जब से पांडव और उनकी माँ कुंती हस्तिनापुर वापस आए, तब से यह तो निश्चय हो गया था कि उत्तराधिकार का प्रश्न एक बड़ी समस्या खड़ी करेगा, लेकिन ऊपर-ऊपर से सब कुछ सही चल रहा था। 100 कौरव भाई और 5 पांडव भाई—सभी 105 राजकुमारों को एक जैसी ही सुविधाएँ दी जा रही थीं। इस बीच, दुर्योधन ने दो बार जहर देकर पांडवों में सबसे शक्तिशाली भाई भीम को मारने का प्रयास किया, लेकिन दोनों बार वह सफल नहीं हो सका। इस गुस्से में उसने पांडवों के सारथी को मार डाला। लेकिन कुंती और पांडवों ने समस्या को बढ़ने से रोकने के लिए इस मामले को अधिक तूल नहीं दिया। वे सावधान तो हो गए, पर किसी को इन घटनाओं के बारे में बताया नहीं। विदुर यह सब जान गए थे, पर उन्होंने भी इसे किसी को नहीं बताया।
इधर, धृतराष्ट्र और भीष्म को सभी राजकुमारों की उचित शिक्षा और प्रशिक्षण की चिंता थी। इस समय सभी राजकुमार किशोरावस्था में पहुँच चुके थे। पांडवों ने जंगल में ही शिक्षा ली थी, पर अब राजकुमारों के योग्य उच्च शिक्षा प्राप्त करना उनके लिए आवश्यक था।
सभी राजकुमारों के पहले शिक्षक यानी आचार्य के रूप में कृपाचार्य नियुक्त हुए।
कौन थे कृपाचार्य?
कृपाचार्य गौतम गोत्र के ब्राह्मण थे। कृपाचार्य के पिता का नाम शरद्वान और दादा का नाम गौतम था। उनकी माँ जानपदी नामक अप्सरा थीं। कृपा और उनकी जुड़वा बहन कृपी का पालन-पोषण हस्तिनापुर के महाराज शांतनु ने ही अपनी संतान की तरह किया था। कृपाचार्य को धनुर्वेद का ज्ञान उनके पिता शरद्वान गौतम ने ही हस्तिनापुर में छुपकर कराया था। उनके शिष्यत्व में रहकर ही कृपाचार्य धनुर्वेद के चारों प्रकारों के उत्कृष्ट आचार्य बन गए थे।
कृपाचार्य द्वारा राजकुमारों को शिक्षा
कृपाचार्य ब्राह्मण होने के बावजूद शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्र विद्या में भी पारंगत थे। उन्होंने सभी राजकुमारों को धनुर्वेद का अध्ययन कराना आरंभ किया। कौरवों, पांडवों के अतिरिक्त यदुवंशी तथा अन्य देशों से आए अनेक राजकुमारों ने कृपाचार्य से ही धनुर्वेद की शिक्षा ली थी।
द्रोण की आचार्य के रूप में नियुक्ति
कृपाचार्य से राजकुमारों ने बहुत कुछ सीख लिया था, लेकिन भीष्म चाहते थे कि वे इससे अधिक और विशेष शिक्षा प्राप्त करें, जैसी एक महान राजवंश के राजकुमारों से अपेक्षा की जाती है। इसके लिए वे किसी श्रेष्ठ गुरु की खोज कर रहे थे, और उनकी यह खोज गुरु द्रोण के रूप में पूरी हुई।
वैसे तो द्रोण का विवाह कृपाचार्य की जुड़वा बहन कृपी से हुआ था, पर वे इस रिश्तेदारी के कारण नियुक्त नहीं हुए थे। द्रुपद से अपमानित होने के बाद उससे बदला लेने और अपने बेटे को एक अच्छी जिंदगी देने का लक्ष्य लेकर वे हस्तिनापुर आए थे। हस्तिनापुर आने के मुख्य रूप से दो कारण थे—पहला, हस्तिनापुर का राजपरिवार योग्य लोगों का आदर करता था; दूसरा, राजकुमारों के गुरु कृपाचार्य उनकी पत्नी के भाई थे।
लेकिन यहाँ द्रोण ने किसी को अपना परिचय नहीं दिया था। ऐसे में एक दिन नगर के बाहर राजकुमार गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। खेलते-खेलते उनकी गुल्ली एक सूखे हुए कुएँ में गिर गई। द्रोण, जो किसी काम से पास ही थे, ने उस गुल्ली को और साथ ही अपनी अँगूठी को सींक को तीर की तरह प्रयोग करके कुएँ से बाहर निकाल दिया। उनकी यह प्रतिभा देखकर सभी राजकुमार बहुत प्रभावित हुए। जब उन्होंने अपने दादा भीष्म को इस विषय में बताया, तब भीष्म पहचान गए कि यह कार्य केवल द्रोण का ही हो सकता है। वे द्रोण से मिले और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें राजकुमारों का आचार्य नियुक्त कर दिया।
