यमराज के अदृश्य हो जाने से अपने को विजयी मान कर रावण वहाँ से अति-उत्साह से आगे के विजय-अभियान पर चला। मारीच आदि उसके मंत्री भी उसके पुष्पक विमान पर आ गए। उनका अगला अभियान रसातल के लिए था। रसातल महाबली दैत्यों और नागों का लोक था, जिनकी रक्षा वरुणदेव करते हैं।
रसातल में सबसे पहले रावण ने वासुकि नाग की भोगवतीपुरी को जीता।
निवात कवच दैत्यों से युद्ध
बाद वह मणिमयीपुरी गया, जहाँ वरदानप्राप्त निवातकवच दैत्य रहा करते थे। दैत्यों ने एक वर्ष तक रावण से युद्ध किया। पर दोनों ही पक्षों में किसी की स्पष्ट विजय या पराजय नहीं हुई; चूँकि दोनों ही पक्षों को ब्रह्मा जी द्वारा अवध्य होने का वरदान प्राप्त था। इसलिए ब्रह्मा जी ने दोनों को समझा कर युद्ध रुकवाया। उनके परामर्श के अनुसार रावण और निवातकवच दैत्यों में मैत्री हो गई।
रावण दैत्यों के आतिथ्य में एक वर्ष वहाँ सुखपूर्वक रह कर आगे के अभियानों के लिए चला। निवातकवचों से रावण ने सौ प्रकार की मायाएँ सीखीं।
निवातकवच दैत्यों से विदा लेने के बाद रावण वरुण देव के नगर को ढूँढते हुए रसातल में घूमने लगा।
कलकेय दैत्यों से युद्ध और अपने अपने जीजा विद्युज्जिह्व की हत्या (उत्तरकाण्ड सर्ग 23)

इसी तरह घूमते हुए एक दिन वह अश्म नामक नगर में पहुँच गया। यहाँ कालकेय दैत्यों का राज्य था। रावण की बहन शूर्पनखा का पति विद्युज्जिह्व यहीं रहता था। कालकेय अत्यंत बलवान थे, किन्तु रावण ने उनको भी पराजित कर दिया।
युद्ध में रावण का बहनोई विद्युज्जिह्व जब अपने लोगों की रक्षा के लिए उसके सामने आया और रावण के सैनिकों का संहार करने लगा, तब रावण ने संबंधों की परवाह किए बिना विद्युज्जिह्व को तलवार से मृत्यु के घाट उतार दिया। साथ ही उसके चार सौ दैत्यों को भी मार डाला।
विद्युज्जिह्व से अपनी बहन का विवाह रावण ने स्वयं करवाया था। किन्तु जैसा कि बाद में उसने अपनी बहन के सामने खेद प्रकट करते हुए स्वीकार किया था कि अपनी क्रोध और अपनी विजय के सामने उसे कुछ नहीं दिखता, कोई विचार नहीं करता। इसी कारण उसने केवल अपनी शक्ति मनवाने के लिए अपनी सगी बहन के पति की हत्या स्वयं अपने हाथों से कर दिया। विद्युज्जिह्व या कालकेय दैत्यों ने कभी भी रावण का कोई अहित नहीं किया था।
वरुण देव का भवन
कालकेय दैत्यों को पराजित करने के बाद रावण को वरुण देव का श्वेत भवन दिखा। वहीं उसे सुरभि नामक गाय भी दिखी। सुरभि की विशेषता यह थी कि उसके थनों से अनवरत दूध की धारा बहती रहती थी। उसके दूध से ही क्षीरोद नामक सागर की उत्पत्ति हुई थी। भगवान शिव के महावृषभ नंदी इसी के पुत्र हैं। इसी सागर से चंद्रमा, अमृत और पितरों के स्वधा की उत्पत्ति हुई है।
