श्रीकृष्ण ने सुदर्शन यक्ष का उद्धार कैसे किया? – भाग 29

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श्रीकृष्ण ने शापवश अजगर बने सुदर्शन यक्ष को अपने चरण-स्पर्श से मुक्ति दिलाई थी। श्रीमद्भागवत महापुराण में यह कथा इस प्रकार वर्णित है:

श्रीकृष्ण द्वारा सुदर्शन यक्ष का उद्धार

एक बार शिवरात्रि के अवसर पर नन्द बाबा और अन्य गोप अंबिका वन गए। वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी में स्नान किया तथा भगवान शंकर एवं देवी अंबिका की विधिपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणों को दान दिया। सभी गोपों का उस दिन उपवास था, इसलिए रात्रि को जल पीकर वे वहीं सरस्वती नदी के तट पर सो गए।

संयोगवश उस वन में एक बहुत बड़ा और भयानक अजगर रहता था, जो उस समय भूखा था। वह घूमते-घूमते उधर ही आ निकला और उसने सोए हुए नन्द बाबा को अपने पाश में जकड़ लिया। नन्दजी ने अपनी जान बचाने के लिए जोर से श्रीकृष्ण को पुकारा। उनकी पुकार सुनकर सभी गोप जग गए और यथासंभव उन्हें उस अजगर से छुड़ाने का प्रयास करने लगे, किंतु वे असफल रहे।

इतने में वहाँ श्रीकृष्ण आ पहुँचे। उन्होंने अपने श्रीचरणों से उस अजगर को छू दिया। भगवान के चरण-कमलों का स्पर्श पाते ही वह अजगर तुरंत अपने उस घोर शरीर को छोड़कर एक अत्यंत सुंदर और तेजोमय विद्याधर पुरुष के रूप में प्रकट हो गया।

वह विद्याधर साक्षात श्रीकृष्ण को प्रणाम कर हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया। भगवान के पूछने पर उसने अपने पूर्व जन्म और शाप की कथा सुनाई।

सुदर्शन यक्ष के शाप की कथा

वह अजगर वास्तव में सुदर्शन नामक एक गंधर्व (या विद्याधर) था। वह जितना सुंदर था, उतना ही अपने रूप-धन पर घमंड करता था। एक बार जब वह अपने विमान पर सवार होकर घूम रहा था, तब उसने अंगिरा गोत्र के कुछ तपस्वी ऋषियों को देखा, जो रूप से कुरूप थे। विद्याधर सुदर्शन ने अपने सौंदर्य के अभिमान में उन ऋषियों का उपहास उड़ाया और मज़ाक उड़ाया। इससे क्रोधित होकर ऋषियों ने उसे अजगर हो जाने का शाप दे दिया था।

उस विद्याधर ने ऋषियों के उस शाप को अपने लिए परम कल्याणकारी माना, क्योंकि उसी शाप के माध्यम से उसे साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का दुर्लभ स्पर्श प्राप्त हुआ, जिससे उसके समस्त अशुभ कर्मों और पापों का नाश हो गया। उसने कृतज्ञतापूर्वक श्रीकृष्ण की स्तुति की, उनकी परिक्रमा की और उनसे आज्ञा लेकर अपने दिव्य लोक को प्रस्थान किया।

इस समस्त विस्मयकारी घटना को देखकर सभी ब्रजवासी अचरज में पड़ गए। अपना व्रत और पूजन संपन्न कर वे बड़े प्रसन्न मन से श्रीकृष्ण की अलौकिक लीला का गान करते हुए सकुशल ब्रज में लौट आए।

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