आचार्य के रूप में द्रोण को एक भव्य महल और धन प्रदान किया गया, ताकि वे अपने परिवार के साथ आराम से रहकर राजकुमारों को पढ़ाने का कार्य कर सकें।
इससे द्रोण की आर्थिक समस्या तो समाप्त हो गई, पर द्रुपद से बदला लेना अभी बाकी था। यह बदला वे अपने शिष्यों के माध्यम से ही लेना चाहते थे। आचार्य के रूप में वे कहीं और भी कार्य करके धन कमा सकते थे, किंतु हस्तिनापुर आने का उनका मुख्य उद्देश्य ही द्रुपद से बदला लेना था। हालांकि, यह बात उन्होंने न तो भीष्म से कही और न ही अपने किसी विद्यार्थी को बताई। भीष्म से उन्होंने केवल इतना कहा था कि वे अपने विद्यार्थियों द्वारा समय आने पर अपना अभीष्ट सिद्ध करना चाहते हैं। वे अपने विद्यार्थियों को शिक्षा देते हुए यह जानने का प्रयत्न कर रहे थे कि इनमें से कौन इतना सक्षम है जो उनके उद्देश्य को पूरा कर सके।
द्रोणाचार्य द्वारा राजकुमारों की शिक्षा
सभी राजकुमारों का शिक्षण और प्रशिक्षण आचार्य द्रोण के शिष्यत्व में होने लगा। द्रोणाचार्य सभी राजकुमारों को विविध प्रकार के दिव्य एवं मानव अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने लगे। उनके शिक्षण की ख्याति बढ़ने लगी। धीरे-धीरे वृष्णि वंश, अंधक वंश आदि के राजकुमार भी वहाँ शिक्षा लेने आने लगे। सूत जाति के अधिरथ के पालित पुत्र कर्ण ने भी यहीं आकर शिक्षा प्राप्त की। उनका पुत्र अश्वत्थामा भी सबके साथ वहीं अपने पिता से शिक्षा प्राप्त करता था।
इस तरह द्रोण के गुरुकुल में सभी राजकुमार और अन्य विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। यद्यपि सभी शिष्य अस्त्र-विद्या में प्रवीण एवं पराक्रमी थे, पर कुछ विशेष विशेषज्ञता भी दिखने लगी थी। अर्जुन एवं कर्ण धनुर्विद्या में सबसे आगे थे, तो दुर्योधन एवं भीमसेन गदायुद्ध में। नकुल एवं सहदेव तलवार युद्ध में तथा युधिष्ठिर रथ पर बैठकर युद्ध करने में सबसे श्रेष्ठ थे। अर्जुन धनुष के साथ-साथ अन्य युद्ध कलाओं में भी पूरी तरह प्रवीण था।
गुरु का अर्जुन के प्रति विशेष स्नेह था। भीमसेन शारीरिक बल में सबसे बलिष्ठ थे, इसलिए कौरव सभी पांडवों से—विशेषकर अर्जुन एवं भीम से—बहुत ईर्ष्या रखते थे।
राजकुमारों की परीक्षा

जब शिक्षा पूरी हो गई, तब द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों की अस्त्र-विद्या की परीक्षा लेने का विचार किया। उन्होंने कारीगरों से एक नकली गिद्ध बनवाकर एक पेड़ की डाल के बिल्कुल अग्रभाग पर रखवा दिया। राजकुमारों को उस पक्षी के नकली होने का पता नहीं था। गुरु ने अपने सभी शिष्यों को उसका मस्तक काटने का आदेश दिया।
एक-एक कर सभी शिष्य उसे बींधने आए, पर जब भी कोई शिष्य धनुष पर बाण चढ़ाकर निशाना साधना चाहता, तब द्रोणाचार्य उससे पूछते, “वृक्ष की शिखा पर बैठे हुए इस गिद्ध को देखो।”
शिष्य उत्तर देते, “मैं देख रहा हूँ।”
गुरु पूछते, “क्या तुम इस वृक्ष को, मुझको अथवा अपने भाइयों को भी देख रहे हो?”