रावण ने परमाद्भुत गौ की परिक्रमा की। इसके बाद वह वरुणदेव के भवन में प्रवेश करने लगा। रोकने वाले सुरक्षाकर्मियों को उसने पराजित कर अपने राजा से यह संदेश पहुँचाने के लिए कहा, ‘या तो तुम लड़ो अथवा हाथ जोड़ कर कहो कि मैं हार गया’।
यह संदेश सुनकर वरुण देव के पुत्र एवं पौत्र गौ और पुष्कर नामक दो सेनापतियों के साथ युद्ध के लिए आ गए। दारुण युद्ध में रावण की राक्षस-सेना ने वरुण की सेना का नाश कर दिया। उनके पुत्रों ने सेना का संहार देख कर कुछ देर के लिए स्वयं ही युद्ध रोक दिया। चेत आने पर उन्होंने देखा कि वे भूमि पर युद्ध कर रहे हैं, जबकि रावण पुष्पक विमान पर है। अतः शीघ्र ही वे भी आकाश में युद्ध करने चले गए। अब दोनों में भयंकर आकाश-युद्ध हुआ।
इस युद्ध में एक समय तो अत्यंत आहत रावण युद्ध से पीछे हटने लगा। अपने राजा का अपमान देख कर उसका मंत्री महोदर सामने आ गया। महोदर ने वरुण-सेना को बहुत क्षति पहुँचाई और उनके पुत्र-पौत्रों का आकाशचारी रथ नष्ट कर दिया। अब वे बिना रथ के थे, पर देवता होने के कारण आकाश में ही खड़े रहे (नीचे गिरे नहीं) और मुकाबला करते रहे। पर अंततः वे रावण के प्रहारों से आहत होकर जमीन पर गिर पड़े। सेवकों ने उन्हें घर पहुँचाया। रावण ने उन्हें वरुण के लिए संदेश दिया।
इस पर वरुण के मंत्री प्रहास ने रावण से कहा, “तुम जिसे ललकार रहे हो, वे सलिलेश्वर महाराज वरुण जी ब्रह्मलोक गए हुए हैं।” यह सुनकर रावण अपने नाम की विजय-घोषणा और हर्षनाद करते हुए वरुण-भवन से बाहर निकला।
वह जिस मार्ग से आया था, उसी मार्ग से पुष्पक विमान से लंका के लिए उड़ चला।
[इसके बाद पाँच ऐसे सर्ग हैं जिन्हें लगभग सभी भाष्यकारों ने प्रक्षिप्त माना है, रामायण का मूल भाग नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रामायण की जो प्राचीन पांडुलिपियाँ प्राप्त हुईं हैं उन सबमें ये नहीं हैं। शैली, विचार एवं कथानक में ही तारतम्य नहीं है। फिर भी लोग इस कथा के बारे में अपने अपने तरह से बातें करते हैं इसलिए ये सर्ग भी यहाँ दिए जा रहें हैं।]
(प्रक्षिप्त सर्ग 1) (बलि द्वारा पराजय)
अश्म नगर की विजय के बाद घूमते हुए वहाँ बलि का अत्यंत भव्य भवन दिखने का वर्णन है। रावण के कहने पर उसका मंत्री प्रहस्त उस भवन के स्वामी का पता लगाने अंदर गया, जहाँ उसने एक ऐसे पुरुष को देखा जिसके वेश और अट्टहास से वह घबरा कर बाहर आ गया। वह जब रावण को इस विषय में सूचना दे ही रहा था, तभी वह पुरुष स्वयं बाहर आ गया और रावण से पूछा कि “हे रजनीचर! मैं युद्ध द्वारा तेरा सत्कार करूँगा। तू बलि के साथ लड़ेगा या कुछ और विचार है?”
