पांडवों और कौरवों ने दो गुरुओं से शिक्षा लिया था कृपाचार्य से और द्रोणाचार्य से। द्रोणाचार्य एक गुरु के रूप में कई कारणों से विवादों में रहे हैं जैसे एकलव्य का अंगूठा कटवाना, अर्जुन को विशेष प्रेम करना, गुरु दक्षिणा के रूप में अपने शिष्यों द्वारा अपने बचपन के मित्र राजा द्रुपद से प्रतिशोध लेना, आदि। द्रुपद से उनकी दुश्मनी और इस प्रतिशोध का असर यह हुआ कि प्रतिशोध का प्रतिशोध लेने के लिए द्रुपद ने यज्ञ कर एक बेटा और एक बेटी प्राप्त किया। बेटी का नाम हुआ द्रौपदी और बेटे का धृष्टद्युम्न। धृष्टद्युम्न ने ही महाभारत के युद्ध में अधर्मसंगत तरीके से हथियार डाल चुके द्रोणाचार्य का सिर काटा था।
कौन थे आचार्य द्रोण?
द्रोणाचार्य के पिता हरिद्वार में रहने वाले सम्मानित महर्षि भरद्वाज थे। उनकी माता एक अप्सरा थी जिसका नाम था घृताची। उनका जन्म एक यज्ञ कलश यानि द्रोण से होने के कारण उनका यह नाम पड़ा। वे सम्पूर्ण वेदों, वेदांगों और अस्त्रों के ज्ञाता थे। उन्होने महेंद्र पर्वत पर जाकर महर्षि परशुराम से दिव्य अस्त्र, धनुर्वेद और नीति शास्त्र की शिक्षा लिया था।
द्रोणाचार्य का विवाह और परिवार
बड़े होने पर द्रोण का विवाह हस्तिनापुर के महाराज शांतनु की पालित पुत्री कृपी से हो गया। इस युगल को अश्वत्थामा नामक पुत्र हुआ। लेकिन इतने विद्वान होने के बावजूद द्रोणाचार्य आजीविका के लिए कुछ नहीं करते थे। इससे उनके परिवार का जीवन बहुत गरीबी में कट रहा था। पुत्र अश्वत्थामा होने के बाद आर्थिक जरूरतें बढ़ी। एक दिन उन्होने देखा कि अश्वत्थामा दूध पीने की इच्छा रखता था लेकिन उनके पास उसे दूध देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी। यह देख कर द्रोणाचार्य को बहुत दुख हुआ और उन्होने कहीं से गाय का इंतजाम करने का निश्चय किया। उन्होने कई लोगों से गाय ऐसे दान में मांगा ताकि किसी को कोई दिक्कत नहीं हो। पर इस शर्त पर उन्हें गाय नहीं मिल सकी।
वापस आने पर उन्होने देखा कि अश्वत्थामा के दोस्त उसे आंटे के पानी को दूध कह कर ललचा रहे थे। उसी पानी को दूध समझ कर बालक वह पी गया और यह सोच कर बहुत खुश हो गया कि ‘मैंने दूध पी लिया।’
द्रोणाचार्य और द्रुपद की मित्रता
अपनी गरीबी पर इतना दुख द्रोणाचार्य को अब तक कभी नहीं हुआ था जैसा इस समय अपने बच्चे को देख कर हुआ। इस स्थिति में द्रोणाचार्य को अपने बचपन के दोस्त द्रुपद की याद आई। हुआ यह था कि उत्तर पांचाल देश के राजा पृषत द्रोण के पिता भरद्वाज के मित्र थे। पृषत का ही पुत्र था द्रुपद। पिता के दोस्ती के कारण दोनों के बच्चों- द्रोण और द्रुपद- में भी दोस्ती थी। दोनों आश्रम में साथ खेलते और पढ़ते थे। दोनों ने साथ ही भरद्वाज और गुरु अग्निवेश से धनुर्वेद की शिक्षा ली थी।
पिता की मृत्यु होने के बाद द्रुपद उत्तर पांचाल देश के राजा बने। वह अपनी राजधानी में रहने लगे। जबकि अपने पिता की मृत्यु के बाद द्रोण पिता के आश्रम में ही रह कर तपस्या और धनुर्वेद का अभ्यास करने लगे। इस तरह द्रोण और द्रुपद- दोनों मित्रों में अब भेंट नहीं होती थी।
द्रुपद द्वारा द्रोणाचार्य का अपमान
द्रोणाचार्य ने अब ब्राह्मण के लिए उचित तरीके से धन कमाने का निश्चय कर द्रुपद के पास जाने का विचार किया। उन्हें उम्मीद थी कि बचपन का मित्र द्रुपद उनकी आर्थिक मदद जरूर करेगा जैसा कि वह बचपन में हमेशा कहा करता था। इसी विश्वास पर वह अपनी पत्नी और बेटे को लेकर पांचाल देश चले गए।
पर द्रुपद राजा होने के अभिमान में बचपन की मित्रता को भूल बैठा। यहाँ तक कि सभा में एक दरिद्र ब्राह्मण द्वारा अपने को सखा कहा जाना भी द्रुपद को अच्छा नहीं लगा। उसने द्रोण का अपमान किया। दोनों की हैसियत में अंतर दिखाते हुए कहा कि उन दोनों में मित्रता नहीं हो सकती, ‘बचपन की बातें बड़े होने पर क्षीण हो जाती है’। द्रोण ने उसे ‘मित्र’ कहा लेकिन द्रुपद ने द्रोण को एक अनजान गरीब ब्राह्मण की तरह ‘ब्राह्मण’ शब्द से संबोधित किया, और कहा ‘ब्राह्मण! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रात के लिए अच्छी तरह भोजन दे सकता हूँ।’
