देवताओं के राजा इंद्र पर रावण की विजय और इंद्रजीत की कथा | पार्ट 87

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इन्द्र पर विजय (सर्ग 27)

कैलाश पर्वत को लाँघ कर रावण सेना और सवारियों के साथ इन्द्रलोक पहुँचा। (अर्थात इन्द्रलोक पृथ्वीलोक का ही एक भाग था और उत्तर भाग में स्थित था।)

राक्षसी सेना इन्द्रलोक को चारों तरफ से घेर कर बढ़ने लगी। 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र, और 49 मरुत इत्यादि सभी देवता इन्द्र के पास युद्ध के लिए एकत्र हो गए।

किन्तु देवताओं के राजा इन्द्र को पता था कि ब्रह्मा जी के वरदान के कारण देवता रावण को हरा नहीं सकते थे। अतः वे भगवान श्रीहरि विष्णु के पास गए और सहायता की याचना की।

भगवान विष्णु ने कहा, “इस समय तो यह बड़ा पराक्रम दिखाएगा, पुत्र की सहायता से महाभयंकर युद्ध करेगा। पर भयभीत न हो। इसका अंत जल्दी ही होगा। इस समय तो इसे मैं नहीं मारूँगा; क्योंकि विष्णु समरभूमि से शत्रु को बिना मारे लौटते नहीं, जबकि वरदान के कारण यह अभी सुरक्षित है। किन्तु मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि इस राक्षस के अंत का कारण मैं ही होऊँगा। मैं इसे परिवार सहित मारूँगा, पर अभी नहीं मारूँगा। इसका नाश होना ही है, यह जान कर अभी तुम निर्भय होकर उसके साथ युद्ध करो।”

इधर 11 रुद्र, 12 आदित्य, 8 वसु, 49 मरुत, दो अश्विनी-कुमार – युद्ध के लिए तैयार होकर नगर से निकले और राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। संख्या में राक्षस-सेना उनसे बहुत बड़ी थी, फिर भी देवताओं ने भयंकर युद्ध किया। रावण के नाना सुमाली सहित लगभग सभी प्रमुख शूरवीर राक्षस युद्ध लड़ रहे थे (विभीषण को छोड़ कर)। देवताओं ने यद्यपि अति पराक्रम से युद्ध लड़ा, पर हजारों देव-सैनिक राक्षसों के हाथों मारे गए।

पर इसी युद्ध में रावण का नाना सुमाली सावित्र नामक वसु के गदा-प्रहार से मारा गया।

सर्ग 28

सुमाली की मृत्यु राक्षस-सेना के लिए बड़ा आघात थी। उनमें भगदड़ मच गई। अपनी सेना को सँभालने के लिए मेघनाद आगे आया।

मेघनाद ने देवसेना को तितर-बितर कर दिया। देवराज इन्द्र ने अपने पुत्र जयंत को युद्ध के लिए भेजा। रावण-पुत्र मेघनाद और इन्द्र-पुत्र जयंत में आरंभ में लगभग बराबरी की टक्कर रही। जब मेघनाद ने देखा कि ऐसे तो उसकी विजय नहीं हो पाएगी, तब उसने अपनी माया से अंधकार कर दिया। अँधेरे में देवता ठीक से लड़ नहीं पाए। देव-युवराज जयंत के प्राणों पर संकट देख कर उसके नाना (इन्द्र की पत्नी शची के पिता) दैत्य पुलोमा जयंत को लेकर समुद्र में भाग गए। अपने सेनापति को रणभूमि में न देख कर देव-सेना की रही-सही हिम्मत भी जाती रही। इससे मेघनाद को युद्ध में स्पष्ट बढ़त मिल गई।

अपने पुत्र को रणभूमि में न देख स्वयं देवराज इन्द्र अपने विशेष रथ में बैठ कर युद्धभूमि में आ गए। उनका रथ उनका प्रसिद्ध सारथी मातलि चला रहा था। देव-सेना फिर से उत्साहित होकर एकत्र होकर युद्ध के लिए चली। इस बीच रावण भी विश्वकर्मा के बनाए दिव्य रथ पर सवार हुआ। उस रथ में ऐसे विशाल साँप लिपटे हुए थे कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस रथ को दैत्य और राक्षस घेरे हुए थे।

