हनुमान जी जब लंका पहुँचे तब उनके समक्ष सबसे बड़ी समस्या ये थी कि इतने बड़े लंका में वे एक स्त्री को कैसे ढूँढ़ें? और अगर ढूँढ भी लें तो पहचाने कैसे? वे सीता के मिलने से पहले रक्षकों के सामने भी नहीं आना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने रात के समय बहुत ही छोटा-सा रूप धारण कर प्रत्येक घर में जाकर चुपचाप देखने का निश्चय किया।
इस संबंध में कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि हनुमान ब्रह्मचारी थे। इस तरह स्त्रियों के महल में रात को जाकर देखना क्या धर्म के प्रतिकूल नहीं था? कुछ लोग किसी अप्रमाणिक ग्रंथ के आधार पर उनके द्वारा प्रायश्चित करने की बात भी कहते हैं। लेकिन इस तरह की सभी शंकाएँ धर्म और ब्रह्मचर्य को गलत तरीके से समझने के कारण उत्पन्न हुई है। इस तरह की शंका स्वयं हनुमान को भी हुआ था, लेकिन स्वयं उन्होंने ही इसका निराकरण भी कर दिया।
वास्तव में हनुमान का स्वभाव और व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श और अनुकरणीय है। सीता को ढूँढने संबंधी वृतांत रामायण में इस तरह है।
अंतःपुर में सीता की खोज
लंका में प्रवेश करने के बाद हनुमान ने सबसे पहले यह विचार किया कि इतने बड़े नगर में सीता जी को कहाँ ढूँढा जाय? उन्होंने सोचा रावण उन्हें अपने अन्तःपुर में ही रखा होगा। अतः वे अंतःपुर के एक-एक भवन और कमरे में जाकर देखने लगे। लेकिन उन्हें कोई ऐसी स्त्री नहीं मिली जिसके सीता होने का अनुमान हो।
रावण और दूसरे राक्षसों के महलों में सीता की खोज
अतः अब वे वहाँ से निकल कर पहले रावण के महल में, फिर दूसरे राक्षसों के महल में ढूँढ आए। फिर महल से लगे हुए अन्य स्थानों, महल के पास रखे पुष्पक आदि सभी संभावित स्थानों पर ढूँढ लिया।
इन महलों में रहने वाली प्रत्येक स्त्री को वे देखते लेकिन उनमें उन्हें सीता जैसे लक्षण नहीं दिखें। चूँकि उन्होंने सीता को देखा नहीं था इसलिए केवल अनुमान ही कर रहे थे। रावण के महल में सोई हुई मंदोदरी की सुंदरता देख कर उन्हें उनके सीता होने का संदेह हुआ लेकिन फिर विचार किया कि बलपूर्वक अपहरण कर के लाई हुई कोई पतिव्रता स्त्री इतने अच्छे गहने-कपड़े पहन कर इतने आराम से नहीं सो सकती।
रावण आदि किसी राक्षस के महल में भी सीता नहीं मिली तो वे दुबारा रावण के अंतःपुर में जाकर देख आए। इस बार भी उन्हें सफलता नहीं मिली।
हनुमान जी को पापबोध
कुछ देर के लिए अचानक उनके मन में एक पापबोध और ग्लानि, साथ ही निराशा सभी भाव आए। हनुमान को पापबोध और ग्लानि इस बात के लिए हुआ कि ब्रह्मचारी होने के कारण उन्होंने आज तक किसी परायी स्त्री की तरफ देखा तक नहीं था। लेकिन आज एकांत में असावधान अवस्था में पड़ी हुई स्त्रियों को छुपकर देखा। उनसे कोई पाप तो नहीं हो गया?
