रावण के राजा मरुत और यमलोक विजय की कथा | वाल्मीकि रामायण पार्ट 83

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ऋषि अगस्त्य ने श्रीराम की सभा में रावण के विभिन्न युद्धों का विस्तार से वर्णन किया। उनके वर्णन से यह भी स्पष्ट होता है कि सभी युद्ध उसने अपनी शक्ति या रणनीति से नहीं जीता था। कई बार तो वह वरदान के कारण जीवित रहा और कई बार प्रतिपक्षी ने उससे युद्ध करने से ही मना कर दिया।

आज राजा मरुत और मृत्यु के देवता यमराज से उसके युद्ध के प्रसंग का विवरण। मरुत से युद्ध को वास्तव में युद्ध नहीं बल्कि निर्दोष और दुर्बल लोगों के संहार के रूप में देखा जाना चाहिए। यमराज ने भी उसकी शक्ति के भय से नहीं बल्कि ब्रह्म देव की बात मान कर युद्ध से अपने को हटा लिया था।    

राजा मरुत की पराजय (सर्ग 18)

वेदवती की मृत्यु के बाद भी रावण को कोई पश्चाताप नहीं हुआ। वह फिर पुष्पक विमान में बैठ कर पहले की तरह ही पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। वह उशीरबीज नामक देश पहुँचा। वहाँ उसने देवताओं के साथ यज्ञ करते हुए राजा मरुत्त को देखा। इस यज्ञ में पुरोहित थे देवगुरु बृहस्पति के भाई ब्रह्मर्षि संवर्त।

रावण को देखते ही देवगण विभिन्न पक्षियों का रूप धारण कर उड़ गए। यज्ञ-मंडप पर मरुत्त अपने पुरोहित के साथ अकेले रह गए। रावण उनसे बोला, “या तो मुझसे युद्ध करो या फिर अपनी पराजय स्वीकार कर लो।” राजा मरुत्त ने रावण का परिचय पूछा। रावण ने अपने भाई कुबेर को हराने के अपने कार्यों को गर्व सहित बताया, किन्तु मरुत्त राजा ने उसके इस कार्य को धिक्कारा।

वह रावण से युद्ध करने के लिए उद्यत हुआ, किन्तु पुरोहित संवर्त ने स्नेहपूर्वक उसे युद्ध के लिए यह कह कर मना किया कि “अगर मेरी बात मानो, तो यह युद्ध तुम्हारे लिए मंगलकारी नहीं होगा; क्योंकि यह महेश्वर-यज्ञ अगर समाप्त नहीं होगा, तो तुम्हारे कुल का नाश कर देगा। यज्ञ की दीक्षा लेकर क्रोध करना या युद्ध करना उचित नहीं है। साथ ही रावण से युद्ध में विजय भी संदेहास्पद है।”

राजा मरुत्त ने अपने गुरु की बात को मानते हुए युद्ध करने का विचार त्याग दिया। इधर रावण के मंत्री शुक ने राजा मरुत्त को पराजित घोषित कर दिया। यज्ञ में आए ऋषियों को मार कर रावण और उसके राक्षसगणों ने उनका मांस खा लिया और उनका रक्त पी लिया, फिर वहाँ से चले गए।

यमलोक विजय प्रसंग (सर्ग 20)

रावण इसी तरह मनुष्यों को त्रास देता हुआ पृथ्वी पर पुष्पक विमान से घूम रहा था, तो उसने मुनिश्रेष्ठ नारद जी को देखा। कुशल-क्षेम के बाद नारद जी ने रावण से कहा,

“तुमने नाग, गंधर्व आदि को पराजित किया, यह जान कर मैं संतुष्ट हूँ। तुम तो देवताओं से भी अवध्य हो, फिर बेचारे मनुष्यों को क्यों मारते हो? वे तो स्वयं ही व्याधियों एवं मृत्यु के वश में पड़े हुए हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “मर्त्य-लोक में रहने वाले सभी मनुष्यों को एक दिन तो मर कर यमपुरी में जाना ही है, तो क्यों न तुम यमपुरी को ही जीत लो?”