रावण अपने पुत्र मेघनाद को इन्द्र से लड़ने से मना कर स्वयं युद्ध करने लगा।

रावण-इन्द्र का भीषण महायुद्ध शुरू हुआ। इस समय मेघनाद तो नहीं लड़ रहा था, परंतु कुंभकर्ण दूसरे मोर्चे पर कहर बरपा रहा था। वह युद्धभूमि में इतना उन्मत्त हो चुका था कि उसे अपने पक्ष और विपक्ष का भी कोई अंतर नहीं रह गया था। जो भी उसके सामने पड़ता उसे मार डालता; जो भी वस्तु उसके हाथ लग जाती, उसे अपने असीम शारीरिक बल से महाविनाशकारी अस्त्र बना लेता था। वह भयंकर रुद्रों से लड़ रहा था।

तीसरे मोर्चे पर राक्षसी सेना मरुद्गणों से लड़ रही थी। मरुतों ने राक्षसी सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। युद्ध इतना भयंकर था कि युद्धभूमि में मृत और घायल पड़े सैनिकों के रक्त की नदी-सी बह निकली। गीध और कौए जैसे मांसभक्षी पक्षी झुंड के झुंड वहाँ एकत्र होने लगे।

अपनी सेना का विनाश देख कर रावण देवसेना में घुस पड़ा। सैनिकों को मारता हुआ वह सीधे देवराज इन्द्र के सामने आ खड़ा हुआ। दोनों रथियों (रथ पर चढ़ कर युद्ध करते हुए योद्धाओं) में भयंकर युद्ध होने लगा। तभी अंधकार छा गया।

सर्ग 29

अंधकार में भी देवताओं और राक्षसों के बीच तुमुल युद्ध अनवरत चल रहा था। पर इस अंधकार में केवल तीन लोग ऐसे थे जो ठीक से देख पा रहे थे और वस्तुस्थिति से अवगत थे- रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण। अपनी सेना के संहार से कुपित रावण ने अपने सारथी से कहा, “मेरे रथ को देवसेना के एक छोर से दूसरे छोर तक ले चलो, अपने पराक्रम से अनेक शस्त्रों की वृष्टि कर मैं देवताओं को यमपुरी का अतिथि बनाता हूँ। मैंने तुमसे दो बार कहा कि हम जिस स्थान पर हैं वह नंदन वन है, तुम उदयाचल (पूर्व) तक मेरा रथ ले चलो।” संभवतः अँधेरे में उसका सारथी दिशाओं का सही अनुमान नहीं लगा पा रहा था, इसलिए रावण ने उसे इस तरह दृढ़ता से कहा।

इधर इन्द्र को भी रावण की इस योजना का अनुमान हो गया था। उन्होंने अपने रथ में बैठे अन्य देवताओं से कहा, “चूँकि रावण को मारना देवताओं के लिए असंभव है, इसलिए उसे जीवित ही पकड़ लिया जाए। लेकिन यह कार्य कठिन है; क्योंकि एक तो वह अधिक संख्या-बल के कारण अधिक शक्तिशाली है, दूसरे अत्यंत वेगवान रथ में सवार है।”

ऐसा कह इन्द्र रावण का सामना करना छोड़ कर दूसरी जगह जा कर युद्ध करने लगे। अब रावण-इन्द्र प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से लड़ने के बजाय एक-दूसरे की सेना का संहार करने लगे। रावण उत्तर दिशा से देव-सेना में घुस गया, तो इन्द्र दक्षिण दिशा से राक्षस-सेना में।

रावण सौ योजन तक देव-सेना में घुसता चला गया। उसके बाणों के प्रहार से देव-सेना विचलित हो गई। अपनी सेना का संहार देख कर इन्द्र सावधान हुए और रावण को घेर कर उसे उधर से लौटाने के लिए स्वयं उसके पास लौटे।

यह देख कर राक्षसों ने समझा कि रावण बंदी बना लिया गया। वे हाहाकार कर उठे। अब मेघनाद अपना रथ लेकर दारुण देव-सेना में जा घुसा। उसने यज्ञ-अनुष्ठान द्वारा भगवान शंकर से वरदान में अदृश्य होने की जो मायावी शक्तियाँ पाई थीं, उनका इस समय उपयोग किया। पहले तो वह कुछ देर देव-सेना का पीछा करता रहा, तदुपरांत अन्य देवताओं को छोड़ कर इन्द्र पर झपटा।

