रामायण में मुख्य खलनायक वैसे तो रावण है, जो बहुत ही बलशाली और कई विशेष गुणों से संपन्न था। लेकिन उसके अलावा भी कई बलशाली और विचित्र खलपात्रों या राक्षसों का इसमें उल्लेख है, जिन्हें राम ने मारा।
रामायण का ऐसा ही एक विचित्र खलपात्र कबंध है। कबंध का शाब्दिक अर्थ होता है “जिसका केवल धड़ हो” अर्थात जिसका सिर न हो। यह बिना सिर का एक विचित्र राक्षस था। इस राक्षस के संबंध में एक विशेष बात यह भी है कि इसका वध राम ने उसी दिन किया था, जिस दिन सीता का अपहरण हुआ था।

चूँकि जटायु ने दक्षिण दिशा में रावण द्वारा सीता को ले जाने की बात बताई थी, इसलिए उस स्थान से दक्षिण-पश्चिम में वन अधिक गहन था। वहाँ रहने वाले वनवासी बाहरी लोगों से बहुत कम संबंध रखते थे। इसलिए यह संभव था कि रावण उधर ही सीता को ले गया हो, या वहाँ के निवासी इस बारे में कुछ और बता पाते। इसलिए राम और लक्ष्मण दोनों तेजी से उसी तरफ आगे बढ़ने लगे।
कबंध से राम-लक्ष्मण का सामना
क्रौंचारण्य नामक गहन वन को पार करने के बाद जब वे घने जंगलों से गुजर रहे थे, तभी उन्हें कबंध राक्षस मिला। उसके आने से पहले उसकी इतनी तेज आवाज़ आई कि लगा जैसे जंगल में तूफान आ गया हो। दोनों भाई किसी खतरे की आशंका से तुरंत हाथों में तलवार लेकर तैयार हो गए।
कबंध राक्षस
जब राक्षस उनके सामने आया, तो उन्होंने देखा कि उसकी आकृति बड़ी विचित्र थी। उसका शरीर बहुत विशाल था, लेकिन उसके सिर और गर्दन नहीं थे। इससे भी विचित्र यह था कि उसके पेट में मुँह बना हुआ था। इतना ही नहीं, उसकी भुजाएँ असामान्य रूप से बहुत बड़ी (दोनों भुजाएँ एक-एक योजन तक) थीं। उसका शरीर काले रंग का था, जिस पर तीखे रोएँ थे। दोनों भाई थोड़ी दूर से ही उसे देखने लगे।
तभी कबंध ने अचानक दोनों भाइयों को अपने एक ही हाथ से पकड़ लिया। उसकी बाहों में इतनी शक्ति थी कि कुछ देर के लिए तो वे अपने को उसकी पकड़ से छुड़ाने में विवश अनुभव करने लगे। लक्ष्मण ने तो राम से उन्हें छोड़कर अकेले निकलकर अपनी जान बचाने तक के लिए कह डाला, लेकिन राम ने उन्हें ढांढस बंधाया (हिम्मत दिलाई)।
बातचीत की शुरुआत कबंध ने ही की। उसने दोनों भाइयों का परिचय पूछते हुए यह बताया कि वह बहुत भूखा था। संयोग से दोनों भाई उसकी भूख मिटाने के लिए उसके सामने आ गए थे और अब वह उन्हें मारकर खाएगा। तभी दोनों भाइयों ने अपनी-अपनी तलवारों से शक्तिशाली प्रहार उसकी दोनों बाँहों पर किया। तलवार के एक ही प्रहार से उसकी दोनों बाँहें कट गईं। बाँहें कटते ही कबंध धरती पर गिर पड़ा और दोनों भाई उसकी पकड़ से मुक्त हो गए।
अब लक्ष्मण ने अपने दोनों भाइयों का परिचय दिया। उन्होंने सीता हरण और अपने वहाँ आने का प्रयोजन भी बताया। अपना परिचय देने के बाद लक्ष्मण ने उससे उसका परिचय पूछा। घायल पड़े कबंध ने अपने बारे में बताना शुरू किया।
कबंध को स्थूलशिरा ऋषि का शाप
कबंध एक समय बहुत ही सुंदर गंधर्व था। जितना वह सुंदर था, उतना ही बलवान भी था। लेकिन अपने बल और सौंदर्य का उसे घमंड भी था। वह लोगों को तंग करने के लिए भयंकर राक्षस का रूप बनाकर उन्हें डरा दिया करता था।
स्थूलशिरा नामक ऋषि एक दिन जंगल में कंद-मूल इकट्ठा कर रहे थे। अचानक भयंकर राक्षस बनकर आए कबंध ने उन्हें डरा दिया। उसकी इस शरारत से ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने उसे सदा उसी डरावने रूप में रह जाने का शाप दे दिया, जिस रूप में वह लोगों को डराया करता था।
अब कबंध को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने ऋषि से क्षमा माँगी। ऋषि ने उसकी मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा कि जब राम के रूप में विष्णु का अवतार होगा, तब निर्जन वन में राम-लक्ष्मण उसका हाथ काटकर उसे जलाएंगे, तभी उसे अपना मूल स्वरूप मिल पाएगा।