जब रावण उसके निकट गया, तब दानवराज बलि ने उसे अपनी गोद में बैठा लिया और पूछा, “हे दशग्रीव! मैं तेरा क्या करूँ? तू यहाँ क्यों आया है?” इस पर रावण ने कहा, “मैंने सुन रखा है कि पूर्वकाल में तुम्हें विष्णु ने बाँध रखा है, मैं तुम्हें उनके बंधन से छुड़ा सकता हूँ।”
इस पर बलि ने भगवान विष्णु के प्रताप आदि का वर्णन किया और बताया कि वे उनके द्वार की रक्षा करते हैं। उन्होंने रावण को एक दिव्य कुंडल लाने के लिए कहा, पर वह उसे हिला भी नहीं सका।
लज्जित रावण से बलि ने कहा कि उसके प्रपितामह हिरण्यकशिपु वरदान प्राप्त होने के बावजूद नृसिंह रूपधारी भगवान विष्णु के हाथों मारे गए थे। बलि हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के पुत्र थे।
बलि द्वारा नृसिंह रूपधारी भगवान विष्णु की स्तुति को सुनकर रावण उनसे लड़ने गया, पर द्वारपाल के रूप में खड़े भगवान विष्णु ने अभी उसकी मृत्यु के लिए उपयुक्त समय न जानकर वहाँ से अदृश्य होना उचित समझा। उनको द्वार पर न पा कर रावण भी हर्षनाद करता हुआ वरुण-भवन से विजयनाद करता हुआ निकल गया।
(प्रक्षिप्त सर्ग 2) (सूर्य लोक विजय)
वरुण-लोक के बाद रावण सूर्य-लोक में गया। रास्ते में सुमेरु पर्वत के रमणीक शिखर पर उसने रात्रि व्यतीत की। अगले दिन वह सूर्य-मंडल पहुँचा। सूर्य के ताप से व्याकुल होने पर भी वह अपने मंत्री प्रहस्त से सूर्यदेव को “युद्ध अथवा पराजय स्वीकार करने की आज्ञा” सुनाने के लिए कहने लगा। प्रहस्त भी सूर्य के समीप नहीं जा सका, इसलिए उसने उनके दो द्वारपालों- पिंगल और दंडी से यह संदेश उनके स्वामी को सुना देने के लिए कहा। सूर्य देव ने कुछ सोच कर अपने द्वारपाल दंडी से संदेश भिजवा दिया कि “रावण से कह दो मैं पराजित हो गया।” यह संदेश सुन कर रावण अपने विजय की घोषणा करता हुआ वहाँ से प्रस्थान कर गया।
(प्रक्षिप्त सर्ग 3) (चंद्रलोक अभियान)
सूर्यलोक के बाद रावण एक रात मेरुपर्वत पर विश्राम कर चंद्रलोक चला गया। रास्ते में उसे कुछ पुरुष मिले जो कि स्वर्ग के अभिलाषी थे, युद्ध के नहीं। पर्वत नामक मुनि ने उन सबका परिचय रावण को दिया। रावण के यह पूछने पर कि “मुझसे युद्ध करने योग्य किसी राजा को आप मुझे बतला दें,” मुनि ने अयोध्या के राजा मंधाता, जो कि युवनाश्व के पुत्र थे, का नाम बताया। मंधाता उस समय वहीं से गुजर रहे थे। रावण ने उन्हें युद्ध के लिए चुनौती दी, जिसे राजा ने स्वीकार कर लिया। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ।
[स्पष्टीकरण: युद्ध का वर्णन करते हुए श्लोक 38-39 में रावण के रथ का उल्लेख हुआ है, जबकि शुरू से यही कहा गया है कि वह पुष्पक विमान से घूम रहा था और लड़ रहा था; पर अचानक चंद्रलोक में रथ कहाँ से आ गया, यह स्पष्ट नहीं किया गया है।]
इस युद्ध में कभी राक्षस (रावण) पक्ष का पलड़ा भारी होता, तो कभी मनुष्य (मंधाता) का। अंततः पुलस्त्य और गालव ऋषि ने दोनों में मध्यस्थता कर मैत्री करवाई। अतः स्पष्ट जय अथवा पराजय किसी भी पक्ष की नहीं हुई।