यद्यपि देवताओं के प्रहार से उसके कवच टूट चुके थे, फिर भी देवताओं के अस्त्र-प्रहार से विचलित हुए बिना वह इन्द्र पर प्रहार करता रहा। इन्द्र का सारथी मातलि आहत हो गया। इन्द्र भी घायल हो गए। इस समय चूँकि मेघनाद अदृश्य था, इसलिए उसका पता पाकर प्रतिकार करना देवताओं के लिए दुष्कर हो रहा था। अतः इन्द्र अपना रथ और सारथी छोड़ ऐरावत हाथी पर चढ़ कर मेघनाद को ढूँढने लगे। मेघनाद को पता चल गया कि इन्द्र उसकी मायावी चाल में फँस चुके हैं। इसलिए वह अदृश्य रहते हुए ही उनकी तरफ दौड़ा। जब उसने इन्द्र को युद्ध से थका हुआ देखा, तब माया से उन्हें बाँध कर अपनी सेना में ले गया।

मेघनाद ने जब इन्द्र को बाँधा, तब भी वह अदृश्य ही था। इसलिए देवता उसका कोई उचित प्रतिकार नहीं कर सके। यद्यपि इन्द्र भी कुछ माया जानते थे, फिर भी मायावी युद्ध में वे मेघनाद से पीछे थे।

देवता मेघनाद का तो कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे थे, पर उन्होंने अपना क्रोध रावण पर उतारा। रावण युद्ध में देवताओं के समक्ष टिक नहीं सका और घायल होकर रणभूमि से भागने लगा। पर, वह एक ओर आदित्यों और दूसरी ओर वसुओं से घिरा हुआ था। उसके क्लांत और चोटों से अत्यंत आहत शरीर में युद्ध करने की शक्ति नहीं थी, पर भागने का रास्ता भी नहीं था।

पिता की यह दुर्दशा मेघनाद ने देखी। अदृश्य रहते हुए ही वह बोला, “हे तात! हम लोग विजयी हुए हैं। अब युद्ध समाप्त हो गया है। आप क्लेशित न हों। चलिए घर को चलें। मैंने इन्द्र को पकड़ लिया है, आप अपने शत्रु को बंदीगृह में बंद कीजिए। अब आपका युद्ध में श्रम उठाना व्यर्थ है।”

अपने पुत्र के ये वचन सुनकर रावण ने भी प्रसन्न होकर युद्ध बंद कर दिया। अपने राजा के बंदी बनाए जाने के बाद देवताओं के लिए भी युद्ध जारी रखना व्यर्थ था। वे किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में होने के कारण युद्ध नहीं करना चाहते थे।  

रावण अपने पुत्र मेघनाद को अपने कुल का गौरव बढ़ाने वाला आदि कह कर संबोधित किया और उसे इन्द्र सहित रथ से लंका चलने के लिए कहा। वह स्वयं अपने मंत्रियों सहित उसके पीछे आता।

मेघनाद स्वर्गाधीश इन्द्र को बंदी बना कर अपनी सेना और वाहनों सहित लंका के लिए चला। लंका पहुँचाकर उसने सैनिकों को घर लौट जाने की आज्ञा दी।

सर्ग 30

मेघनाद जब इन्द्र सहित लंका लौटने लगा तब शोकाकुल देवगण प्रजापति ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। इधर रावण भी अपने पुत्रों, भाइयों और मंत्रियों सहित पुष्पक विमान से आकाश में ही स्थित था। ब्रह्मा जी ने उसे समझाते हुए कहा कि

“हे रावण! तुम्हारे और तुम्हारे पुत्र के पराक्रम से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा पुत्र पराक्रम में तुमसे भी बढ़ कर है। तुम्हारा यह पुत्र संसार में इंद्रजीत नाम से प्रसिद्ध होगा। उस पुत्र की सहायता से तुमने देवताओं को भी अपने वश में कर लिया है, इसलिए तुम्हारा यह पुत्र बलवान और दुर्जेय होगा। पर अब तुम इन्द्र को छोड़ दो। इसके बदले तुम देवताओं से कुछ और ले लो।”

यह सुन कर मेघनाद (इंद्रजीत) बोला, “हे देव! यदि आप इन्द्र को छुड़ाना चाहते हैं, तो मुझे अमरत्व प्रदान कीजिए।” ब्रह्मा जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। तब मेघनाद ने कहा कि “अगर अमरत्व नहीं, तो इन्द्र देव को मुक्त करने के बदले मुझे मनचाही सिद्धियाँ दीजिए।” उसने माँगा,

“जब मैं शत्रु को जीतने के लिए निकलूँ और उस समय अग्निदेव का पूजन कर हवनीय द्रव्य की आहुति दूँ, तब उस समय उस अग्नि से मेरे लिए घोड़ों सहित रथ निकले। उस रथ पर जब तक मैं सवार रहूँ, तब तक अमर रहूँ। यदि मैं उस जप-होम को पूरा किए बिना युद्ध करूँ, तो मैं मारा जाऊँ। हे देव! अन्य लोग तो तप द्वारा अमरता चाहते हैं, किन्तु मैं तो अपने पराक्रम द्वारा अमरत्व चाहता हूँ।”

