब देखा कि उन्हें फिर मनुष्यलोक में जाना है, तब उन्होंने निश्चय किया कि वे मनुष्यलोक में कुरु वंश के महातेजस्वी राजा प्रतीप के पुत्र बनकर जन्म लेंगे।
शाप के कारण कुरु वंश में भीष्म का जन्म
जैसे परम सत्यनिष्ठ राजा महाभिष को शापवश मनुष्य रूप में शांतनु के रूप में जन्म लेना पड़ा, वैसे ही आठ वसुगणों को भी एक शाप के कारण देवलोक से च्युत होकर मनुष्य लोक में जन्म लेना पड़ा। सात वसु तो जन्म लेते ही इस शरीर से मुक्त हो गए, लेकिन आठवें वसु को लंबे समय तक धरती पर रहना पड़ा—वही आठवें वसु भीष्म थे।
वसुगणों को शाप
धरती पर वशिष्ठ ऋषि एक दिन वृक्षों की आड़ में संध्योपासन कर रहे थे, तब अष्ट (आठ) वसुओं ने उनकी गाय के अपहरण का प्रयास किया। इससे क्रोधित होकर ऋषि वशिष्ठ ने उन सबको मनुष्य शरीर धारण करने का शाप दे दिया। लेकिन क्षमा याचना करने पर उन्होंने कहा—“यद्यपि मैंने तुम सभी वसुओं को शाप दे दिया है, किंतु तुम सब प्रतिवर्ष एक-एक करके शाप से मुक्त हो जाओगे। पर ‘द्यौ’ नामक वसु, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, को मनुष्य लोक में दीर्घकाल तक रहना होगा।” द्यौ वसु के उकसाने पर ही सभी वसु ऋषि की गाय चुराने के लिए गए थे।
गंगा जी द्वारा वसुओं की माता बनना स्वीकार करना
देवनदी गंगा के समक्ष ही ब्रह्मा जी ने महाभिष को शाप दिया था। वे इस समस्त घटनाक्रम को देखकर खिन्न होकर लौट रही थीं। रास्ते में वे राजा महाभिष द्वारा धैर्य खोने के विषय में चिंतन करती हुई जा रही थीं, तभी रास्ते में उन्हें वसु देवतागण दिखे। वसुगणों का शरीर स्वर्ग से नीचे गिर रहा था और उनके चेहरे कांतिहीन हो रहे थे।
गंगा जी के पूछने पर उन्होंने वशिष्ठ ऋषि के शाप के विषय में बताया। चूँकि ऋषि का शाप टाला नहीं जा सकता था, इसलिए सभी वसुओं ने गंगा जी से पृथ्वी पर मानव-पत्नी बनकर अपनी माता बनने का आग्रह किया, ताकि उन्हें किसी मानव स्त्री के गर्भ में न रहना पड़े।
गंगा जी ने उनके पृथ्वी लोक पर होने वाले पिता के बारे में पूछा, तो वे बोले—“राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु लोक-विख्यात साधु पुरुष होंगे, पृथ्वी लोक में वही हमारे पिता होंगे।” उन वसुओं ने गंगा जी से यह भी आग्रह किया कि—“जन्म लेते ही तुम हमें जल में फेंक देना, ताकि मृत्युलोक से हमें शीघ्र ही छुटकारा मिल जाए।” गंगा जी इसके लिए तैयार हो गईं, लेकिन उन्होंने पूछा कि यदि वे उनके पिता के सभी पुत्रों को मार डालेंगी, तो पिता के लिए कोई पुत्र नहीं बचेगा, जो कि उचित नहीं होगा। इस पर वसुगणों ने कहा कि वे सभी गंगा और उस राजा (शांतनु) के एक पुत्र को अपने तेज का एक-एक अंश देंगे, जिससे एक ऐसा पुत्र होगा जो परम पराक्रमी और राजा की इच्छा के अनुरूप होगा, किंतु उस पुत्र की पृथ्वी लोक में कोई संतान नहीं होगी।
यही द्यौ वसु बाद में धरती पर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। सभी वसुओं की शक्ति के कारण उनका पराक्रम और ज्ञान अद्भुत था। पिता से उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान मिला था। गंगा जी और वसुगणों के मध्य इस सहमति के बाद सबने प्रसन्नता के साथ प्रस्थान किया।
राजा प्रतीप का गंगा जी को वचन
