राम-लक्ष्मण अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा से ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए वन में गए थे। रास्ते में उन्होंने राक्षसी ताड़का का वध किया और ऋषि ने उन्हें अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र और विद्याएँ प्रदान कीं। विश्वामित्र उन्हें उनके पिता से केवल 10 दिनों के लिए माँगकर लाए थे, किंतु यज्ञ संपन्न होने के बाद वे दोनों भाइयों और अन्य शिष्यों के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान कर गए। इसी यात्रा के क्रम में भगवान राम ने अहल्या का उद्धार किया और अंततः मिथिला में ही चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ।
1. विश्वामित्र के अनुष्ठान का सफल समापन

राम और लक्ष्मण के साथ अपने आश्रम में पहुँचकर विश्वामित्र ने पुनः यज्ञ की दीक्षा ली और मौन व्रत धारण कर लिया। सिद्धाश्रम में उनके शिष्य कौशिक मुनि के निर्देशानुसार दोनों भाइयों ने छह दिन और छह रात तक लगातार बिना सोए पूरी निष्ठा से यज्ञ की रक्षा की।
2. मारीच को सौ योजन दूर समुद्र में फेंकना
छठे दिन जब दोनों भाई यज्ञ स्थल की रखवाली कर रहे थे, तब मारीच और सुबाहु अपने अनुचरों के साथ यज्ञ में बाधा डालने आ पहुँचे।
- श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि “ऐसे कायरों को मैं जीवित नहीं छोड़ना चाहता” और अपने धनुष से ‘शितेषु’ नामक मानवास्त्र चलाया।
- यह बाण बिना नोक का था, जो मारीच की छाती पर लगा।
- इस अस्त्र के भारी वेग के कारण मारीच सौ योजन दूर समुद्र में जाकर गिरा। यही मारीच आगे चलकर सीता-हरण के समय मायावी स्वर्ण मृग बना था।
3. सुबाहु और अन्य राक्षसों का वध
मारीच के बाद श्रीराम ने अत्यधिक फुर्ती दिखाते हुए सुबाहु की छाती पर ‘आग्नेय अस्त्र’ चलाया, जिससे सुबाहु वहीं ढेर हो गया। इसके पश्चात उन्होंने ‘वायव्य अस्त्र’ का प्रयोग करके अन्य सभी राक्षसों का भी संहार कर डाला। इस प्रकार विघ्न-बाधाएँ समाप्त होने पर ऋषियों ने प्रसन्नतापूर्वक अपना अनुष्ठान पूरा किया।
4. राम-लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ मिथिला प्रस्थान
यज्ञ संपन्न होने के अगले दिन विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को मिथिला में आयोजित होने वाले महान यज्ञ और राजा जनक के अद्भुत शिवधनुष के बारे में बताया।
- विश्वामित्र कई ऋषियों के साथ राम-लक्ष्मण को लेकर मिथिला की ओर चल पड़े।
- मार्ग में श्रीराम हर स्थान, नदी और आश्रम के इतिहास के बारे में जिज्ञासा करते और विश्वामित्र उन्हें गंगा अवतरण, क्षीर सागर मंथन और दिति की तपस्या जैसी कथाएँ सुनाते हुए आगे बढ़े।
- मिथिला पहुँचने से एक रात पहले उन्होंने विशाला नगरी के राजा सुमति के आतिथ्य का आनंद लिया।
5. अहल्या का उद्धार और मिथिला आगमन
मिथिला नगर के बाहर उपवन में उन्हें ऋषि गौतम का एक शांत लेकिन सुनसान पुराना आश्रम दिखाई दिया। यहीं महर्षि गौतम की शापग्रस्त पत्नी अहल्या पाषाण रूप में भगवान राम की प्रतीक्षा कर रही थीं। विश्वामित्र के निर्देशानुसार श्रीराम ने अपने चरणों की धूल से अहल्या का शापमुक्त कर उनका उद्धार किया।
इसके पश्चात सभी लोग मिथिला नगर में प्रवेश कर गए। इस प्रकार विश्वामित्र द्वारा यज्ञ की रक्षा के लिए लाए गए राम ने इस यात्रा के दौरान कई महान और ऐतिहासिक कार्य पूरे किए।
ताटका कौन थी और भगवान राम ने स्त्री का वध क्यों किया? (भाग 7)