शिष्य कहते, “हाँ, मैं इस वृक्ष को, आपको, अपने भाइयों को तथा गिद्ध को भी बार-बार देख रहा हूँ।”
इस पर मन-ही-मन अप्रसन्न होते हुए गुरु झिड़ककर कहते, “हट जाओ यहाँ से, तुम इस लक्ष्य को नहीं भेद सकते।”
लेकिन जब गुरु ने यही प्रश्न अर्जुन से किया, तो अर्जुन ने उत्तर दिया, “मैं केवल गिद्ध को देख रहा हूँ, वृक्ष को अथवा आपको नहीं देख रहा।”
गुरु ने पूछा, “गिद्ध के अंग कैसे हैं?”
अर्जुन ने कहा, “मैं केवल गिद्ध का मस्तक देख रहा हूँ, उसके संपूर्ण शरीर को नहीं।”
इस उत्तर से अत्यंत प्रसन्न होकर गुरु ने कहा, “चलाओ बाण!”
तुरंत ही अर्जुन के चलाए तीखे क्षुर नामक बाण से उस गिद्ध का मस्तक कटकर नीचे गिर गया।
अर्जुन की एकाग्रता और कुशलता को देखकर द्रोणाचार्य को यह पूर्ण विश्वास हो चला कि अर्जुन युद्ध में राजा द्रुपद को अवश्य हरा देगा।
अर्जुन द्वारा द्रोणाचार्य की रक्षा
अर्जुन अस्त्र-शस्त्र चलाने में तो कुशल और मेहनती विद्यार्थी थे ही, वे तुरंत प्रतिक्रिया कर सटीक निर्णय भी बहुत जल्दी लेते थे। इसका एक उदाहरण तब मिला जब उन्होंने एक मगरमच्छ से गुरु की जान बचाई थी।
एक बार आचार्य अपने शिष्यों के साथ गंगा स्नान के लिए गए। स्नान करते समय एक ग्राह (छोटे मगरमच्छ) ने उनकी पिंडली पकड़ ली। ग्राह पानी के अंदर से ही उन्हें पकड़े हुए था। हालांकि आचार्य स्वयं को बचाने में पूरी तरह सक्षम थे, फिर भी उन्होंने शिष्यों को अपनी रक्षा के लिए पुकारा। उनकी अचानक पुकार सुनकर सभी शिष्य हक्के-बक्के रह गए, लेकिन अर्जुन ने तुरंत पाँच तीखे बाण पानी में डूबे ग्राह पर चलाए, जिससे वह मारा गया और आचार्य मुक्त हुए।
आचार्य द्वारा अर्जुन को ब्रह्मशिरा अस्त्र प्रदान करना
ग्राह को जिस शीघ्रता और कुशलता से अर्जुन ने मारकर गुरु की रक्षा की, उससे गुरु बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अर्जुन को एक विशेष अस्त्र ‘ब्रह्मशिरा’ का ज्ञान दिया। साथ ही यह हिदायत भी दी कि किसी भी दशा में मनुष्यों पर इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि यदि किसी अमानव शत्रु से सामना हो, तभी इसका उपयोग किया जाए।
इसी समय गुरु ने फिर से दोहराया, “संसार में दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर नहीं होगा।”
द्रोणाचार्य का अर्जुन के प्रति विशेष प्रेम
हस्तिनापुर में आचार्य द्रोण के गुरुकुल के सभी शिष्यों में अर्जुन सबसे अधिक जिज्ञासु और अभ्यास करने वाले थे। अपने कठोर परिश्रम के कारण उनका कौशल अन्य राजकुमारों से अधिक था। आचार्य उनकी प्रतिभा, परिश्रम और गुरुभक्ति से अत्यंत प्रसन्न रहते थे।
अर्जुन द्वारा गुरु-दक्षिणा की प्रतिज्ञा
एक दिन गुरु ने अपने सभी शिष्यों से कहा, “मेरे मन में एक कार्य करने की इच्छा है। अस्त्र-विद्या प्राप्त करने के बाद तुम लोगों को वह इच्छा पूरी करनी होगी। इस विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं?” यह सुनकर कौरव तो चुप रहे, लेकिन अर्जुन ने बिना यह जाने कि वह कार्य क्या है, उसे पूरा करने की प्रतिज्ञा कर ली। बाद में समय आने पर अर्जुन ने वह प्रतिज्ञा पूरी भी की।
अर्जुन में धनुर्विद्या सीखने की ललक