लेकिन फिर उन्होंने विचार किया। किसी स्त्री को ढूँढने के लिए स्त्री के पास या स्त्रियों के बीच जाना एक अनिवार्यता थी। ऐसा उन्होंने किसी कुविचार से नहीं किया था। फिर उन स्त्रियों को देखने पर उनके मन में किसी प्रकार का विक्षोभ या विकार उत्पन्न नहीं हुआ था। वास्तव में उनका ध्यान माता सीता और अपने आराध्य राम में इस तरह लीन था कि सीता को ढूँढने के अपने लक्ष्य के अलावा और किसी तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया। ब्रह्मचर्य का अर्थ स्त्रियों से दूर रहना नहीं बल्कि उनके प्रति कुविचार से दूर रहना है।
हनुमान जी को निराशा
उनमें निराशा के भाव इसलिए आए कि सीता के नहीं मिलने से एक संभावना यह भी हो सकती था कि उन्हें रावण ने मार डाला हो। उनकी मृत्यु या नहीं मिलने की सूचना लेकर अगर वे अपने आराध्य राम के पास जाते तो उन पर क्या बीतती! लेकिन शीघ्र ही वे इस निराशा को दूर कर राम का नाम लेकर सीता को ढूँढने में यह निश्चय कर लग गए कि बिना उनका पता लगाए वे वहाँ से जाएँगे नहीं और पता लगने तक अपने प्रयास नहीं छोड़ेंगे।
अशोक वाटिका में सीता की खोज
ऐसा निश्चय कर वे तीसरी बार रावण के अन्तःपुर में गए। अचानक उनके मन में विचार आया कि वे तीन बार अन्तःपुर के कोने-कोने को देख चुके थे, लेकिन अंतःपुर के महलों के बीच बने वाटिका (अशोक वाटिका या प्रमाद वन) में एक बार भी नहीं गए थे। इसलिए वहाँ भी एक बार देख लेना चाहिए।
ऐसे सोच कर वह उस छोटे मगर खूबसूरत बने और बहुत ही कड़े पहरे वाले अशोक वाटिका में गए। वाटिका में एक वृक्ष के नीचे एक चैत्य बना हुआ था। (चैत्य चबूतरे की तरह का एक स्थान होता था, जहाँ कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा होती थी)। उस चैत्य पर एक स्त्री बहुत ही दयनीय अवस्था में बैठी हुई थी।
हनुमान जी का सीता को पहचानना
हनुमान जी नजदीक के वृक्ष पर चढ़ कर देखने लगे। वह स्त्री दिखने में बहुत सुंदर थी। लेकिन अभी उसकी सुंदरता उसके दुख से छुप-सी गई प्रतीत होती थी। उसकी पीली साड़ी मैली हो गई थी। बालों की चोटी सँवारे नहीं जाने के कारण जटा-सी प्रतीत हो रही थी। वह ऐसे दुर्बल लग रही थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन नहीं मिला हो।
हनुमान को उस स्त्री के सीता होने का अनुमान हुआ। वे थोड़े और पास चले गए। उन्होंने देखा उस स्त्री के गालों पर सूखे आँसुओं के निशान थे। इतनी रात को जब सारा नगर सो रहा था, वह जगी हुई थी।
वह थोड़ा और तसल्ली कर लेना चाहते थे कि वह सीता ही थी। उन्हें उस वस्त्र और उन आभूषणों की याद आई जो आकाशमार्ग से रावण द्वारा ले जाई जा रही स्त्री ने राम का नाम लेते हुए रिष्यमूक पर्वत पर नीचे गिराया था। वाटिका में बैठी स्त्री वही पीली साड़ी पहने हुए थी। उसके शरीर पर आभूषण बहुत कम थे। जो आभूषण रिष्यमूक पर्वत पर गिराए गए थे, वे उसके शरीर पर नहीं थे। कंगन, चूडामणि आदि आभूषण उन आभूषणों में नहीं थे, वे यहाँ उस स्त्री के शरीर पर थे।
उस स्त्री के चारों तरफ कड़ा पहरा था। इससे स्पष्ट होता था कि वह वहाँ बंदिनी बना कर रखी गई थी। इतने सबूतों के देख कर हनुमान को निश्चय हो गया कि वह स्त्री उनके प्रभु राम की पत्नी सीता ही थीं।
सीता के जीवित होने और पता मिल जाने से एक तरफ तो उन्हें खुशी हुई लेकिन उनकी यह दुर्व्यवस्था देख कर उन्हें बहुत दुख भी हुआ।
