संजीवनी औषधि के दिव्य प्रभाव से जब लक्ष्मण जी स्वस्थ हुए, तो उन्होंने श्रीराम से निवेदन किया—“हे भ्राता! आप शीघ्र ही रावण का वध करके विभीषण को लंका का राजा बनाने की अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण कीजिए।” अनुज के इन शौर्यपूर्ण वचनों को सुनकर श्रीराम भी रावण के वध का अंतिम संकल्प लेकर धनुष-बाण हाथ में लेकर खड़े हो गए।
रावण का पुनः समरांगण में प्रवेश एवं मातलि का आगमन
थोड़े विश्राम के उपरांत रावण नवीन रथ पर सवार होकर पुनः समरांगण में आ पहुँचा। श्रीराम ने उस पर बाणों की तीव्र बौछार प्रारंभ कर दी। रावण के अतिरिक्त अब लंका का कोई भी सेनापति या योद्धा जीवित नहीं बचा था, अतः आकाश में स्थित समस्त देवता उत्सुकता से इस अंतिम महासंग्राम को देखने लगे।
जब देवराज इंद्र ने देखा कि रावण तो रथ पर सवार है, किंतु श्रीराम भूमि पर पैदल ही युद्ध कर रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत अपने दिव्य रथ और सारथी मातलि को श्रीराम की सेवा में भेजा। मातलि के ससम्मान प्रार्थना करने पर श्रीराम उस दिव्य देव-रथ की परिक्रमा करके उस पर आरूढ़ हुए। इसके पश्चात दोनों महारथियों के मध्य ‘द्वैरथ युद्ध’ (दो रथियों का प्रत्यक्ष युद्ध) प्रारंभ हुआ। रावण दस मस्तक और बीस भुजाओं के साथ अपने मायावी रूपों का प्रदर्शन कर रहा था।

रावण का पुनः पराजित होकर लौटना एवं आदित्यहृदय स्तोत्र
भीषण युद्ध के दौरान श्रीराम और रावण दोनों ही घायल हुए। पर श्रीराम के दिव्य अस्त्रों के आघात से रावण इस कदर विचलित हो गया कि उसके हाथों से धनुष छूट गया और वह निढाल होकर रथ पर गिर पड़ा। उसकी ऐसी दयनीय स्थिति देखकर उसका बुद्धिमान सारथी रथ को युद्धभूमि से निकालकर लंका ले आया।
चेतना लौटने पर रावण ने रणभूमि से भाग आने के लिए सारथी को फटकारा, किंतु सारथी ने नीतिपूर्ण वचनों से उसे शांत किया। यह तीसरा अवसर था जब रावण पराजित होकर भागा था, फिर भी उसने हठ नहीं छोड़ा और पुनः युद्ध हेतु निकला।
इसी बीच महामुनि अगस्त्य समरांगण में प्रकट हुए और उन्होंने श्रीराम को भगवान सूर्य की उपासना हेतु अमोघ ‘आदित्यहृदय स्तोत्र’ का उपदेश दिया। श्रीराम ने आचमन करके विधिपूर्वक तीन बार इस स्तोत्र का पाठ किया। सूर्यदेव ने आकाश से प्रकट होकर परम प्रसन्नता से कहा—“हे रघुनंदन! अब शीघ्रता कीजिए और रावण का संहार कीजिए।”
अंतिम महासंग्राम एवं रावण के मस्तक कटना
रावण का रथ पुनः आता हुआ दिखा। राम ने अपने सारथी मातलि के अनुभव और कार्यों की प्रशंसा करते हुए कुछ सावधानी बताया क्योंकि उनके शत्रु राक्षस माया और छल करने में सिद्धहस्त थे।
राम-रावण पुनः एक-दूसरे के सामने आ गए और घोर युद्ध शुरू हो गया। वे दोनों बाणों के साथ ही अन्य अस्त्र-शस्त्र भी चला रहे थे। दोनों के सारथी भी अद्भुत कौशल दिखा रहे थे।
दोनों सेनाएँ अपने-अपने स्वामियों का अकल्पनीय रोमांचक युद्ध देखने के लिए प्रहार रोककर स्तंभित खड़ी रह गईं। वे अपने-अपने नायकों को विस्मित होकर देख रहे थे।
पर जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया, राम को अपनी जीत का और रावण को अपनी मृत्यु का निश्चय होने लगा।
श्रीराम ने अपने एक तीखे बाण से रावण का मस्तक काट डाला। इसके बाद शुरू हुआ रावण का मायावी युद्ध। उसका कटा हुआ मस्तक जमीन पर पड़ा था पर उस कटे हुए मस्तक की जगह उसकी गर्दन पर ठीक वैसा ही नया मस्तक उत्पन्न हो गया। राम अपने तीक्ष्ण बाणों से रावण का नया मस्तक काट गिराते, किंतु कटते ही उसके स्थान पर वैसा ही नया पुनः उत्पन्न हो जाता। श्रीराम ने रावण के सौ से अधिक मस्तक काट गिराए, किंतु वह निरंतर पुनः उग आता था। श्रीराम इस रहस्य पर विचार करने लगे, फिर भी निरंतर बाण चलाकर उसकी छाती को बिंधते रहे। रावण भी क्रुद्ध होकर गदा और मूसल, आदि से प्रहार कर रहा था।
दिन बीत गया और पूरी रात भी बीत गई। रावण माया के कारण रूप और स्थान बदल कर प्रहार करता था। राम भी उसी तरह अस्त्रों से उसका प्रत्युत्तर देते थे। अतः युद्ध आकाश, पृथ्वी और पर्वतों पर अनवरत चलता रहा।
मातलि द्वारा ब्रह्मास्त्र का स्मरण एवं रावण का वध (सर्ग 108)
युद्ध को अनवरत चलता देख इंद्र के सारथी मातलि ने श्रीराम से प्रार्थना की:
“हे प्रभु! आप सर्वज्ञ होकर भी सामान्य योद्धा की भाँति केवल इसके बाणों को क्यों काट रहे हैं? देवताओं द्वारा रावण के वध का निर्धारित समय आ पहुँचा है। आप इसके अंत हेतु ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त अमोघ ‘ब्रह्मास्त्र‘ का संधान कीजिए!”