रावण ने कहा, “इस समय तो मैं रसातल-विजय के लिए जा रहा हूँ, इसके बाद तीनों लोकों को जीत कर नागों और देवताओं को वश में करूँगा, तदनंतर अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र-मंथन करूँगा।”

नारद जी ने कहा, “अगर तुम्हें रसातल ही जाना है, तो दूसरे मार्ग से क्यों जाते हो? यह अत्यंत दुर्गम यमपुरी का मार्ग प्रेतराज नगर रसातल के सामने जा निकला है।”

रावण हँस कर बोला, “अब मैं ऐसा ही करूँगा। मैं यम का वध करने के लिए दक्षिण दिशा के मार्ग से वहाँ जाता हूँ जहाँ यमराज रहते हैं। चारों लोकपालों को जीतने की प्रतिज्ञा तो मैंने पहले ही की हुई है।”

सर्ग 21

यमराज को कोई कैसे जीत सकता है, यह देखने की उत्सुकता में नारद मुनि भी यमपुरी की ओर चल पड़े। नारद जी को देख कर यमराज ने उनका स्वागत किया। नारद जी ने उन्हें बताया कि रावण उन्हें बलपूर्वक वश में करने आ रहा है। यह वार्तालाप चल ही रहा था कि रावण का पुष्पक विमान आता दिखा।

रावण ने यमपुरी में प्राणियों को अपने कर्मों के अनुसार सुख या कष्ट भोगते देखा। उसने कष्ट भोगते प्राणियों को मुक्त कर दिया। यमराज के किंकरों ने रावण को रोकने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया। किन्तु चौतरफा अनेक आघात सह कर भी पुष्पक विमान पर कोई आँच नहीं आई। दोनों तरफ से भयंकर युद्ध हुआ। यम-किंकरों के प्रहार से रावण का समस्त शरीर घायल हो गया। वह रक्त से नहा उठा। उसके कवच टूट गए। पर जल्दी ही वह सँभल गया। वह विमान से उतर कर जमीन पर खड़ा होकर युद्ध करने लगा। यम-किंकर (यमराज के सैनिक) उसके बाणों से जल कर भस्म हो गए।

सर्ग 22

अपने बड़े-बड़े योद्धाओं की मृत्यु और सेना के संहार के बाद कुपित होकर साक्षात मृत्यु के देवता यमराज स्वयं रणभूमि में आ गए। उन्हें देख कर रावण के मंत्री भयभीत होकर भाग खड़े हुए। कुछ तो वहीं अचेत होकर गिर पड़े। किन्तु रावण निर्भय होकर अचल खड़ा रहा।

रावण-यमराज में सात दिन और सात रात्रि तक भयानक युद्ध हुआ। अंततः रावण संज्ञाहीन हो गया। मृत्युदेव ने यमराज से रावण का प्राण-हरण करने की आज्ञा माँगी। यमराज ने कहा, “हे काल! यह कार्य मुझे करने दो।” ऐसा कह कर जब यमराज रावण पर अपना कालदंड प्रहार करने के लिए उद्यत हुए, तो ब्रह्मा जी ने उन्हें रोकते हुए कहा,

“हे यमराज! तुम इस दंड को चला कर इस राक्षस को मत मारो; क्योंकि मैं इसे वरदान दे चुका हूँ। अतः तुम्हें मेरी बात असत्य नहीं ठहरानी चाहिए। यह कालदंड कभी भी निष्फल नहीं हो सकता, मैंने इसे बनाया ही इसी तरह है। इसलिए इसे तुम रावण के मस्तक पर प्रहार मत करो। अगर कालदंड से रावण मृत हो गया अथवा मृत नहीं हुआ, दोनों ही स्थिति में मेरा कथन मिथ्या हो जाएगा।”

ब्रह्मा जी की बात मान कर यमराज ने अपना कालदंड रोक दिया। वे रावण के समक्ष से अदृश्य हो गए। रावण अपने को जीता हुआ मान कर अपनी विजय-गाथा सुनाता हुआ चला गया।

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