जटायु के भाई गिद्ध संपाती ने सीता के विषय में बहुत कुछ निश्चित जानकारी दे दी थी। यह तो पता चल चुका था कि सीता समुद्र पार लंका में थी। लेकिन अब समस्या थी कि इतने विशाल समुद्र को पार कौन कर सकता था? किसी की शक्ति इसके लिए पर्याप्त नहीं थी।
जांबवान द्वारा हनुमान को उनकी शक्ति याद दिलाना
तब जांबवान (इनके नाम का उच्चारण कहीं-कहीं जांबवन्त भी है), ने हनुमान को उनकी उत्पत्ति की कथा सुना कर बताया कि वे वायु देव के पुत्र है और इसलिए छलांग लगाने और उड़ने की उनकी गति वायु देव के समान ही है। उन्होने उनके अन्य अनेक गुणो को भी बताया जो कि वरदान के कारण उन्हे मिला था लेकिन शाप के कारण उसे वे भूल चुके थे। साथ ही उन्हें यह वरदान भी था कि अगर कोई उन्हें उनकी शक्ति याद दिलाएगा तो उन्हें याद आ जाएगा। इसलिए जाम्बवान के याद दिलाने पर उन्हें अपनी शक्ति याद आ गई।
हनुमान द्वारा समुद्र पार करना
जांबवान जी द्वारा उत्साह वर्धन करने पर हनुमान समुद्र पार कर लंका जाने के लिए उत्साह पूर्वक तैयार हो गए। उन्हे अपनी शक्ति का अनुभव हो गया था। उन्होने अपना शरीर बढ़ा कर विशाल कर लिया और महेंद्र पर्वत पर चढ़ कर लंका के लिए छलांग मारा। उनके छलांग में इतना वेग था कि महेंद्र पर्वत धँस गया।
मैनाक पर्वत का हनुमान से विश्राम के लिए आग्रह
हनुमान जब समुद्र के ऊपर से जा रहे थे, तो समुद्र हो बड़ी प्रसन्नता हुई। राम के पूर्वज सगर (जिसके नाम पर सागर कहलाया) ने ही उसका विस्तार किया था। अतः उसने अपने जल के अंदर स्थित मैनाक पर्वत को हनुमान का स्वागत करने और विश्राम की व्यवस्था करने के लिए कहा।
मैनाक पर्वत हनुमान के पिता पवन देव का मित्र भी था। अतः वह बड़े प्रसन्नता के साथ अपना आकार बढ़ा कर समुद्र से ऊपर आ गया। उसने हनुमान से अपने शिखर पर भोजन और विश्राम के लिए कहा। लेकिन वे उसे स्पर्श और प्रणाम कर अपना कार्य करने के जल्दी के विषय में बता कर बिना रुके आगे बढ़ गए।
सुरसा द्वारा हनुमान की परीक्षा
देवताओं को हनुमान पर यद्यपि पूरा भरोसा था कि राम का कार्य सफलता से कर लेंगे। फिर भी उन्होने उनकी परीक्षा करने का विचार किया। इस उद्देश्य से सुरसा नामक एक नाग माता को भेजा।
सुरसा हनुमान के रास्ते में खड़ी हो गई। उसने उनसे कहा कि उसके मुँह में जाए बगैर वे नहीं जा सकते। ऐसा कह कर उसने अपना मुँह खोला। लेकिन जितना बड़ा मुँह वह खोलती थी, हनुमान उससे बड़े बन जाते थे। अंत में जब उसने अपना मुँह सौ योजन तक बढ़ा लिया, तब वे छोटे रूप बना कर उसके मुँह में घुस कर बाहर आ गए।
हनुमान ने सुरसा से कहा कि वे अब उस के मुँह में घुस गए इसलिए आगे जाने दे। सुरसा यह देख कर प्रसन्न हुई और आशीर्वाद देकर चली गई।
सिंहिका का वध
समुद्र के ऊपर उड़ते हुए जब वे आग बढ़े तो रास्ते में उन्हे सिंहिका नामक राक्षसी मिली। उसका रूप भयंकर था। सिंहिका को प्राणियों की परिछाई को पकड़ सकने की शक्ति प्राप्त थी। इसके विषय में सुग्रीव ने उन्हे बताया हुआ था। हनुमान की छाया को पकड़ कर सिंहिका ने उन्हे मार कर खाना चाहा। उन्होने सिंहिका को मार कर अपने आगे की यात्रा जारी रखा।
हनुमान जी का लंका पहुँचना
उड़ते हुए आकाश से ही उन्होने त्रिकुट पर्वत पर बने सुंदर नगर लंका को देखा। उन्होने सोचा उन्हे देख कर राक्षस उनके विषय में जानना चाहेंगे। इससे सीता की खोज में रुकावट आ सकती थी। सीता के मिलने से पहले वे किसी को अपने विषय में बताना नहीं चाहते थे। यही विचार कर उन्होने अपना रूप अत्यंत छोटा बना लिया।
लंका के समुद्र तट पर पहुँच कर उन्होने पहले बाहर से लंका का अवलोकन किया। फिर उन्होने सोचा रात को नगर में जाना चाहिए जिससे किसी को उनके आगमन का पता नहीं चले। वे सूर्यास्त तक प्रतीक्षा करते रहे।
लंकिनी को पराजित करना
सूर्यास्त के बाद जब वे लंका में प्रवेश करने लगे तो लंकापुरी की रक्षिका ने उन्हे देख लिया। रक्षिका का नाम भी लंका ही था, पर स्त्री होने के कारण वह लंकिनी भी कही जाती थी। लंकिनी ने उन्हे रोकने का प्रयास किया लेकिन हनुमान के मुक्के के प्रहार से वह विचलित हो गई। लंकिनी को ब्रह्मा का यह कथन याद आ गया कि जिस दिन किसी वानर के प्रहार से वह व्याकुल हो जाएगी, उसी दिन
