वन में पांडवों का जन्म कैसे हुआ? कथा और नामकरण (भाग 10)

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हस्तिनापुर के राजा पांडु शिकार करने वन में गए थे, किंतु गलती से एक मुनि-युगल की हत्या होने और उनसे शाप मिलने के बाद वे वन में ही रहकर तपस्वी की तरह कठोर जीवन बिताने लगे। उनकी दोनों पत्नियाँ—कुंती और माद्री—भी उनके साथ ही थीं। वे तीनों पहले नागशत नामक पर्वत पर गए, इसके बाद चैत्ररथ नामक वन में जाकर कालकूट और हिमालय पर्वत को लांघते हुए गंधमादन पर्वत पर चले गए। इसके बाद वे सब शतशृंग पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे। उस वन में रहने वाले ऋषि-मुनि, सिद्ध-चरण आदि इन तीनों की तपस्या और सुहृदय व्यवहार के कारण उनसे बहुत प्रेम करते थे।

पांडु द्वारा पुत्र प्राप्ति की इच्छा

बहुत समय इसी प्रकार बीत गया। एक बार ब्रह्मलोक जाते हुए ऋषि-मुनियों से पुत्र प्राप्ति के महत्त्व को सुनकर पांडु के मन में पुत्र की लालसा हुई। उन्होंने ऋषियों से पुत्र के लिए प्रार्थना की, और ऋषियों ने उन्हें उज्ज्वल कीर्ति वाले पुत्रों का योग बताया।

कुंती द्वारा वरदान के विषय में बतलाना

पांडु यह सुनकर बहुत सोच में पड़ गए, क्योंकि न तो ऋषियों की भविष्यवाणी झूठी हो सकती थी और न ही उनका शाप। उन्होंने एक दिन इसकी चर्चा अपनी बड़ी पत्नी कुंती से की। इस पर कुंती ने विवाह से पूर्व ऋषि दुर्वासा द्वारा उसे दिए गए मंत्र के विषय में बताया। इस मंत्र के प्रभाव से कोई भी देवता आकर अपने जैसे रूप-गुण से संपन्न पुत्र देने के लिए विवश हो जाते थे।

कुंती को धर्मराज द्वारा पुत्र की प्राप्ति

इस वरदान के विषय में सुनकर पांडु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कुंती से देवताओं की कृपा से पुत्र प्राप्त करने के लिए कहा। दोनों ने विचार किया कि सबसे बड़े पुत्र को धर्म का ज्ञान विशेष रूप से होना चाहिए, इसलिए पहला पुत्र धर्मराज के वरदान से उत्पन्न किया जाए।

कुंती ने ऋषि दुर्वासा द्वारा बताई गई विधि से धर्मदेवता का आह्वान किया। धर्मदेव की कृपा से उन्होंने गर्भ धारण किया। समय आने पर, जब सूर्य तुला राशि में विद्यमान थे, शुक्ल पक्ष की ‘पूर्णा’ नाम वाली पंचमी तिथि को अभिजीत नामक आठवें मुहूर्त में युधिष्ठिर का जन्म हुआ। पुत्र-जन्म के तुरंत बाद आकाशवाणी हुई—“यह श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्माओं में अग्रगण्य होगा और इस पृथ्वी पर पराक्रमी एवं सत्यवादी राजा होगा। पांडु का यह प्रथम पुत्र ‘युधिष्ठिर’ के नाम से विख्यात हो तीनों लोकों में प्रसिद्धि एवं ख्याति प्राप्त करेगा। यह यशस्वी, तेजस्वी तथा सदाचारी होगा।”

गांधारी यद्यपि कुंती से एक साल पहले गर्भवती हो गई थीं, किंतु जन्म पहले युधिष्ठिर का हुआ था। युधिष्ठिर के दो साल बाद जिस दिन शतशृंग पर्वत के वन में भीम का जन्म हुआ, ठीक उसी दिन हस्तिनापुर में दुर्योधन का जन्म हुआ था।

वायुदेव से भीम का जन्म

धर्मात्मा पुत्र को पाकर कुंती और पांडु बहुत खुश थे। अब पांडु ने कुंती से क्षत्रियों के अनुकूल एक बलशाली पुत्र उत्पन्न करने का आग्रह किया। इस पर कुंती ने वायुदेव का आह्वान किया। वायुदेव के प्रकट होने पर कुंती ने उनसे ऐसा पुत्र माँगा जो ‘महाबली और विशालकाय होने के साथ ही सबके घमंड को चूर करने वाला हो।’ समय आने पर भीम का जन्म हुआ। भीम के जन्म पर आकाशवाणी हुई—“यह कुमार समस्त बलवानों में श्रेष्ठ है।”

जन्म लेने के दसवें दिन ही शिशु भीम माता की गोद से उस समय गिर गए जब माता अचानक बाघ को देख कर उठ खड़ी हुईं (हालांकि बाघ को पांडु ने तीर से मार डाला था)। आश्चर्यजनक बात यह रही कि जिस चट्टान पर शिशु गिरा, वह चट्टान चूर-चूर हो गई, पर शिशु को कोई हानि नहीं हुई।

