श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण पत्नियों से क्यों भोजन माँगा? – भाग 22

Share

ब्राह्मणों से भोजन की याचना 

एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम अन्य ग्वालबालों के साथ गाय चराते हुए दूर निकल गए। ग्रीष्म ऋतु थी और सूर्य की किरणें प्रखर हो रही थीं, लेकिन घने वृक्ष उन पर छाया कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों से इन वृक्षों की महिमा और उनके द्वारा किए गए उपकार के बारे में चर्चा की। बातें करते हुए वे लोग यमुना तट पर पहुँच गए। यमुना जी का शीतल और स्वच्छ जल उन्होंने स्वयं भी पिया और अपनी गायों को भी पिलाया। इसके बाद गायें यमुना जी के तट पर चरने लगीं।

श्रीकृष्ण के मित्र स्तोककृष्ण, अंशु, श्रीदामा, सुबल, अर्जुन, विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ, वरुथप इत्यादि उनके साथ थे। इन ग्वालबालों ने श्रीकृष्ण और श्रीबलराम से निवेदन किया कि वे उनके लिए कुछ खाने का प्रबंध करें, क्योंकि वे भूखे थे। श्रीकृष्ण इसी बहाने मथुरा के पास यज्ञ कर रहे उन ब्राह्मणों की पत्नियों पर अनुग्रह करना चाहते थे।

श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों से कहा कि यहाँ से थोड़ी दूरी पर ही वेदपाठी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से अंगिरस नामक यज्ञ कर रहे हैं। तुम लोग वहाँ जाओ और हम दोनों भाइयों का नाम लेकर भोजन-सामग्री माँग लाओ।

ग्वालबालों ने वहाँ जाकर श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार ही ब्राह्मणों से भोजन की माँग की, लेकिन उन ब्राह्मणों ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने ‘हाँ’ या ‘ना’ कुछ भी नहीं कहा। उनसे निराश होकर वे ग्वालबाल लौट आए और श्रीकृष्ण को सारा वृत्तांत बताया।

ब्राह्मण-पत्नियों से भोजन की याचना

श्रीकृष्ण ने इस बार उन्हें ब्राह्मण-पत्नियों के पास जाकर उनसे भोजन-सामग्री उसी तरह दोनों भाइयों के नाम से माँगने के लिए कहा। ग्वालबालों ने ऐसा ही किया। इन ब्राह्मण-पत्नियों ने श्रीकृष्ण की लीलाएँ सुन रखी थीं और उनकी तीव्र अभिलाषा उनके दर्शन करने की थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ आए हुए हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्नता से उतावली हो गईं और बर्तनों में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन लेकर, अपने पति और पुत्रों द्वारा रोके जाने पर भी श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए चल पड़ीं।

ब्राह्मण-पत्नियों द्वारा स्वयं आकर कृष्ण और उनके मित्रों को भोजन देना

उन ब्राह्मण-पत्नियों ने वहाँ आकर देखा कि यमुना तट पर नए-नए कोंपलों से शोभायमान अशोक वन में श्रीकृष्ण और बलराम अन्य ग्वालबालों से घिरे हुए हैं। जिनके विषय में वे सुनती आ रही थीं, वे श्रीकृष्ण आज उनके प्रत्यक्ष सामने थे।

वे एक हाथ अपने सखा के कंधे पर रखे हुए थे और दूसरे में कमल का फूल नचा रहे थे। सांवले शरीर पर सुनहरा पीतांबर, गले में वनमाला, मस्तक पर मोरपंख का मुकुट, अंगों में रंगीन धातुओं से की गई चित्रकारी और शरीर पर नए-नए कोंपलों के गुच्छे लटक रहे थे। उनका यह शृंगार उन्हें एक सुंदर नट की तरह का वेश दे रहा था।

उनके प्रेम से सरोबार ब्राह्मण-पत्नियों ने उनका यह दिव्य रूप अपनी आँखों से देखा। इस रूप को वे अपने हृदय में बसाकर मन-ही-मन उनका आलिंगन करती रहीं।

कृष्ण द्वारा उनका अभिनंदन और लौटने के लिए कहना

भगवान जानते थे कि ये सभी अपने पति-पुत्रों और बंधु-बांधवों के रोकने पर भी उनके दर्शन की लालसा में यहाँ आई हैं। श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत और अभिनंदन किया।

फिर यह कहकर उन्हें घर लौट जाने के लिए कहा कि “अब तुम लोग मेरे दर्शन कर चुकी हो, अतः अपनी यज्ञशाला में लौट जाओ। तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं, वे तुम्हारे साथ मिलकर ही अपना यज्ञ पूरा कर सकेंगे।”

इस पर उन ब्राह्मण-पत्नियों ने कहा कि श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसार में लौटना नहीं पड़ता है। आप अपनी वेद-वाणी सत्य कीजिए। हम आपके चरणों में आ पड़ी हैं, हमें और किसी का सहारा नहीं है। इसीलिए हमें अब दूसरों की शरण में न जाना पड़े, ऐसी व्यवस्था कीजिए।

श्रीकृष्ण ने कहा कि अब सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा, क्योंकि तुम मेरी हो गई हो, मुझसे युक्त हो गई हो। तुम जाओ और अपना मन मुझ में लगा दो, तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जाएगी।

ब्राह्मण-पत्नियों का लौटना और एक पत्नी का कृष्ण में लीन होना

भगवान के समझाने पर वे सब अपनी यज्ञशाला में लौट आईं। उनके पतियों ने उन पर कोई दोष-दृष्टि नहीं डाली और उनके साथ मिलकर यज्ञ पूरा किया।

उन ब्राह्मण-पत्नियों में से एक को उसके पति ने बलपूर्वक रोक लिया था। उस ब्राह्मण-पत्नियों ने भगवान का जैसा रूप सुन रखा था, उसका ध्यान किया और ध्यान में ही उनका आलिंगन करते हुए कर्म से बने इस भौतिक शरीर का त्याग कर दिया तथा दिव्य शरीर से भगवान का सामीप्य प्राप्त कर लिया।

ब्राह्मणों का पश्चाताप

इधर ब्राह्मणों को जब ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं, तो वे अत्यंत पछतावे के साथ अपनी निंदा करने लगे। उनके मन में भी श्रीकृष्ण-बलराम के दर्शन की तीव्र अभिलाषा हुई, किंतु कंस के भय से वे जा नहीं सके।

लक्ष्मीपति भगवान को भोजन माँगने की कोई आवश्यकता नहीं थी, उन्होंने तो इन ब्राह्मण-पत्नियों पर कृपा करने के लिए ही उनसे भोजन-सामग्री मँगवाई थी। श्रीकृष्ण ने उनके द्वारा लाई गई भोजन-सामग्री में से पहले अपने मित्रों को भोजन कराया और फिर स्वयं भी भोजन किया।

श्रीकृष्ण ने गोपियों का वस्त्र हरण क्यों किया था? – भाग 21

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को क्यों उंगली पर उठाया? – भाग 23

Leave a Comment

Scroll to Top