(प्रक्षिप्त सर्ग 4)
महाराज मंधाता से मैत्री करने के बाद रावण आगे बढ़ते हुए आठ वायुमंडलों को पार किया। आठवें वायुमंडल के ऊपर चंद्रमा हैं। यह अस्सी हजार योजन की दूरी पर है।
चंद्रदेव के शीत को रावण नहीं सह सका। उसके मंत्री तो वहाँ से भागने की सलाह देने लगे, पर रावण चंद्रदेव पर बाणों की वर्षा करने लगा। किन्तु ब्रह्मा जी ने रावण को चंद्रदेव पर प्रहार नहीं करने के लिए कहा। साथ ही रावण को एक मंत्र दिया, जिससे प्राणों पर संकट (शीत से) का भय नहीं रहता। यह मंत्र भगवान शिव के 108 नामों की स्तुति है।
(प्रक्षिप्त सर्ग 5) (भगवान कपिल से पराजय)
चंद्रलोक से लौटने के कुछ दिनों बाद रावण को पश्चिम सागर के एक द्वीप पर दिव्य कांति युक्त एक पुरुष दिखा। उसने युद्ध के लिए ललकारते हुए उस पर भीषण प्रहार शुरू कर दिया। उसके प्रहार से विचलित हुए बिना उस पुरुष ने बिना प्रयास के ही रावण को पकड़ कर दबा दिया और फिर नीचे गिरा दिया। रावण की यह हालत देख कर उसके सहयोगी गण भय से भाग गए। सबको भयभीत कर वह पुरुष पाताल लोक में चला गया।
चेतना लौटने पर रावण भी उस पुरुष के पीछे-पीछे उसका पता लगाने के लिए उस विवर में प्रवेश कर गया, जहाँ से उस पुरुष ने प्रवेश किया था। यहाँ वह अकेले ही आया था, उसका कोई मंत्री साथ नहीं था। वहाँ उसने अत्यंत अलौकिक वातावरण देखा। 3 करोड़ साधु-संत प्रसन्न मुद्रा में नृत्य कर रहे थे।
वहाँ एक पुरुष शैया पर सो रहा था, जिसके पास ही सुंदरी बैठी थी। रावण ने उस स्त्री को बलपूर्वक पकड़ना चाहा। पुरुष ने हँसते हुए कहा, “अभी तेरी मौत नहीं आई है, प्रजापति ब्रह्मा जी का वर मानना आवश्यक है, इसीलिए तू जीवित है। तू यहाँ से बिना भयभीत हुए चला जा।” उस पुरुष के तेज से रावण दग्ध होने लगा। घबरा कर वह अचेत हो गया। चेतना लौटने पर उसने उस पुरुष का परिचय पूछा। पुरुष ने कहा, “यह बात जान कर तू क्या करेगा, अब मेरे हाथ से तेरे मारे जाने में बहुत विलंब नहीं है।”
रावण ने कहा, “हे सुरश्रेष्ठ! ब्रह्मा जी के वरदान से मैं अमर हूँ, अतः मृत्यु से मैं नहीं डरता। फिर भी अगर मुझे मरना ही पड़े, तो मैं आपके हाथों से मारा जाऊँ।”
तदुपरांत रावण ने उस पुरुष के विश्वरूप को देखा, जिसमें समस्त चराचर जगत उनके अंदर ही विराजमान था।
जब यह कथा अगस्त्य जी ने श्रीराम को सुनाई, तो राम ने उस दिव्य पुरुष और वहाँ के तीन करोड़ पुरुषों के विषय में पूछा। अगस्त्य जी ने उस पुरुष का नाम भगवान कपिलदेव बताया। उन्होंने कहा कि वहाँ उपस्थित तीन करोड़ पुरुष कपिल के समान ही तेजस्वी थे; अगर वे सब क्रोध से रावण को देख लेते, तो वह वहीं भस्म हो जाता।
तेजस्वी कपिलदेव जी का प्रभाव देख कर रावण पुनः अचेत हो गया। सचेत होने के बाद वह वहाँ से वापस अपने मंत्रियों के पास चला आया।
रावण के राजा मरुत और यमलोक विजय की कथा | वाल्मीकि रामायण पार्ट 84 — Scheduled
रावण का दिग्विजय और मेघनाद को मायावी शक्तियों की प्राप्ति | पार्ट 86 — Scheduled




