ब्राह्मणों से भोजन की याचना
एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम अन्य ग्वालबालों के साथ गाय चराते हुए दूर निकल गए। ग्रीष्म ऋतु थी। सूर्य की किरणें प्रखर हो रही थी लेकिन घने वृक्ष उनपर छाया कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों से इन वृक्षों की महिमा और उनके द्वारा किए गए उपकार के बारे में बातें की। बातें करते हुए वे लोग यमुना तट पर पहुँचे। यमुनाजी का शीतल और स्वच्छ जल उन्होने स्वयं भी पीया और अपने गायों को भी पिलाया। गायें यमुनाजी के तट पर चरने लगी।
श्रीकृष्ण के मित्र स्तोक कृष्ण, अंशु, श्रीदामा, सुबल, अर्जुन, विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ, वरुथप इत्यादि उनके साथ थे। इन ग्वालबालों ने श्रीकृष्ण और श्रीबलराम से निवेदन किया कि वे उनके लिए कुछ खाने का इंतजाम करे क्योंकि वे भूखे थे। श्रीकृष्ण इसी बहाने मथुरा की अपनी भक्त ब्राह्मण पत्नियों पर अनुग्रह करना चाहते थे।
श्रीकृष्ण ने अपने मित्रों से कहा कि यहाँ से थोड़ी दूरी पर ही वेदपाठी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से अंगिरस नामक यज्ञ कर रहे है। तुमलोग वहाँ जाओ और हम दोनों भाइयों का नाम लेकर भोजन सामग्री माँग लाओ।
ग्वालबालों ने वहाँ जाकर श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार ही ब्राह्मणों से भोजन की माँग की। लेकिन उन ब्राह्मणों ने उनपर ध्यान नहीं दिया। उन्होने हाँ या ना कुछ भी नहीं कहा। उन से निराश होकर वे ग्वालबाल लौट आए और श्रीकृष्ण को सारा वृतांत बताया।
ब्राह्मणों-पत्नियों से भोजन की याचना
श्रीकृष्ण ने इस बार उन्हें ब्राह्मण पत्नियों के पास जाकर उनसे भोजन सामग्री उसी तरह दोनों भाइयों के नाम से माँगने के लिए कहा। ग्वालबालों ने यही किया। इन ब्राह्मण पत्नियों ने श्रीकृष्ण की लीलाएँ सुनी थी और उनकी अभिलाषा उनके दर्शन की थी। जब उन्होने सुना कि श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ आए हुए हैं तो वे अत्यंत प्रसन्नता से उतावली हो गई और बर्तनों में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन लेकर अपने पति और पुत्रों द्वारा रोकने पर भी श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए निकाल पड़ीं।
ब्राह्मणों पत्नियों द्वारा स्वयं आकर कृष्ण और उनके मित्रों को भोजन देना
उन ब्राह्मण पत्नियों ने वहाँ जाकर देखा कि यमुना तट पर नए-नए कोंपलों से शोभायमान अशोक वन में श्रीकृष्ण और बलराम अन्य ग्वालबालों से घिरे हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। जिनके विषय में वे सुनती आ रहीं थी, वे श्रीकृष्ण उनके सामने थे।
वे एक हाथ अपने सखा के कंधे पर रखे हुए थे और दूसरे मे कमल का फूल नचा रहे थे। सांवले शरीर पर सुनहरा पीताम्बर, गले में वनमाला, मस्तक पर मोरपंख का मुकुट, अंगों में रंगीन धातुओं से की गई चित्रकारी और शरीर पर नए-नए कोंपलों के गुच्छे लटक रहे थे। उनका यह सिंगार उन्हे सुंदर नट की तरह का वेश दे रहा था।
उनके प्रेम से सरोबर ब्राह्मण पत्नियों ने उनका यह सुंदर रूप अपनी आँखों से देखा। इस रूप को वे अपने हृदय मे ले जाकर मन-ही-मन उनका आलिंगन करती रहीं।
कृष्ण द्वारा उनका अभिवादन और लौटने के लिए कहना
भगवान जानते थे कि ये सभी अपने पति-पुत्रों और बंधु-बंधवों के रोकने पर भी उनके दर्शन की लालसा में यहाँ आई है। श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत और अभिनन्दन किया।
फिर यह कह कर उन्हे घर लौट जाने के लिए कहा कि “अब तुमलोग मेरा दर्शन कर चुकीं। अब अपनी यज्ञशाला में लौट जाओ। तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं। वे तुम्हारे साथ मिलकर ही अपना यज्ञ पूरा कर सकेंगे।”
इस पर उन ब्राह्मण पत्नियों ने कहा कि श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसार में लौटना नहीं पड़ता है। आप अपनी वेद वाणी सत्य कीजिए। हम आपके चरणों में आ पड़ी है। हमें और किसी का सहारा नहीं है। इसीलिए हमें अब दूसरों की शरण में न जाना पड़े ऐसी व्यवस्था कीजिए।
श्रीकृष्ण ने कहा कि अब सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा क्योंकि तुम मेरी हो गई हो, मुझसे युक्त हो गई हो। तुम जाओ और अपना मन मुझ मे लगा दो। तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जाएगी।
ब्राह्मण पत्नियों का लौटना
भगवान के समझाने पर वे सब अपने यज्ञशाला मे लौट आईं। उनके पतियों ने उनपर दोष दृष्टि नहीं की और उनके साथ मिलकर यज्ञ पूरा किया।
एक ब्राह्मण पत्नी का कृष्ण में लीन होना
उन ब्राहमन पत्नियों में से एक को उसके पति ने बलपूर्वक रोक लिया था। उस ब्राह्मण पत्नी ने भगवान का जैसा रूप सुन रखा था उसका ध्यान किया और ध्यान में उनका आलिंगन करते हुए कर्म से बने इस शरीर का त्याग कर दिया और इस तरह दिव्य शरीर से भगवान का सानिध्य प्राप्त कर लिया।
ब्राह्मणों का भय
इधर ब्राह्मणों को जब ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं तो वे अत्यंत पछतावे के साथ अपनी निंदा करने लगे। उनके मन में भी कृष्ण-बलराम के दर्शन की अभिलाषा हुई लेकिन कंस के भय से वे जा नहीं सके।
लक्ष्मीपति भगवान को भोजन माँगने की आवश्यकता नहीं थी। उन्होने तो इन ब्राह्मण पत्नियों पर कृपा करने के लिए ही उनसे भोजन सामग्री मंगवाया था। श्रीकृष्ण ने उनके द्वारा लाए गए भोजन सामग्री में से पहले अपने मित्रों को भोजन कराया फिर स्वयं भी भोजन किया।

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