श्रीकृष्ण-बलराम का नामकरण और उनकी बाल लीलाएँ – भाग 10

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गर्गाचार्य का गोकुल आना

शूरसेन यदुवंश के कुलपुरोहित श्री गर्गाचार्य एक दिन गोकुल आए। उनका सभी यदुवंशी बहुत सम्मान करते थे। नंदजी ने उनकी बहुत प्रकार से सेवा और सम्मान किया तथा अपने दोनों बालकों का नामकरण करने के लिए आग्रह किया।

लेकिन आचार्य ने उन्हें यह कार्य गुप्त रूप से करने की सलाह दी। इसका एक कारण तो यह था कि जब से देवकी की दिव्य कन्या ने कंस को यह कहा था कि उसे मारने वाला जन्म ले चुका है, तब से वह आशंकित था कि देवकी को आठवीं कन्या नहीं होनी चाहिए थी, बल्कि कोई पुत्र होना चाहिए था। वसुदेव और नन्द जी की घनिष्ठता का भी उसे पता था। दूसरा कारण यह था कि सभी जानते थे कि वे यदुकुल के कुलपुरोहित थे। इसलिए अगर वे दोनों बालकों का नामकरण करते, तो कंस को शक हो जाता कि ये दोनों वसुदेव-देवकी के पुत्र थे और वह कृष्ण को मार डालता।

कृष्ण-बलराम का नामकरण

यह सलाह नन्द जी को भी पसंद आई। उन्होंने उनसे अत्यंत गुप्त रीति से, बिना किसी सगे-संबंधी को बताए एकांत गोशाला में केवल स्वस्तिवाचन द्वारा नामकरण करने का आग्रह किया। आचार्य इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए। तदनुसार एकांत में लोगों से छिपाकर गुप्त रूप से दोनों भाइयों का नामकरण संस्कार हुआ।

बलराम का नामकरण

गर्गाचार्य ने दोनों भाइयों के नाम इस प्रकार रखे। उनके अनुसार बड़ा बालक रोहिणी का पुत्र होने के कारण ‘रौहिणेय’ और लोगों को अपने गुणों से आनंदित करने के कारण ‘राम’ कहलाएगा। असीम बलशाली होने के कारण ‘बल’ और यादवों में तथा गोपों में मतभेद होने पर मेल कराने के कारण यह ‘संकर्षण’ भी कहलाएगा। नाम का एक कारण देवकी के गर्भ से खींचकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित करना भी था, लेकिन इस समय आचार्य ने यह रहस्य नहीं बताया।

कृष्ण का नामकरण

आचार्य के अनुसार छोटा बालक, जो सांवले रंग का था, वह प्रत्येक युग में शरीर धारण करता है। पिछले युगों में इसने श्वेत, रक्त और पीत रंग स्वीकार किया था। इस बार यह कृष्ण वर्ण हुआ है, इसलिए इसका नाम ‘कृष्ण’ होगा। चूूँकि यह पहले कभी वसुदेव के घर भी पैदा हुआ था, इसलिए इस रहस्य को जानने वाले इसे श्रीमान वसुदेव या ‘वासुदेव’ भी कहेंगे।

आचार्य ने यह भी कहा कि इसके अनेक रूप और कर्म हैं और तदनुसार इसके अनेक नाम हैं। मैं तो इन नामों को जानता हूँ, लेकिन साधारण लोग इन्हें नहीं जानते हैं। यह तुमलोगों की बड़ी सहायता करेगा और समस्त गायों और गोपों को आनंदित करेगा। यह बालक साक्षात नारायण के समान है।

इस तरह नंदजी को भली-भांति समझाकर आचार्य अपने आश्रम चले गए।

दोनों भाइयों की बाल-सुलभ लीलाएँ

कुछ दिनों बाद दोनों भाई घुटनों के बल चलने लगे। उनकी तरह-तरह की बाल-सुलभ लीलाएँ सभी ब्रजवासियों को आनंदित करती थीं। जब दोनों भाई कुछ और बड़े हुए और नन्हें-नन्हें पैरों पर चलने लगे, तब उनकी कौतुकमयी लीलाएँ और बढ़ गई। दोनों भाई अपनी उम्र के अन्य गोप बालकों के साथ खेलने के लिए निकल जाते और तरह-तरह के खेल खेलते। उनकी ये बाल लीलाएँ गोपियों को बड़ी अच्छी लगती थीं।