द्रोणाचार्य के आश्रम में अन्य शिष्यों की तरह उनका पुत्र अश्वत्थामा भी पढ़ता था। आचार्य उसे अन्य शिष्यों की तुलना में अधिक ज्ञान देना चाहते थे, इसलिए वे अन्य शिष्यों को पानी लाने के लिए कमंडल देते, जबकि अश्वत्थामा को बड़े मुँह का घड़ा देते थे। कमंडल का मुँह छोटा होने के कारण अन्य शिष्यों को पानी भरने में अधिक समय लगता था, लेकिन अश्वत्थामा जल्दी आ जाता था। इस बीच वे अकेले में उसे शस्त्र-संचालन की ऐसी विधियाँ बता देते थे, जो अन्य शिष्यों को ज्ञात नहीं होती थीं।
अर्जुन इस बात को समझ गए। इसके बाद वह वारुणी अस्त्र के प्रयोग से शीघ्र ही अपना कमंडल भरकर अश्वत्थामा के साथ ही गुरु के पास लौट आते थे। यही कारण था कि वे किसी भी विद्या में अश्वत्थामा से पीछे नहीं रहे।
इस उल्लेख का प्रयोग कुछ लोग यह सिद्ध करने के लिए करते हैं कि वे एक आदर्श गुरु नहीं थे, क्योंकि उन्होंने अपने शिष्यों और पुत्र में भेदभाव किया था। लेकिन यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि यह प्रसंग अर्जुन के असाधारण गुणों को उजागर करने के लिए है कि वह कितने मेधावी विद्यार्थी थे। अपने पुत्र के प्रति थोड़ा स्वाभाविक झुकाव हो सकता है, परंतु वे शिष्यों के बीच पक्षपात नहीं करते थे। जब अर्जुन भी अश्वत्थामा के साथ ही समय पर पहुँचने लगे, तब गुरु ने उन्हें भी सब-कुछ सिखाया। सभी विद्यार्थियों में केवल अर्जुन में ही सीखने की इतनी उत्कंठा थी और उनकी दृष्टि इतनी पैनी थी कि वे इस भेद को समझ गए। फिर भी उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की और न ही अश्वत्थामा के जैसे बड़े बर्तन की माँग की, बल्कि अपनी चतुराई से जल्दी बर्तन भरने का उपाय ढूँढ लिया। इसे आज की भाषा में ‘स्मार्ट वर्क’ भी कहा जा सकता है।
अर्जुन द्वारा धनुर्विद्या का निरंतर अभ्यास
गुरु अर्जुन की विद्या प्राप्ति की इस ललक को भली-भांति जानते थे। इसलिए उन्होंने रसोइया को यह निर्देश दिया था कि वह अंधेरे में अर्जुन को भोजन न परोसे। पर एक दिन भोजन करते समय तेज हवा के कारण दीपक बुझ गया। अर्जुन अंधेरे में भी भोजन करते रहे। अचानक उन्होंने महसूस किया कि अभ्यास के कारण अंधेरे में भी उनके हाथ आसानी से उनके मुँह तक पहुँच रहे हैं। तब उन्होंने विचार किया कि यदि हाथ बिना देखे मुँह तक पहुँच सकते हैं, तो निरंतर अभ्यास से बिना देखे अंधेरे में तीर क्यों नहीं चलाया जा सकता? उसी दिन से उन्होंने रात्रि के अंधकार में भी अभ्यास करना आरंभ कर दिया।
इस तरह अर्जुन में प्रतिभा तो थी ही, वे अत्यंत परिश्रमी भी थे। उनमें कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहकर सटीक निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी, और यह बात गुरु से छिपी नहीं थी।

द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन को सबसे कुशल धनुर्धर बनाने की प्रतिज्ञा
एक दिन प्रत्यंचा की आवाज़ से गुरु को यह ज्ञात हो गया कि अर्जुन रात्रि में भी अभ्यास करते हैं। शिष्य के इस अपार परिश्रम से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे अपने हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिया, “मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे इस संसार में दूसरा कोई धनुर्धर तुम्हारे समान न हो।”
इसके पश्चात वे अर्जुन को घोड़े, हाथी, रथ पर सवार होकर तथा जमीन पर रहकर युद्ध करने की विशेष शिक्षा देने लगे। चूँकि अर्जुन रात्रि में भी जागकर अभ्यास करते थे और उन्होंने निद्रा पर विजय प्राप्त कर ली थी, इसलिए उन्हें ‘गुडाकेश’ कहा जाने लगा। वे दोनों हाथों से बाण चलाने में सक्षम थे, जिसके कारण उन्हें ‘सव्यसाची’ भी कहा गया।




