कृष्ण ने सबसे पहले किस राक्षस का वध किया? – भाग 7

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पूतना वध

कृष्ण जन्म का एक उद्देश्य था अत्याचारी राक्षसों का अंत करना। इस कार्य का आरंभ किसी पुरुष राक्षस से नहीं बल्कि एक स्त्री यानी राक्षसी पूतना के वध से हुआ। वे स्त्री-वध नहीं करते, लेकिन जब पूतना स्वयं ही उनका वध करने आ गई, तो इस बालघातिनी को उसके कर्मों का परिणाम देना ही उचित था। (प्रसंगवश, रामावतार में भी राक्षस-वध का कार्य एक राक्षसी ताड़का के वध से ही शुरू हुआ था।)

श्रीकृष्ण की मुश्किलें तो उनके जन्म से पहले ही शुरू हो चुकी थीं। जन्म के तुरंत बाद से ही, जब वे नवजात शिशु थे, उनकी हत्या के लिए अनेक प्रयास हुए। पूतना और तृणावर्त क्रमशः पहले दो राक्षस थे, जिन्होंने कृष्ण की हत्या करने का प्रयत्न किया, पर वे उनके हाथों स्वयं ही मारे गए।

पूतना वध की पृष्ठभूमि

श्रीकृष्ण के जन्म के बाद वसुदेवजी भगवान की आज्ञा के अनुसार उन्हें गोकुल में नंद जी के घर पहुँचा आए और नंद जी की पुत्री को ले आए। गोकुल में नंद बाबा के घर पुत्र-जन्म की खबर सुनते ही समस्त गोकुल में खुशी की लहर दौड़ गई। नंदबाबा ने अत्यंत उत्साह से वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर स्वस्ति-वाचन और अपने पुत्र का जातकर्म कराया। उन्होंने देवताओं और अपने पितरों का पूजन करवाया और ब्राह्मणों को विविध वस्तुओं का दान दिया। समस्त नगर सजाया गया। नगरवासी ग्वाले, गोप और गोपियाँ नवजात शिशु को आशीर्वाद देने सज-संवरकर और भेंट देने के लिए तरह-तरह की सामग्री लेकर आने लगे। तरह-तरह के उत्सव मनाए जाने लगे।

नंदजी का मथुरा जाना

श्रीकृष्ण जन्म के कुछ ही दिनों बाद नंद जी गोकुल की रक्षा का भार दूसरे गोपों को सौंपकर कंस का वार्षिक कर चुकाने के लिए मथुरा गए। कर चुकाने के बाद जब वे वहाँ रुके हुए थे, तब वसुदेव जी उनसे मिलने आए। योगमाया की चेतावनी के बाद कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त कर दिया था। नंदबाबा और वसुदेव जी दोनों बड़े ही प्रेम और आदर से मिले और एक-दूसरे का हालचाल जाना।

बातचीत के बाद वसुदेव जी ने नंदबाबा से कहा कि अब मथुरा में उनका कार्य संपन्न हो चुका था, इसलिए उन्हें गोकुल निकलना चाहिए, क्योंकि गोकुल में आजकल बड़े उत्पात हो रहे थे। अभी तक नंद जी को यह पता नहीं था कि उनके पुत्र वास्तव में वसुदेव जी के पुत्र थे, लेकिन वसुदेव जी तो यह जानते थे। उन्हें अपने दोनों पुत्रों की सुरक्षा की चिंता थी। वसुदेव जी की बातों से नंदबाबा को भी किसी अनहोनी की आशंका होने लगी। वे उनसे अनुमति लेकर शीघ्र ही गोकुल के लिए विदा हुए।

गोकुल में पूतना द्वारा कृष्ण को मारने का प्रयास

इधर गोकुल में वसुदेव जी की आशंका सत्य हो रही थी। कंस की मित्र राक्षसी पूतना, जिसमें अपना रूप बदलने और आकाशमार्ग में चलने की शक्ति थी, गोकुल में गोपों के बच्चों को मार रही थी। नंद भवन में उत्सव से उसे वहाँ बच्चा पैदा होने का पता चल चुका था। अतः जब नंद जी मथुरा में ही थे, पूतना ने उनके नवजात पुत्र कृष्ण को मारने का प्रयत्न किया।

पूतना एक सुंदर युवती का रूप बनाकर नंद बाबा के घर गई। उसका रूप देखकर यशोदा, रोहिणी और अन्य सभी गोपियों ने उसके साथ मित्रवत व्यवहार किया। पूतना ने सोए हुए बालक श्रीकृष्ण को अपना विषैला दूध पिलाकर मार डालने की नीयत से अपनी गोद में उठा लिया।

गोद में उठाते समय श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। उनके आँखें बंद करने की विद्वानों ने कई तरह से व्याख्या की है।

पूतना का वध

भगवान दूध के साथ-साथ जब उसके प्राण भी पीने लगे, तो पूतना पीड़ा से चीखने लगी और भगवान को अपने से अलग करना चाहा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी।

अत्यधिक पीड़ा होने के कारण पूतना अपना असली रूप छुपाए नहीं रख सकी। वह अपने भयंकर राक्षसी रूप में प्रकट हो गई और बाहर आकर मर कर गिर गई।

गिरते समय उसका शरीर इतना विशाल हो गया कि इससे छह कोस के भीतर के वृक्ष दबकर कुचल गए। घबराई हुई गोपियाँ जब उसके पास गईं, तो देखा कि शिशु श्रीकृष्ण निर्भय होकर पूतना के मृत शरीर की छाती पर खेल रहे थे।

गोपियों ने कृष्ण को जल्दी से उठाया और उनकी नजर उतारने के लिए तरह-तरह के उपाय किए तथा भगवान से उनकी रक्षा के लिए प्रार्थना की। यशोदाजी ने दूध पिलाकर उन्हें पालने में सुला दिया।

इसी बीच नंदबाबा मथुरा से लौटकर आ गए। पूतना के मृत शरीर को देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें इस बात के लिए भी आश्चर्य हुआ कि जैसा वसुदेव जी ने कहा था, वैसा ही हुआ।

पूतना का शरीर बहुत बड़ा था और उसे समूचे ले जाना संभव नहीं था, इसलिए ब्रजवासियों ने उसके मृत शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर, गोकुल से दूर ले जाकर लकड़ियों पर रखकर जला दिया। उसके जलते हुए शरीर से अगर (अगरू) की तरह सुगंध आ रही थी। चूूँकि भगवान ने उसका दूध पिया था, भले ही उसने उन्हें मारने की नीयत से दूध पिलाया था, फिर भी उसे परमगति मिली।

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