इंद्र से अर्जुन का जन्म

दो पुत्रों को पाकर पांडु बहुत प्रसन्न थे। अब उन्होंने इंद्र के समान पराक्रमी पुत्र की कामना की। पतिव्रता कुंती ने विधिपूर्वक इंद्र का आह्वान किया और पांडु ने भी इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एक वर्ष तक कठोर व्रत का पालन किया। फाल्गुन महीने में पूर्वफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के संधिकाल में दिन के समय इस बालक का जन्म हुआ, इस कारण इसका नाम ‘फाल्गुन’ हुआ। उसके जन्म लेते ही आकाशवाणी हुई—“यह बालक कार्तवीर्य अर्जुन के समान तेजस्वी, भगवान शिव के समान पराक्रमी और देवराज इंद्र के समान अजेय होकर तुम्हारे यश का विस्तार करेगा। जैसे भगवान विष्णु ने वामन रूप में प्रकट होकर देवमाता अदिति के हर्ष को बढ़ाया था, उसी प्रकार यह विष्णुतुल्य अर्जुन तुम्हारी प्रसन्नता को बढ़ाएगा।”

यह आकाशवाणी सुनकर शतशृंग निवासी तपस्वी ऋषि-मुनियों, देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं आदि को बड़ा हर्ष हुआ और सबने वहाँ आकर अपना आनंद प्रकट किया।

कुंती का और अधिक संतान उत्पन्न करने से मना करना

तीन उत्तम पुत्रों को पाकर पांडु का पुत्रों के प्रति लालसा और बढ़ने लगी। वे अपनी पत्नी कुंती से कुछ कहना चाहते थे, किंतु कुंती उनके मन्तव्य को समझकर बोली—“आपत्ति काल में भी तीन से अधिक संतान उत्पन्न करने की आज्ञा शास्त्रों ने नहीं दी है। आप धर्म को जानते हुए भी अब फिर मुझे संतानोत्पत्ति के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं?” पांडु ने भी इस बात से सहमति जताई।

नकुल और सहदेव का जन्म

गांधारी को सौ और कुंती को तीन पुत्र हो चुके थे, लेकिन माद्री को अभी तक कोई संतान नहीं थी। माद्री ने एक दिन अपने पति पांडु से संतान के लिए अपनी इच्छा जताई। पांडु ने इसके लिए कुंती से आग्रह किया, और कुंती ने माद्री से किसी देवता का आह्वान करने के लिए कहा। माद्री ने अश्विनीकुमारों का स्मरण किया। दोनों जुड़वा देवों की कृपा से माद्री को दो जुड़वा बेटे हुए, जिनके नाम नकुल और सहदेव रखे गए। दोनों भाइयों का रूप अनुपम था। उनके जन्म पर आकाशवाणी ने कहा—“ये दोनों बालक अश्विनीकुमारों से भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणों से संपन्न होंगे। अपने तेज और बढ़ी-چढ़ी रूप-संपत्ति द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे।”

पाँचों भाइयों का नामकरण संस्कार

इसके बाद शतशृंग के निवासी ऋषि-मुनियों ने पाँचों भाइयों का उनके रूप-गुण-कर्म के आधार पर विधिवत नामकरण किया। ये सभी भाई प्रति एक-एक वर्ष के अंतराल पर उत्पन्न हुए थे—अर्थात वे युधिष्ठिर से एक साल छोटे भीम, उनसे एक साल छोटे अर्जुन और उनसे एक साल छोटे नकुल-सहदेव थे।

शतशृंग निवासियों को ये पाँचों भाई बहुत ही प्रिय थे। वे सभी उन्हें जन्मकाल से ही अपने पुत्रों की तरह मानते थे। पांडु का पुत्र होने के कारण ये सभी भाई ‘पांडव’ कहलाए, और यह नाम उन्हें वहीं के ऋषि-मुनियों ने दिया था।

कुंती का वास्तविक नाम पृथा था, जो अपने पिता कुंतिभोज के नाम पर कुंती कहलाई। इसलिए उनके तीनों पुत्रों—युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन—को ‘पार्थ’ एवं ‘कौंतेय’ भी कहा गया, जबकि नकुल और सहदेव अपनी माँ के नाम पर ‘माद्रेय’ कहे जाते थे।

पांडवों के संस्कार (मुंडन, जनेऊ, वेदाध्ययन)

पांडु और उनकी पत्नियों के वनवासी तपस्वी जीवन के समाचार से हस्तिनापुर में तो दुःख था ही, कुंती के जैविक माता-पिता और सगे-संबंधी मथुरा के यादववंशी भी बड़े दुखी थे। आने-जाने वाले लोगों द्वारा इन दोनों स्थानों को उनकी खबरें कभी-कभार मिल जाया करती थीं। उनके पुत्र होने की खबर से सभी बहुत खुश हुए। कुंती के भाई वसुदेवजी ने वृष्णि यादवों से विचार-विमर्श कर शतशृंग वन में पांडवों के संस्कार करने के लिए अपने पुरोहित काश्यप को बहुत सारे उपहारों के साथ भेजा।

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