कबंध को ब्रह्मा का वरदान
इस तरह ऋषि के शापवश एक सुंदर गंधर्व डरावनी आकृति वाला राक्षस बन गया। वह बलवान तो था ही, उसने अब ब्रह्मा की तपस्या करना शुरू कर दिया। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर उसने उनसे दीर्घजीवी होने का वरदान ले लिया।
इंद्र पर आक्रमण
अब कबंध शक्ल से ही नहीं, बल्कि कर्म से भी भयंकर हो चुका था। ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे मृत्यु का भय तो था नहीं, इसलिए उसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर देवराज इंद्र पर आक्रमण कर दिया।
वह भले ही कितना भी शक्तिशाली था, लेकिन इंद्र के अस्त्र वज्र का उसके पास कोई जवाब नहीं था। युद्ध में क्रुद्ध होकर इंद्र ने उस पर वज्र से प्रहार किया। यह प्रहार इतना भीषण था कि उसका सिर और उसकी जांघें उसके अपने शरीर के भीतर धँस गईं। अब इस अवस्था में वह मृत्यु चाहने लगा, लेकिन ब्रह्मा के वरदान के कारण उसकी मृत्यु नहीं हो सकी।
इंद्र का वरदान
इस तरह ब्रह्मा का वरदान उसके लिए अब शाप बन गया। इतना दुखमय जीवन उसे तब तक जीना होता, जब तक ऋषि के कथनानुसार राम का अवतार नहीं होता। उसने इंद्र से कातर स्वर में प्रार्थना की कि वज्र के प्रहार से उसका सिर, मुँह और जांघें कुछ नहीं बचा हैं; ऐसी हालत में न तो वह चल सकता है और न ही कुछ खा सकता है।
इंद्र ब्रह्मा के वरदान और ऋषि के शाप में तो परिवर्तन नहीं कर सकते थे, लेकिन कबंध पर दया कर उन्होंने उसके पेट में ही तीखे दाँतों वाला मुँह बना दिया और साथ ही उसकी दोनों बाँहें एक-एक योजन लंबी कर दीं, ताकि वह बैठे-बैठे दूर से ही अपना शिकार पकड़कर ला सके और उसे खा सके।
कबंध की मुक्ति
अपने इस विचित्र रूप के विषय में यह कहानी बताने के बाद कबंध ने राम-लक्ष्मण को बताया कि वह इतने दिनों से राम-लक्ष्मण के वन में आने की प्रतीक्षा करते हुए ही इस वन में रह रहा था। बाँहें कटने से उसे विश्वास हो गया था कि ये दोनों भाई ही राम-लक्ष्मण हैं, जिससे उसमें अपनी मुक्ति की आस जगी।
कबंध ने दोनों भाइयों से उसका जीवित ही दाह-संस्कार करने के लिए कहा ताकि उसे इस यातना भरे शरीर से मुक्ति मिल सके। उसने यह भी कहा कि इस तरह जीवित जलाने से उसे कोई पीड़ा नहीं होगी, क्योंकि उसकी मुक्ति के लिए ऐसा ही विधान है। अग्नि प्रज्वलित होते ही उसका यह शरीर छूट जाएगा और उसे दाह की पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ेगा।
कबंध ने आगे कहा कि अभी उसकी बौद्धिक क्षमता इतनी अधिक नहीं थी कि सीता की खोज में वह राम की कोई सहायता कर सके, लेकिन अपना वास्तविक स्वरूप पाने के बाद वह ऐसा ज़रूर करेगा।
कबंध की प्रार्थना के अनुसार राम-लक्ष्मण ने एक गड्ढा खोदकर उसमें चिता बनाई और जीवित ही उसका दाह-संस्कार किया।
कबंध एक सुंदर नवयुवक के रूप में उस चिता की अग्नि से प्रकट हुआ। उसे ले जाने के लिए आकाश में हंसों से जुता सुंदर विमान प्रकट हुआ। दोनों भाइयों को प्रणाम कर वह उस रथ में जा बैठा।
कबंध द्वारा राम को सुग्रीव से मित्रता करने की सलाह
सीता की खोज में बौद्धिक सहायता देने के अपने वचन का उसने पालन किया। उसने राम से सीता को पाने के लिए ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले वानर सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा। सुग्रीव राक्षसों के सभी ठिकानों को जानते थे और इस समय स्वयं कष्ट में थे।
इतना कहकर कबंध ने ऋष्यमूक पर्वत और पंपा सरोवर (जो इस पर्वत और सुग्रीव के क्षेत्र की सीमा की तरह था) तक जाने का मार्ग बताया। उसने मतंग मुनि और शबरी के आश्रम के विषय में भी जानकारी दी। इतना बताकर कबंध प्रस्थान कर गया।
