श्रीकृष्ण-बलराम ने प्रलंबासुर का वध क्यों और कैसे किया? – भाग 19

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प्रलंबासुर द्वारा कृष्ण-बलराम के अपहरण का प्रयास    

एक दिन जब बलराम और श्रीकृष्ण वृंदावन में ग्वालबालों के साथ गाय चरा रहे थे, तब ग्वाल के वेश में प्रलंबासुर नाम का एक असुर आया। उसका उद्देश्य कृष्ण और बलराम का अपहरण कर ले जाना था। सर्वज्ञ भगवान उसे देखते ही पहचान गए, फिर भी उन्होंने उसकी मित्रता का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वे मन-ही-मन उसके वध की युक्ति सोच रहे थे।

कृष्ण द्वारा खेल का निर्णय

कृष्ण ने प्रलंबासुर का उद्देश्य जानते हुए उसे अपना काम करने का अवसर देने के लिए एक खेल खेलने के लिए सभी ग्वालबालों से कहा। इस खेल में सभी ग्वालबाल दो दलों में बँट जाते थे और दोनों दलों के नायक दोनों भाई (कृष्ण और बलराम) थे। दोनों दलों ने बहुत से खेल खेले। एक खेल ऐसा था, जिसमें जीतने वाले दल के सदस्य को हारने वाले दल का सदस्य अपनी पीठ पर लादकर एक निश्चित स्थान तक ले जाता था।

प्रलंबासुर द्वारा बलराम जी का अपहरण

प्रलंबासुर जानता था कि वह श्रीकृष्ण को नहीं हरा पाएगा, इसलिए वह बलराम जी के दल में शामिल हो गया था। इस खेल में एक बार बलराम जी का दल जीत गया। नियम के अनुसार हारने वाले दल के सदस्यों को जीतने वाले दल के सदस्यों को अपनी पीठ पर लादकर ले जाना था। इस खेल में श्रीकृष्ण ने श्रीदामा को और प्रलंबासुर ने बलराम जी को अपनी पीठ पर उठाया।

किंतु प्रलंबासुर बलराम जी को निश्चित स्थान पर उतारने के बजाय वहाँ से दूर भगाकर ले चला।

प्रलंबासुर का वध

बलराम जी को वह राक्षस दूर ले तो गया, लेकिन उनके असह्य भार को वह अधिक समय तक संभाल नहीं सका। इसलिए उसने अपना असली असुर वाला भयंकर रूप प्रकट किया और उन्हें लेकर आकाश में उड़ गया।

तब बलराम जी ने क्रोधित होकर एक जोरदार घूँसा उसके सिर पर दे मारा। इस प्रहार से उसका सिर चूर-चूर हो गया और उसके मुँह से खून बहने लगा। उसकी चेतना जाती रही और वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर आ गिरा। जब ग्वालबालों ने देखा कि बलराम जी ने प्रलंबासुर का वध कर दिया है, तब उनके आश्चर्य की सीमा न रही।

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