ब्रह्मा जी ने मेघनाद को मनचाही सिद्धि दे दी। बदले में मेघनाद ने इन्द्र को मुक्त कर दिया। इन्द्र सहित देवता लोग स्वर्ग चले गए।

बंधन से मुक्त होने के बाद भी इन्द्र के मन में अशांति और चिंता थी। अब उनमें देवत्व की कांति नहीं थी। वे चिंतित थे। उन्हें चिंतित देखकर ब्रह्मा जी ने कहा, “हे इन्द्र! चिंता क्यों करते हो? अपने कुकृत्य याद करो।”

इसके बाद उन्होंने इन्द्र को अहल्या के सतीत्व को नष्ट करने के कुकृत्य का स्मरण कराया,

“तब महामुनि गौतम जी ने क्रुद्ध होकर तुम्हें यह शाप दिया था कि तुमने अपना रूप बदल कर मेरी स्त्री का सतीत्व नष्ट किया, अतः तुम्हारी विपरीत दशा हो जाएगी और तुम युद्ध में शत्रु द्वारा पकड़े जाओगे। तुमने यह अनुचित प्रथा शुरू की, जिसे देख कर मनुष्य भी ऐसा करेंगे। अतः जो कोई पुरुष जार-कर्म करेगा, उसके आधे पाप के भागी तुम भी होगे। इस पापकर्म के कारण देवराज के पद पर तुम सदा रह भी नहीं पाओगे। यह शाप केवल तुम्हारे लिए नहीं है, बल्कि जो भी इन्द्र-पद पर बैठेगा, वही अस्थिर होगा। मेरा शाप सभी इन्द्रों के लिए है। तुम्हें शाप देने के बाद गौतम जी ने अपनी पत्नी को भी शाप देते हुए कहा, ‘मेरे आश्रम के निकट ही तू रूपहीन होकर रहेगी। ऐसा रूप और यौवन पा कर भी तेरा चित्त इतना चंचल है और तूने असन्मार्ग का अवलंबन किया है; तेरे रूपवती होने के कारण ही यह विभ्राट उपस्थित हुआ है, अतः अब तुम्हारे जैसी रूपवती स्त्री तू अकेली नहीं रहेगी, बल्कि अन्य स्त्रियाँ भी ऐसी होंगी।’ अहल्या ने इन्द्र के छल से अनभिज्ञ होने की बात कह कर उनसे क्षमा माँगी। ऋषि ने कहा, ‘जब भगवान विष्णु मनुष्य-रूप धारण कर इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न होंगे, तभी तेरे पाप दूर होंगे। उनका आतिथ्य करके जब तू मेरे निकट आएगी, तभी तू पुनः मेरे साथ रहने योग्य हो पाएगी’।”

यह सारा वृत्तांत याद दिलाने के बाद ब्रह्मा जी ने कहा कि उसी कुकृत्य और शाप के परिणामस्वरूप इन्द्र को शत्रु के हाथों बंदी बनने का अपमान उठाना पड़ा।

[स्पष्टीकरण: वाल्मीकि रामायण के बालकांड में अहल्या-प्रकरण का जो वृत्तांत है, वह उत्तरकांड में दिए गए इस वृतांत से थोड़ा अलग है, विशेष रूप से शाप के संबंध में।]

ब्रह्मा जी ने इन्द्र को वैष्णव-यज्ञ करने का सुझाव भी दिया। इस यज्ञ को करने के बाद ही इन्द्र शुद्ध होकर पुनः देवलोक में जा पाते।

ब्रह्मा जी ने ही इन्द्र और अन्य देवताओं को बताया कि इन्द्र-पुत्र जयंत मारा नहीं गया है।

श्रीराम की सभा में जब ऋषि अगस्त्य ने मेघनाद द्वारा इन्द्र को जीतने का यह प्रसंग सुनाया, तब राम ने भी इस कथा का समर्थन किया; क्योंकि उन्होंने इसे पहले भी सुन रखा था। (यहाँ अंतिम श्लोकों में कथा सुन रहे लोगों में सुग्रीव आदि वानरों, विभीषण आदि राक्षसों का भी उल्लेख है, जबकि युद्धकांड के अंत में इन सबके वापस चले जाने का उल्लेख है।)

रावण और अप्सरा रंभा कथा: नलकूबर का वह शाप जिससे काँप उठा रावण | पार्ट 87 — Scheduled

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