गर्भ की स्थापना और संकर्षण अवतार
नारद जी की प्रेरणा से कंस ने वसुदेव-देवकी को हथकड़ी और बेड़ियों से जकड़ कर मथुरा के कारागार में डाल दिया। कंस ने क्रमशः देवकी के सभी छह पुत्रों को मार डाला। सातवें पुत्र के रूप में उनके गर्भ में भगवान के अंशस्वरूप श्रीशेष जी आए।
वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी इस समय कंस के भय से गोकुल में वसुदेव जी के मित्र नंद जी के यहाँ छिपकर रह रही थी। भगवान के आदेश से योगमाया ने श्रीशेष जी को देवकी के गर्भ से निकालकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया।
देवकी के गर्भ से खींचे जाने के कारण श्रीशेष जी का यह अवतार संकर्षण कहलाया। लोकरंजन के कारण राम, बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण बलभद्र और बलराम भी उन्हें कहा जाता है।
देवकी का गर्भ समाप्त होने के कारण लोगों ने समझा कि उनका गर्भपात हो गया है।
श्रीकृष्ण का गर्भ में आना
अंततः वह समय आया जब भगवान स्वयं देवकी के गर्भ में आए। भगवान के गर्भ में आते ही देवकी के शरीर में एक दिव्य कांति आ गई। उनके मुख पर पवित्र मुस्कान थी। यह देखकर कंस को विश्वास हो गया कि इस बार देवकी के गर्भ में विष्णु ने ही प्रवेश किया है। लेकिन उसने एक गर्भवती स्त्री, जो कि उसकी बहन थी, का वध करना उचित नहीं समझा।
अतः वह इस बालक के जन्म की प्रतीक्षा करने लगा। शत्रुता और भय के इस भाव के कारण कंस जाने-अनजाने में हमेशा श्रीकृष्ण के चिंतन में ही रहता था। जहाँ भी उसे कोई संदेह होता, वहाँ उसे कृष्ण ही दिखते थे। इस तरह उसे समस्त संसार कृष्णमय ही दिखने लगा था।
रोहिणी नक्षत्र का वह शुभ दिन आया, जिस दिन भगवान को अवतार लेना था। समस्त वातावरण सुहावना हो गया। ब्राह्मणों के अग्निहोत्र की कभी न बुझने वाली अग्नि, जो कंस के अत्याचारों से बुझ गई थी, अपने-आप जल उठी। संत पुरुषों का मन सहसा प्रसन्न हो उठा। देवताओं की दुंदुभि अपने-आप बज उठी।
जब भगवान के अवतरण का समय आया, तब भगवान शंकर, ब्रह्मा, नारद और अन्य देवतागण कंस के बंदीगृह आए और उनकी गर्भ में ही स्तुति की।
श्रीकृष्ण का दिव्य बालक के रूप में अवतरण
रात्रि का समय था। कारावास में भगवान प्रकट हुए। वसुदेवजी ने अपने सामने एक अद्भुत बालक को देखा जिसके चार हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल थे और सीने पर श्रीवत्स का चिह्न था। गले में कौस्तुभ मणि की माला थी। मुकुट और कुंडल में वैदूर्य मणि चमक रहे थे। समस्त अंगों में आभूषण शोभायमान थे। बाल घुँघराले थे।
कृष्ण जन्म पर वसुदेव-देवकी की प्रसन्नता
साक्षात भगवान को अपने पुत्र के रूप में आया देखकर वसुदेव पहले तो आश्चर्य और फिर आनंद में मग्न हो गए। अब उनका सारा भय जाता रहा। श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाने के उतावलेपन में उन्होंने उसी समय ब्राह्मणों के लिए दस हजार गायों का संकल्प कर लिया। फिर अपना मन स्थिर कर हाथ जोड़कर वे भगवान की स्तुति करने लगे।
इधर देवकी को पहले तो कंस का कुछ भय हुआ, फिर जब उन्होंने भगवान को देखा तो वह भी पवित्र भाव से मुस्कुराते हुए भगवान की स्तुति करने लगीं।
वसुदेव-देवकी के पूर्व जन्मों की कथा
