राम-लक्ष्मण ने ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम ‘सिद्धाश्रम’ जाते समय मार्ग में जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया, वह था ताटका वध।
1. ताटका वध का कारण और स्त्री-हत्या का संशय
भगवान राम के जन्म का एक मुख्य उद्देश्य राक्षसों का संहार करना था, क्योंकि ये राक्षस सन्मार्ग पर चलने वाले लोगों पर अत्याचार करते थे और उनके धर्म-कर्म में रुकावट डालते थे। जब उन्होंने यह कार्य शुरू किया तब उनकी आयु लगभग सोलह वर्ष की थी।
उनके हाथों मारा जाने वाला पहला राक्षस कोई पुरुष नहीं, बल्कि एक स्त्री यानी राक्षसी ताटका थी। धर्म के मर्म को जानने वाले भगवान राम ताटका का वध नहीं करना चाहते थे, क्योंकि शास्त्रों में स्त्री-हत्या वर्जित है। लेकिन विश्वामित्र के आदेश और परिस्थितियों के कारण उन्हें यह करना पड़ा।
2. ताटका कौन थी? (उत्पत्ति और वरदान का रहस्य)
ताटका वास्तव में एक यक्षणी थी, जो शापवश राक्षसी हो गई थी। उसके पिता यक्षराज सुकेतु को कोई संतान नहीं थी, जिसके लिए उन्होंने घोर तपस्या की थी।
ब्रह्मा जी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक हजार हाथियों के बल से युक्त कन्या होने का वरदान दिया। ताटका इसी वरदान का फल थी।
3. विवाह, सुन्द की मृत्यु और अगस्त्य ऋषि का शाप
बड़ी होने पर ताटका का विवाह जम्भ के पुत्र सुन्द के साथ हुआ, जिससे उन्हें मारीच नामक पुत्र हुआ।
- ऋषि का शाप: एक बार सुन्द ने ऋषि अगस्त्य का अपमान कर दिया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने सुन्द को मार डाला।
- अपने पति की मृत्यु का बदला लेने के लिए ताटका और मारीच ने जब ऋषि अगस्त्य पर आक्रमण करना चाहा, तब ऋषि ने क्रोधित होकर दोनों को राक्षसी योनि में जाने का शाप दे दिया। तभी से वे भयंकर नरभक्षी राक्षसी बन गए।
4. ताटका का आतंक और राम द्वारा वध
शाप के बाद ताटका और मारीच ने उस पूरे क्षेत्र में भारी आतंक मचा रखा था। उन्होंने मलद और करुष जनपदों को पूरी तरह उजाड़ दिया था, जिसके कारण उस वन का नाम ही ‘ताटका वन’ पड़ गया था। उस रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति की मृत्यु निश्चित थी।
जब विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण वहाँ से गुजरे, तो ऋषि ने राम को स्त्री-हत्या के संशय को दूर करते हुए ताटका का वध करने का आदेश दिया। पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीराम ने अपने शक्तिशाली धनुष की टंकार से ताटका को ललकारा और युद्ध के बाद उसका वध कर उस वन को भयमुक्त किया।
यहाँ श्रीराम को विश्वामित्र ने एक ऐसी शिक्षा दिया जिसको उन्होने पूरे जीवन स्मरण रखा और जिया। यह शिक्षा थी कि राजा को अपनी आम जनता के लिए कल्याण के लिए अपने व्यक्तिगत भावना से हमेशा अधिक होनी चाहिए। वे स्त्री वध नहीं करना चाहते थे क्योंकि ऐसा धर्म के विरुद्ध होता।
लेकिन विश्वामित्र जी ने उन्हें समझाया वह कोई साधारण स्त्री नहीं थी बल्कि ऐसी स्त्री थी जो अन्य लोगों के जीवन और समृद्धि के लिए भयंकर खतरा बन गई थी। ऐसी स्थिति में में स्त्री वध अधर्म नहीं होता। इससे उन्हें धर्म के वृहत्तर व्यावहारिक पक्ष का ज्ञान हुआ।
यही कारण था कि आगे चल कर ‘ब्राह्मण’ रावण का उसके बंधु-बंधवों के साथ वध उन्होने धर्म की दृष्टिगत रख कर किया।
ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को क्यों और किस उद्देश्य से अपने साथ ले गए थे? (भाग 6)




