श्रीकृष्ण ने गोपाल के रूप में कौन-सी लीलाएँ की? – भाग 15

Share

श्रीकृष्ण का गोपाल बनना

अब तक कृष्ण छह वर्ष के हो चुके थे। इस उम्र को पौगंड अवस्था कहा जाता था। अतः गोप परंपरा के अनुसार उन्हें अब गाय चराने की अनुमति मिल गई। छह वर्ष से कम आयु के बालक केवल गाय के बच्चों, यानी बछड़ों को चराया करते थे।

आगे-आगे गायें, उनके पीछे बासुरी बजाते कृष्ण, उनके पीछे बलरामजी और उनके पीछे अन्य ग्वालबाल गाय चराने गोवर्धन पर्वत की तराई और यमुना नदी के तट पर जाया करते थे। वृंदावन की सुंदरता भगवान को बहुत अच्छी लगती थी।

गोपाल लीलाएँ

अपने ऐश्वर्यमयी रूप को अपनी योगमाया से छिपाकर कृष्ण एक सामान्य ग्वालबाल की तरह व्यवहार करते थे। वन में दोनों भाई अपने सखाओं के साथ तरह-तरह के खेल खेलते थे—कभी भौरों के साथ गूँजन, तो कभी राजहंसों के साथ क्रंदन, कभी मयूरों के साथ नर्तन, तो कभी बादलों के साथ गर्जन, और कभी किसी हिंसक जीव का गर्जन कर सखाओं को भयभीत करना, इत्यादि। कभी नृत्य, तो कभी कुश्ती और कभी ऐसा करने वाले बालकों को प्रोत्साहित करना। कभी जब खेल कर बड़े भाई थक जाते और किसी सखा की गोद में लेट जाते, तो कृष्ण उनके पैर दबाकर उनकी थकान उतारते थे।

शाम को जब सभी ग्वालबाल गाय चराकर लौटते, तो ब्रज की गोप-गोपियाँ उनके अद्भुत रूप को देखने के लिए रास्ते में खड़ी रहती थीं। कृष्ण की बाँसुरी की धुन सुनकर गोपियाँ अपने घरों से बाहर आकर मार्ग में उनकी प्रतीक्षा करती थीं।

इस तरह वे अपनी विभिन्न लीलाओं द्वारा ब्रजवासियों को आनंदित करते रहते थे। ब्रज का प्रत्येक वासी कृष्ण-प्रेम का साक्षात मूर्त रूप था।

कृष्ण के प्रेम में वृंदावन के सभी उम्र के स्त्री-पुरुष थे। वे अपनी उम्र के ग्वालबालों में भी उतने ही प्रिय थे। बड़ी उम्र के गोप-गोपियाँ वात्सल्य भाव से उन्हें देखा करते थे।

गोपाल रूप में उन्होंने कई राक्षसों का संहार भी किया, जो उन्हें मारने आए थे। उनकी गोपाल लीलाओं में से एक विहार यात्रा का भी वर्णन भागवत में है। यह यात्रा कालिया नाग मर्दन के बाद ग्रीष्म ऋतु में हुई थी, जिसका वर्णन इस प्रकार है:

श्रीकृष्ण और बलराम का अपने मित्रों के साथ विहार यात्रा

यद्यपि उन दिनों ग्रीष्म ऋतु थी, जो शरीरधारियों को बहुत प्रिय नहीं होती, लेकिन वृंदावन में फिर भी वसंत की तरह प्राकृतिक छटा थी। ऐसा सुंदर वन देखकर श्रीकृष्ण और बलराम जी ने विहार करने की इच्छा की।

आगे-आगे गाय और पीछे-पीछे ग्वालबाल, बीच में अपने बड़े भाई के साथ बाँसुरी बजाते हुए श्रीकृष्ण चले। रास्ते में तरह-तरह के शृंगार करते, नाचते-गाते और विभिन्न खेल खेलते हुए वे सब परम आनंद के साथ चले जा रहे थे। इस तरह बलराम और श्याम वृंदावन की नदी, पर्वत, घाटी, सरोवरों आदि में ऐसे सभी खेल खेलते, जो साधारण बच्चे संसार में खेला करते हैं।

इस तरह की विहार यात्राएँ कृष्ण-बलराम ने अपने मित्रों के साथ एक से अधिक बार की थीं। ग्रीष्म बीतने के बाद वर्षा ऋतु का आगमन हुआ। वर्षा ऋतु में वृंदावन की शोभा और भी निखर जाती थी। पके हुए खजूर और जामुन उसे और शोभायमान कर रहे थे। उसी वन में विहार करने के लिए श्याम और बलराम ने ग्वालबालों और गायों के साथ प्रवेश किया।

गायों को जब श्रीकृष्ण उनके नाम से पुकारते, तब वे प्रेम एवं वात्सल्य में मग्न होकर जल्दी-जल्दी दौड़ने लगती थीं। उस समय उनके थनों से दूध की धार बहने लगती थी। भगवान ने देखा कि वनवासी भील और भीलनियाँ आनंदमग्न हैं। वृक्षों की नई पत्तियाँ और पंक्तियाँ मदमस्त हो रही हैं। पर्वतों से झरने गिर रहे हैं, और उन झरनों की आवाज बड़ी सुहावनी थी। साथ ही, वर्षा होने पर छिपने के लिए बहुत सी गुफाएँ भी थीं। जब वर्षा होने लगती, तब श्रीकृष्ण कभी किसी वृक्ष की गोद में तो कभी उसके कोटर में छुप जाते थे। कभी-कभी कंदमूल खाकर ग्वालबालों संग खेल खेलते रहते थे।

कृष्ण-बलराम का गाय चराकर वापस लौटने का दृश्य

शाम को बलराम जी के साथ श्रीकृष्ण गायों को लेकर बंसी बजाते हुए घर को लौट चले। रास्ते में ग्वालबाल उनकी स्तुति करते आ रहे थे। गोपियों को श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण एक युग की तरह लगता था। जब श्रीकृष्ण इस तरह वंशी बजाते हुए आते, तब उनका दर्शन करके वे परमानंद में मग्न हो जाती थीं। इस तरह आनंदपूर्वक ब्रजवासियों के दिन बीत रहे थे।

Leave a Comment

Scroll to Top