दुर्योधन ने भीम की हत्या का प्रयास क्यों किया? (भाग 13)

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पांडवों और कौरवों का आपसी खेल

पांडव जब अपनी माता के साथ हस्तिनापुर में रहने लगे, तब सामान्य परिवार के बालकों की तरह वे सब भी कौरवों के साथ तरह-तरह के खेल खेलते थे। उदाहरण के लिए—कौन सबसे पहले कोई वस्तु उठाएगा, कौन पहले या अधिक खाएगा, कौन अधिक धूल उछालेगा—जैसी छोटी-छोटी बातों पर खेल-खेल में दोनों पक्षों में शर्त लग जाया करती थी। ऐसे खेलों में पांडव पक्ष, विशेषकर भीम ही अक्सर जीतते थे। कौरव सभी भाई बहुत शक्तिशाली थे, लेकिन ताकत के खेल में वे भीम से हार जाते थे। कुश्ती, दौड़ लगाने और शिक्षा के अभ्यास आदि में भी भीम की बराबरी कई कौरव भाई मिलकर भी नहीं कर पाते थे। इन सब कारणों से सभी कौरव भीम से विशेष रूप से ईर्ष्या करते थे, पर भीम में कोई ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि वे बाल-स्वभाव के कारण अधिक ताकत दिखाते हुए उन्हें परेशान कर देते थे।

भीम को मारने की योजना

खेल-खेल में ही भीम की शक्ति को देखकर दुर्योधन आदि कौरव यह योजना बनाने लगे कि सबसे शक्तिशाली पांडव भाई भीम को धोखे से कैसे कैद कर लिया जाए। भीम के न रहने से पांडवों की शक्ति अपने आप कम हो जाती। दुर्योधन का विचार था कि “जब भीम नगर के उद्यान में सो जाए, तब उन्हें उठाकर गंगा नदी में फेंक दिया जाए। इसके बाद अर्जुन और युधिष्ठिर को बलपूर्वक कैद में डालकर मैं अकेला ही सारी पृथ्वी का शासन करूँगा।”

दुर्योधन ने अपने भाई जनमेजय को गंगा तट पर प्रमाणकोटी नामक स्थान पर जल-विहार के लिए एक विशाल गृह तैयार करने का आदेश दिया। उस गृह में सभी तरह की भोग-सामग्री से भरे बहुत से कमरे थे। इस स्थान का नाम ‘उदकक्रीडन’ रखा गया था। चूँकि भीम को खाने-पीने का बहुत शौक था, इसलिए वहाँ अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का इंतज़ाम किया गया था।

भीम को विषैला भोजन खिलाना

भीम को मारने की सभी तैयारी पूरी करने के बाद दुर्योधन ने सभी पांडव भाइयों को जल-विहार करने के लिए आमंत्रण दिया। षड्यंत्र से अनभिज्ञ पांडव इसके लिए राजी हो गए और सभी खुशी-खुशी उस उद्यान में प्रवेश कर गए। सभी भाई खेल-खेल में ही एक-दूसरे के मुँह में खाने-पीने की चीज़ें देने लगे। इसी का फायदा उठाकर दुर्योधन ने कालकूट नामक विष भीम के भोजन में मिला दिया। विषैले भोजन को वह स्वयं बड़ी मीठी-मीठी बातें करते हुए भीम को परोसने लगा। उसने जितना भोजन भीम को परोसा था, उन्होंने वह सब खा लिया।

संयुक्त जल-विहार

भोजन के बाद कौरव और पांडव जल-क्रीड़ा करने लगे। क्रीड़ा के बाद सभी थक गए थे, इसलिए उस रात सभी ने उसी भवन में रुकने का निश्चय किया।

भीम को गंगा में धक्का दे देना

भीम विष के प्रभाव और अत्यधिक क्रीड़ा के कारण बहुत थक गए थे और प्रमाणकोटी के उस विशेष गृह में विश्राम करने चले गए, जहाँ वे अचेत की तरह सो गए। इस स्थिति का फायदा उठाकर दुर्योधन ने लताओं से भीम को बाँधकर गंगा के जल में धकेल दिया।

भीम का नागलोक पहुँचना

बेहोशी की हालत में भीम पानी के अंदर नागलोक पहुँच गए, जहाँ उनके शरीर से कई नाग दब गए। इससे क्रोधित होकर बहुत सारे नागों ने भीम को डंस लिया। इतने साँपों के विष के कारण दुर्योधन द्वारा दिया गया कालकूट विष निष्प्रभावी हो गया।

विष निष्प्रभावी हो जाने के कारण भीम की चेतना लौट आई। उन्होंने अपना बंधन खोल लिया और साँपों को पटक-पटक कर मारने लगे। वे सभी साँप भागकर नागों के राजा वासुकी के समीप गए और सारा हाल कह सुनाया।

इस समय वासुकी के पास आर्यक भी थे, जो कुंती के जैविक पिता शूरसेन के नाना थे। जब उन्होंने भीम को पहचान लिया, तब नागों ने भीम का बहुत स्वागत किया। वासुकी ने उन्हें वहाँ के आठ कुंडों का विशेष रस पीने के लिए दिया, इन रसों के कारण उनमें विशेष शक्ति आ गई। आठ दिनों के बाद जब रस पच गया, तब भीम उठ बैठे। नागों ने उन्हें वस्त्राभूषणों से सजाकर और औषधियों से युक्त खीर खिलाकर फिर नदी के तट पर पहुँचा दिया।

पांडवों और कुंती की भीम के लिए चिंता

इधर पांडवों को भीम कहीं नहीं दिखे। यह सोचकर कि शायद वे पहले ही हस्तिनापुर चले गए हों, वे उनके बिना ही राजधानी के लिए चल पड़े। घर जाकर जब उन्हें पता चला कि भीम वहाँ भी नहीं पहुँचे हैं, तब उन सबको चिंता होने लगी, जबकि इधर कौरव अंदर-ही-अंदर खुश हो रहे थे।

लेकिन आठ दिनों के बाद भीम वापस आ गए। पांडवों ने इस घटना के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा। क्रोधित दुर्योधन ने भीम के सारथी का गला घोंटकर मार डाला, पर विदुर की सलाह पर पांडव फिर चुप रहे।

पुनः विष देना

कौरवों ने फिर से पहले से भी अधिक शक्तिशाली विष भीम के खाने में मिला दिया। कौरवों के सौतेले भाई युयुत्सु, जो पांडवों से सहानुभूति रखते थे, ने यह बात भीम को बता दी। लेकिन फिर भी भीम ने वह भोजन खा लिया, पर नागलोक की औषधियों के कारण उस विष का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

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