इस अपमान से द्रोण तिलमिला उठे और पत्नी और बेटे के साथ वहाँ से लौट गए। उन्होने मन-ही-मन इसका बदला लेने का निश्चय किया।
द्रोण का हस्तिनापुर आना
द्रोण ने अब द्रुपद से बदला लेने और धन उपार्जन करने का निश्चय कर लिया था। वे अपने बेटे अश्वत्थामा को एक अच्छी ज़िंदगी देना चाहते थे। ऐसा निश्चय कर वे कुरु वंश की राजधानी हस्तिनापुर चले गए। हस्तिनापुर का राजपरिवार गुणी और प्रतिभाशाली लोगों का सम्मान करता था। साथ ही उनकी पत्नी कृपी के भाई कृपाचार्य, जो कि कुरु वंशीय राजकुमारों- कौरवों और पांडवों के गुरु थे, भी वहीं रहते थे।
हस्तिनापुर में द्रोण अपनी पत्नी के भाई कृपाचार्य के घर में रहने लगे लेकिन उन्होने किसी को अपना परिचय नहीं दिया। उनका पुत्र अश्वत्थामा कृपाचार्य के बाद राजकुमारों को कभी-कभी अपने पिता से सीखे गे अस्त्र विद्या की शिक्षा दे देता था। लेकिन किसी ने उसे पहचाना नहीं।
द्रोण द्वारा कुरु राजकुमारों की सहायता
द्रोण ने राजकुमारों के गुरु यानि आचार्य का पद कृपाचार्य से अपने संबंध के कारण नहीं बल्कि अपनी योग्यता के बल पर पाना चाहते थे। उन्होने ऐसा ही किया। यह कहानी भी बड़ी रोचक है।
हुआ यह कि एक दिन कौरव और पांडव सभी राजकुमार हस्तिनापुर नगर के बाहर गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। उनकी गुल्ली (बीटा) कुएं में गिर गया। बहुत प्रयत्न करने के बाद भी वे उसे नहीं निकाल सके। उन राजकुमारों ने पास में ही एक ब्राह्मण को देखा जो कि अग्निहोत्र करके वहाँ रुके हुए थे। उनका रंग सांवला, बाल सफ़ेद और शरीर अत्यंत दुर्बल था। सभी राजकुमार उन्हें घेर कर खड़े हो गए। वह ब्राह्मण सब बाते समझ गए। वे बोले “तुम लोगों के क्षत्रिय बल को धिक्कार है, अस्त्र-शस्त्र निपुणता को धिक्कार है जब तुम लोग कुएं में गिरी हुई गुल्ली को नहीं निकाल सकते। देखो मैं तुम्हारी गुल्ली और अपनी इस अँगूठी दोनों को सींकों से निकाल सकता हूँ। तुमलोग मेरी जीविका की व्यवस्था करो।”
ऐसा कह कर उन्होने अपनी अँगूठी उस सूखे हुए कुएं में गिरा दिया। इस पर बड़े राजकुमार युधिष्ठिर ने कहा “ब्राह्मण! आप कृपाचार्य की अनुमति से सदा यहीं रह कर भिक्षा प्राप्त करें।” वह ब्राह्मण द्रोण थे।
इस पर द्रोण हँस कर बोले “ये मुट्ठी भर सींकें हैं, जिन्हें मैंने मंत्र से अभिमंत्रित किया है। तुमलोग इसका बल देखो। मैं एक सींक से उस गुल्ली को बींध दूंगा, फिर दूसरी सींक से पहली को बीधूंगा। इसी प्रकार से दूसरी को तीसरी से, तीसरी से चौथी को और इस प्रकार सींकों के संयोग से गुल्ली मिल जाएगी।”
सभी राजकुमार उन्हें आश्चर्य से देखते रहे। अपने कहे अनुसार विधि से द्रोण ने गुल्ली को उस कुएं से निकाल दिया। बाद में राजकुमारों के कहने से धनुष बाण से अपनी अँगूठी भी निकाल लिया। उनके इस अद्भुत कौशल से प्रभावित राजकुमारों ने उनका परिचय पूछा। इस पर उन्होने कहा “मेरे रूप और कार्य के विषय में भीष्म को बताओ वे मुझे पहचान लेंगे।”
भीष्म द्वारा द्रोण को कुरु राजकुमारों का गुरु यानि आचार्य नियुक्त करना
राजकुमारों ने ऐसा ही किया। सब सुनने के बाद भीष्म समझ गए कि यह आचार्य द्रोण ही हैं। वे राजकुमारों के लिए पहले से ही किसी उपयुक्त गुरु की खोज कर रहे थे। द्रोण उन्हें ऐसे उपयुक्त गुरु लगे। वे स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक द्रोण को राजमहल ले आए।
आने का प्रयोजन पूछने पर द्रोण ने राजा द्रुपद द्वारा अपने अपमान की बात बताते हुए कहा “द्रुपद के यहाँ से चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी जिसे मैं शीघ्र ही पूर्ण करूँगा। मैं गुणवान शिष्यों द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथ को पूर्ण करने के लिए हस्तिनापुर आया हूँ। बताइए मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूँ?”
भीष्म ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें राजकुमारों को धनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रों की अच्छी शिक्षा देने के लिए कहा। साथ ही एक सजा-संवारा सुंदर भवन भी उनको रहने के लिए दिया। द्रोण ने कौरवों और पांडवों को शिष्य के रूप में स्वीकार किया।

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