पांडवों और कौरवों का आपसी खेल
पांडव जब अपनी माता के साथ हस्तिनापुर में रहने लगे तब सामान्य परिवार के बालकों की तरह वे सब भी कौरवों के साथ तरह-तरह के खेल खेलते। उदाहरण के लिए कौन सबसे पहले कोई वस्तु उठाएगा, कौन पहले या अधिक खाएगा, कौन अधिक धूल उछालेगा जैसे छोटी-छोटी बातों पर खेल-खेल में दोनों पक्षों में शर्त लग जाया करती थी। ऐसे खेलों में पांडव पक्ष, विशेष कर भीम ही अक्सर जीतते थे। कौरव सभी भाई बहुत शक्तिशाली थे लेकिन ताकत के खेल में वे भीम से हार जाते। कुश्ती, दौड़ लगाने, शिक्षा के अभ्यास आदि में भी भीम की बराबरी कई कौरव भाई मिल कर भी नहीं कर पाते थे। इन सब कारण से सभी कौरव भीम से विशेष रूप से ईर्ष्या करते थे। पर भीम में कोई ईर्ष्या नहीं थी बल्कि वे बाल स्वभाव के कारण अधिक ताकत दिखाते हुए उन्हें परेशान कर देते थे।
भीम को मारने की योजना
खेल-खेल में ही भीम के शक्ति को देख कर दुर्योधन आदि कौरव यह योजना बनाने लगे कि सबसे शक्तिशाली पांडव भाई भीम को कैसे धोखा से कैद कर दिया जाय। भीम के नहीं रहने से पांडवों की शक्ति अपने आप कम हो जाती। दुर्योधन का विचार था कि “जब भीम नगर के उद्यान में सो जाए तब उन्हें उठा कर गंगा नदी में फेंक दिया जाय। इसके बाद अर्जुन और युधिष्ठिर को बलपूर्वक कैद में डाल कर मैं अकेला ही सारी पृथ्वी का शासन करूंगा।”
दुर्योधन ने अपने भाई जनमेजय को गंगा तट पर प्रमाणकोटी नामक स्थान पर जल विहार के लिए एक विशाल गृह तैयार कराने के लिए आदेश दिया। उस गृह में सभी तरह के भोग सामग्रियों से भरे बहुत से कमरे थे। इस स्थान का नाम रखा गया था उदकक्रीड़न। चूंकि भीम को खानेपीने का बहुत शौक था इसलिए वहाँ अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का इंतजाम किया गया था।
भीम को विषैला भोजन खिलाना
भीम को मारने की सभी तैयारी पूरी करने के बाद दुर्योधन ने सभी पांडव भाइयों को जलविहार करने के लिए आमंत्रण दिया। षड्यंत्र से अनभिज्ञ पांडव इसके लिए राजी हो गए। सभी खुशी-खुशी उस उद्यान में प्रवेश कर गए। सभी भाई खेल-खेल में ही एक-दूसरे के मुंह में खाने पीने की चीजें देने लगे। इसी का फायदा उठा कर दुर्योधन ने कालकूट नामक विष भीम के भोजन में मिला दिया। विषैले भोजन को वह स्वयं बड़ी मीठी-मीठी बाते करते हुए भीम को परोसने लगा। उसने जितना भोजन भीम को परोसा था उन्होने सभी खा लिया।
संयुक्त जल विहार
भोजन के बाद कौरव और पांडव जल क्रीडा करने लगे। क्रीडा के बाद सभी थक गए थे। इसलिए उस रात को सभी ने उसी भवन में रुकने का निश्चय किया।
भीम को गंगा में धक्का दे देना
भीम विष के प्रभाव और अत्यधिक क्रीडा के कारण बहुत थक गए थे। वे प्रमाणकोटि के उस विशेष गृह में विश्राम करने चले गए। वह अचेत की तरह सो गए। इस स्थिति का फायदा उठा कर दुर्योधन ने लताओं से भीम को बांध कर गंगा के जल में धकेल दिया।
भीम का नागलोक पहुँचना
बेहोशी की हालत में भीम पानी के अंदर नागलोक में पहुँच गए। उनके शरीर से कई नाग दब गए। इससे क्रोधित होकर बहुत सारे नागों ने भीम डंस लिया। इतने साँपों के विष के कारण दुर्योधन द्वारा दिया गया कालकूट विष निष्प्रभावी हो गया।
विष निष्प्रभावी हो जाने के कारण भीम की चेतना लौट आई। उन्होने अपना बंधन खोल लिया और सांपों को पटक-पटक कर मारने लगे। वे सभी सांप भाग कर नागों के राजा वासुकि के समीप जाकर सब हाल कह सुनाया।
इस समय वासुकि के पास आर्यक भी थे। आर्यक कुंती के जैविक पिता शूरसेन के नाना था। जब उन्होने भीम को देखा तो पहचान गए। इसके बाद नागों ने भीम का बहुत स्वागत किया। वासुकि ने उन्हें वहाँ के आठ कुंडों का विशेष रस पीने के लिए दिया। इन रसों के कारण उनमें विशेष शक्ति आ गई। आठ दिनों के बाद जब रस पच गया तब भीम उठ बैठे। नागों ने उन्हें वस्त्र-आभूषणों से सजा कर और औषधियो से युक्त खीर खिला कर फिर नदी के तट पर रख दिया।
पांडवों और कुंती की भीम के लिए चिंता
इधर पांडवों को भीम कहीं नहीं दिखे। यह सोच कर कि शायद वह पहले ही हस्तिनापुर चले गए हो उनके बिना ही वे राजधानी के लिए चले गए। घर जाकर जब उन्हे पता चला कि भीम वहाँ भी नहीं पहुंचे तब उन सब को चिंता होने लगी। इधर कौरव अंदर-ही-अंदर खुश हो रहे थे।
लेकिन आठ दिनों के बाद भीम वापस आ गए। पांडवों ने इस घटना के बारे में कुछ नहीं कहा। क्रोधित दुर्योधन ने भीम के सारथी को गला घोंट कर मार डाला। पर विदुर के सलाह पर पांडव फिर चुप रह गए।
पुनः विष देना
कौरवों ने फिर से पहले से भी अधिक शक्तिशाली विष भीम के खाने में मिला दिया। कौरवों का सौतेले भाई युयुत्सु, जो पांडव से सहानुभूति रखते था, ने यह बात भीम को बता दिया। लेकिन फिर भी भीम ने उस भोजन को खा लिया। पर नाग लोक के औषधियों के कारण विष का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

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