मातलि के स्मरण कराने पर श्रीराम को उस दिव्य ब्रह्मास्त्र की याद आई, जो महर्षि अगस्त्य ने उन्हें पंचवटी आश्रम में प्रदान किया था।
श्रीराम ने उस महाअस्त्र को धनुष पर संधानित किया और रावण के वक्षस्थल (छाती) को लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह ब्रह्मास्त्र वायु की गति से छूटा और रावण की छाती को चीरता हुआ उसके प्राण हरकर पृथ्वी में समा गया, तथा पुनः स्वतः शुद्ध होकर श्रीराम के तरकश में लौट आया।
प्राणहीन होकर रावण रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही बची-खुची राक्षस सेना भाग खड़ी हुई। जो बच गए, वानरों ने उन्हे मार-मार कर नगर में भेज दिया।
वानर सेना जयघोष करने लगी। देवताओं ने दुंदुभियाँ बजाईं और पुष्प-वर्षा की। समस्त लोकों में भयमुक्ति का आनंद छा गया।
श्रीराम की आज्ञा से सारथी मातलि देवराज इंद्र के रथ को लेकर स्वर्ग लौट गया।
[स्पष्टीकरण: वाल्मीकि रामायण के संदर्भ में कुछ प्रचलित धारणाओं का यथार्थ:
- नाभि में अमृत कुंड की दंतकथा:
- वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ में रावण की नाभि में अमृत होने या विभीषण द्वारा यह भेद बताने का कोई उल्लेख नहीं है। मातलि द्वारा स्मरण कराने पर श्रीराम ने अगस्त्य मुनि द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण के वक्षस्थल का भेदन करके उसका वध किया था।
- ‘घर का भेदी लंका ढाए’ एवं विभीषण की भूमिका:
- विभीषण ने एक धर्मनिष्ठ मित्र, रणनीतिकार और योद्धा के रूप में श्रीराम का साथ दिया। उन्होंने केवल मेघनाद के गुप्त ‘निकुंभिला यज्ञ’ की सूचना दी थी, जिसे निष्फल करना धर्मरक्षा हेतु अनिवार्य था। रावण वध में विभीषण द्वारा किसी अनैतिक भेद का उल्लेख मूल ग्रंथ में नहीं मिलता।
- लक्ष्मण का रावण से ज्ञान प्राप्त करने का प्रसंग:
- यह कथा पूर्णतः प्रामाणिक ग्रंथों से परे और जनश्रुति मात्र है। वाल्मीकि रामायण में कहीं भी श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने भेजने का वर्णन नहीं है। श्रीराम के पक्ष में महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, अगस्त्य और स्वयं हनुमान जी जैसे ज्ञानी विद्यमान थे। कुलनाशक, कामी, अहंकारी और परस्त्रीगामी रावण को चरित्र या ज्ञान का अनुकरणीय आदर्श मूल रामायण में कहीं नहीं माना गया है।
- मंदोदरी व अन्य रानियों का अंतिम कथन:
- रावण की मृत्यु पर उसकी पटरानी मंदोदरी स्वयं स्वीकार करती है:
“हे नाथ! आपने प्रारंभ में अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की थी, किंतु अंत में उन्हीं इंद्रियों ने बदला लेते हुए आपको अपने वश में कर लिया, जिसके कारण आज आपकी यह गति हुई।” (सर्ग 111, श्लोक 15)
- अन्य पत्नियाँ भी यही विलाप करती हैं कि हितैषियों और विभीषण की नीतिसंगत सलाह न मानकर तथा सीता का अपहरण करके रावण ने स्वयं अपनी मृत्यु को निमंत्रण दिया (सर्ग 110, श्लोक 18-19)।
अर्थात रावण के अपने परिजन भी उसकी मृत्यु के लिए स्वयं उसके कर्मों को ही दोष देते हैं।