भगवान ने उन्हें उनके पूर्व जन्म की बात बताई, जिसमें उन्होंने भगवान जैसा पुत्र पाने का वरदान मांगा था। भगवान ने उन्हें बताया कि स्वायंभुव मन्वंतर में अपने प्रथम जन्म में वसुदेव सूतपा नामक प्रजापति और देवकी उनकी पत्नी पृश्नि थीं। उस समय भगवान उनके पुत्र बनकर पृश्निगर्भ कहलाए।
उन दोनों का दूसरा जन्म अदिति और कश्यप के रूप में हुआ। उस समय भगवान उनके पुत्र बने, जिनका नाम उपेंद्र था, जिन्हें शरीर छोटा होने के कारण वामन भी कहा गया।
वसुदेव-देवकी के रूप में यह उनका तीसरा जन्म था।
दिव्य बालक से साधारण बालक के रूप में आ जाना
भगवान ने अपने माता-पिता को उनके पूर्व जन्मों की स्मृति कराई। उन्होंने उन्हें वरदान दिया कि उनके प्रति वात्सल्य-स्नेह और चिंतन के द्वारा उन्हें भगवान के परम पद की प्राप्ति होगी।
इतना कहकर भगवान साधारण बालक की तरह बन गए।
गोकुल में योगमाया का जन्म
जिस समय मथुरा के बंदीगृह में श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ, ठीक उसी समय गोकुल में नंद जी की पत्नी यशोदा के गर्भ से एक पुत्री का जन्म हुआ। वह पुत्री योगमाया थी, जो भगवान के आदेश से उनके कार्य को सिद्ध करने आई थी, अन्यथा योगमाया भी भगवान की शक्ति होने के कारण उनकी तरह ही जन्म-रहित है।
इससे कुछ समय पहले ही नंद जी के घर रह रही वसुदेव जी की पहली पत्नी ने बलराम जी को जन्म दिया था।
श्रीकृष्ण को गोकुल ले जाया जाना

इधर मथुरा के बंदीगृह में वसुदेव ने अपने नवजात पुत्र को गोकुल में अपने मित्र नंदजी के यहाँ पहुँचाने का निश्चय किया। उनकी पहली पत्नी पहले ही कंस के भय से वहाँ छिपकर रह रही थी। वे सत्यवादी थे और कंस को दिए गए अपने वचन को निभाते हुए उन्होंने अपने छह पुत्र उसे सौंप दिए थे। सातवें पुत्र के गर्भ से अचानक गायब होना उनके लिए आश्चर्य का विषय था। आठवें पुत्र के रूप में स्वयं भगवान आए थे और उनके दर्शन तथा प्रेरणा के कारण वे उनकी बात मानने के लिए तैयार हो गए।
योगमाया ने सभी द्वारपालों और नगरवासियों की चेतना हर ली। फलस्वरूप सभी अचेत होकर सो गए। भगवान की प्रेरणा से वसुदेव जी अपने पुत्र को लेकर गोकुल के लिए निकले। वे ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते थे, सभी द्वार खुलते जाते थे। द्वारपाल गहरी नींद में सो गए थे। उस समय वर्षा हो रही थी, इसलिए शेषजी अपने फण से भगवान को ओट किए हुए पीछे-पीछे चल रहे थे। वर्षा के कारण यमुना में जल का प्रवाह बढ़ गया था, लेकिन यमुना जी ने वसुदेव जी को श्रीकृष्ण को ले जाने के लिए मार्ग दे दिया।
श्रीकृष्ण का गोकुल पहुँचना
भगवान की माया से मथुरा की तरह ही गोकुल में भी सभी नींद में अचेत पड़े थे। वसुदेवजी नंदजी के घर गए, जहाँ कुछ देर पहले ही यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। यशोदाजी को यह तो आभास हुआ कि उन्हें संतान हुई है, लेकिन योगमाया की मायावश अचेत होने के कारण उन्हें यह नहीं पता चल सका कि उन्हें पुत्र हुआ है या पुत्री।
वसुदेवजी ने यशोदा की शय्या पर लेटी हुई उनकी नवजात कन्या को उठा लिया और उसकी जगह श्रीकृष्ण को सुला दिया।
पुत्र के बदले पुत्री लेकर वसुदेव जी का वापस बंदीगृह लौटना
जब वसुदेव जी कन्या को लेकर मथुरा के बंदीगृह में वापस आए, तो सभी द्वार पहले की तरह फिर बंद हो गए। उन्होंने उस नवजात कन्या को देवकी जी की शय्या पर सुला दिया और अपने पैरों में पहले की तरह ही बेड़ियाँ डाल लीं। इस तरह सब कुछ पहले की तरह ही हो गया।