समय आने पर पृथ्वी पर भरत वंश में राजा प्रतीप का राज्य हुआ। वे परम प्रतापी, प्रजा के कल्याण के लिए सदैव तत्पर और धर्मस्थित थे। एक बार वे गंगाद्वार (हरिद्वार) में एक आसन पर बैठकर बहुत वर्षों तक जप करते रहे। देवनदी गंगा ने जान लिया कि अब महाभिष और वसुगणों के मनुष्य रूप में जन्म लेने का समय आ गया है। अतः वे एक सुंदर युवती का रूप धारण कर तपस्यारत राजा प्रतीप की दाहिनी जँघा पर जा बैठीं।
राजा की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने काम-प्रस्ताव रखा, लेकिन राजा ने इसे धर्मविरुद्ध बताते हुए अस्वीकार कर दिया और कहा कि वे उसे अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। वास्तव में शास्त्रों के अनुसार पुरुष के शरीर का बायाँ हिस्सा पत्नी या प्रेयसी का होता है, लेकिन गंगा जी दाहिनी जँघा पर बैठी थीं। धर्म-मर्मज्ञ राजा समझ गए कि वह उनसे वास्तव में कोई अन्य संबंध चाहती थी। गंगा जी उनके धर्मयुक्त विचार और अपनी भक्ति देखकर प्रसन्न हुईं और उनकी पुत्रवधू बनकर भरत वंश का सेवन करने का वचन दे दिया।
लेकिन उन्होंने एक शर्त रखते हुए कहा—“मैं एक शर्त पर आपके पुत्र से विवाह करूँगी। मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्र को स्वीकार होना चाहिए।” राजा समझ गए थे कि वह कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि कोई दिव्य स्त्री है, इसलिए उन्होंने उनकी शर्त मान ली।
शांतनु का जन्म
समय आने पर राजा प्रतीप की महारानी कुक्षि ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो शांत पिता की संतान होने के कारण ‘शांतनु’ कहलाए। यह शांतनु वास्तव में राजा महाभिष थे, जो शापवश पृथ्वीलोक में मनुष्य बनकर आए थे। शांतनु प्रजाहितैषी, धर्मस्थित, पराक्रमी और धनुर्वेद के ज्ञाता तो थे ही, अन्य सभी वेदों के ज्ञाता और एक उत्कृष्ट वक्ता भी थे।
शांतनु का राज्याभिषेक
शांतनु जब युवा हुए, तो उनके पिता राजा प्रतीप ने उनसे गंगा के तट पर हरिद्वार में मिली दिव्य स्त्री और उनको दिए गए वचन के विषय में बताया। साथ ही यह भी आदेश दिया कि अगर वह दिव्य स्त्री उन्हें एकांत में मिले और प्रणय-निवेदन करे, तो उससे उसका परिचय आदि पूछे बिना ही उसका निवेदन स्वीकार कर लें; और अगर वह स्त्री उनसे विवाह करना चाहे, तो पिता की आज्ञा समझकर उससे विवाह कर लें। उन्होंने अपने पुत्र को उस स्त्री के किसी कार्य के विषय में पूछताछ करने के लिए भी मना किया।
यह सब बताने के बाद राजा प्रतीप ने उसी समय शांतनु का राजपद पर अभिषेक कर दिया और स्वयं तपस्या के लिए वन में चले गए।
महाराज शांतनु का गंगा जी से विवाह

एक बार राजा शांतनु शिकार करते हुए गंगा तट के वन में अकेले ही घूम रहे थे। वहीं उन्हें एक परम दिव्य सुंदरी स्त्री मिली। उन्होंने उस स्त्री से विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे वह मान गईं। लेकिन साथ ही एक शर्त भी रखी—“मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूँ, उसके लिए आप मुझे रोकेंगे नहीं और मुझसे कभी अप्रिय वचन नहीं कहेंगे।” इस शर्त का उल्लंघन होने पर वह स्त्री (गंगा) शांतनु का साथ छोड़ देतीं।
राजा शांतनु ने इस शर्त को मान लिया, क्योंकि उनके पिता की ऐसी ही आज्ञा थी। दोनों का विवाह हो गया। राजा उस स्त्री का गंगा होना नहीं जानते थे; पिता की आज्ञा के अनुसार उन्होंने उसके नाम, कुल आदि के संबंध में कोई प्रश्न नहीं किया था।