माता यशोदा को गोपियों की उलाहना

एक दिन सभी गोपियाँ इकट्ठी होकर नंदजी के घर आईं और माता यशोदा को सुनाकर मीठी उलाहना देने लगीं। गाय दूहने का समय नहीं होने पर भी बछड़ों को खोल देना, गोपियों के घर से मीठे-मीठे दही-दूध चुराकर खाना और बचे हुए को बंदरों को खिला देना, और फिर भी अगर बच जाए तो मटकी फोड़ देना, दूध-दही नहीं मिलने पर घरवालों पर खिझना और घर के छोटे बच्चों को रुलाकर भाग जाना, छीकों पर रखे मटकों तक उखल या किसी मित्र के कंधे पर चढ़कर पहुँच जाना या नीचे से ही उसमें छेद कर देना—इत्यादि ऐसी उलाहना थीं, जो गोपियाँ माता यशोदा को देती थीं।

अंधेरे में मटकी रखी होने पर भी वे अपने गहनों के प्रकाश में देख लेते थे। खुद घर का मालिक बनकर कभी गोपियों को ही चोर बना देते थे। गोपियाँ इस तरह उलाहना देते समय वहाँ खड़े श्रीकृष्ण की डरी हुई और चकित बड़ी-बड़ी आँखों को स्नेह से देखती भी रहती थीं। उनकी यह दशा देखकर माता यशोदा भी स्नेह और आनंद से भर जाती थीं।

माखन लीला

भगवान की यह माखन लीला अलौकिक और दिव्य है। इसे साधन-सिद्धा गोपियों की तपस्या और प्रेम के परिणामस्वरूप उनकी इच्छित पूजा ग्रहण करने के रूप में देखा गया है। इसलिए माखन के लिए ‘चोरी’ शब्द उचित नहीं है, क्योंकि यह वास्तविक अर्थ में चोरी नहीं थी। गोपियाँ चाहती थीं कि कृष्ण उनका माखन खाएँ और इसकी शिकायत करने के बहाने वे नंद बाबा के घर जाकर पुनः उनके दर्शन करें।

फल बेचने वाली को संपत्ति देना

उनकी एक और बाल लीला का भागवत में विवरण है। एक दिन कोई फल बेचने वाली आई। श्रीकृष्ण उससे फल लेने के लिए अपनी अंजलि में अनाज लेकर दौड़े। उनकी नन्हीं अंजलि में से अनाज तो रास्ते में ही बिखर गए, लेकिन फल बेचने वाली ने उनके दोनों हाथ फलों से भर दिए। भगवान की कृपा से उसकी फल रखने वाली टोकरी रत्नों से भर गई।

बाललीलाएँ

श्रीकृष्ण की बाललीलाएँ उनके ब्रजवासी भक्तों को सुख देने के लिए थीं। वे एक सामान्य मनुष्य बालक की तरह बनकर ऐसी लीलाएँ करते थे, जिससे उनके भक्तों में वात्सल्य और प्रेम बढ़ता था।

दूसरी तरफ खेल-खेल में ही शक्तिशाली राक्षसों को मारकर अपने गैर-मानवीय रूप का प्रदर्शन भी कर देते थे। वास्तव में भगवान के अवतरण का उद्देश्य दुष्टों का संहार करने के साथ-साथ अपने भक्तों को आनंद देना भी होता है।

एक सामान्य मनुष्य के जीवन में जो घटनाएँ घटती हैं, वे उसके द्वारा इच्छित या अनुमानित नहीं होती हैं, लेकिन भगवान सर्वशक्तिमान होते हैं। वे जो चाहते हैं, वही घटित होता है, इसलिए उनके कार्यों को लीला यानी नाटक कहा जाता है। उनकी बाल लीलाएँ भी ऐसी ही थीं।

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