श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम माने जाते हैं। एक राजा के रूप में वे इतने सफल थे कि रामराज्य आने वाले समय में राजाओं के लिए एक आदर्श बन गया। उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उनके साथ एक बड़े प्राणी समूह ने जल समाधि ले ली थी। वे उनके बिना जीवित नहीं रहना चाहते थे।
लेकिन व्यक्तिगत जीवन में उन्हें अनेक मानसिक कष्ट सहना पड़ा था। जैसे उन्हें अपनी निर्दोष पत्नी को न चाहते हुए भी निर्वासित करना पड़ा वैसे ही एक समय ऐसा आया जब उन्हें अपने प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण को भी निर्वासित करना पड़ा। हालाँकि अपने वचन की रक्षा के लिए उन्हें यह जानते हुए भी ऐसा करना पड़ा कि लक्ष्मण निर्दोष थे।
लक्ष्मण ने ऐसा क्या अपराध कर दिया जिसके कारण उन्हें निर्वासन का दण्ड देना पड़ा। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इस तरह है।
काल का राम से मिलने के लिए आना
एक दिन एक तपस्वी राम से मिलने आया। इस समय राम अपने राजभवन में थे। उन्होंने मिलने के लिए तपस्वी को अंदर आने की अनुमति दे दी। उस तपस्वी ने यह शर्त रखी कि वह एकांत में राम से कुछ बात करना चाहता था। इसलिए वह नहीं चाहता था कि जब तक दोनों के बीच वार्तालाप चले जब कोई भी उस कक्ष के अंदर न आए। अगर कोई ऐसा करे, यानि तपस्वी के रहते उस कक्ष में प्रवेश करे तो राम उसे मृत्यु दण्ड दे।
राम ने उस तपस्वी की शर्त मान ली। इस समय लक्ष्मण भी उनके पास ही थे। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वे कक्ष के द्वारा पर पहरा देते हुए खड़े हो जाए ताकि कोई अंदर नहीं आ सके। लक्ष्मण ने ऐसा ही किया।
दुर्वासा ऋषि का राम से मिलने के लिए आना
उपरोक्त शर्त के अधीन जब राम और वह तपस्वी, जो कि वास्तव में काल था, में बातें चल रही थे, उसी समय ऋषि दुर्वासा आ गए। दुर्वासा राम से तत्काल मिलना चाहते थे। लक्ष्मण ने उन्हें विनम्रतापूर्वक प्रतीक्षा करने के लिए कहा। पर इस पर दुर्वासा क्रोधित हो गए। उन्होंने लक्ष्मण से तुरंत अंदर जाकर राम को उनके आगमन की सूचना देने के लिए कहा। ऐसा नहीं करने पर लक्ष्मण, राम, भरत, उनकी सन्तति और राज्य को शाप दे देने धमकी दी।
दुर्वसा के ये वचन सुनकर लक्ष्मण सोच में पड़ गए। बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने अंदर जाकर राम को दुर्वासा ऋषि के आगमन की सूचना देने का निश्चय किया। क्योंकि अगर वे जाकर सूचना देते तो शर्त के अनुसार उन्हें मृत्यु दण्ड मिलता। लेकिन अगर वे नहीं जाते तो दुर्वासा के शाप के कारण और भी बहुत-से लोगों को कष्ट उठाना पड़ता।
लक्ष्मण ने राम को अंदर जाकर ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना दी। इस समय राम और तपस्वी वेशधारी काल की वार्तालाप समाप्त हो चुकी थी। लेकिन काल अभी भी अंदर ही था। वह जाने के लिए राम से अनुमति लेता, इससे पूर्व ही लक्ष्मण जी वहाँ आ गए।
काल को विदा कर राम ऋषि दुर्वासा से मिले। दुर्वासा के जाने के बाद उन्हें काल को दिए गए अपने वचन की चिंता हुई। वचन के अनुसार वे लक्ष्मण को मृत्युदंड देने के लिए बाध्य थे। लेकिन अपने निर्दोष और प्रिय छोटे भाई को मृत्युदण्ड देना बहुत ही कष्टप्रद था।
लक्ष्मण को मृत्युदण्ड देने पर राम की दुविधा
उनकी दुविधा को देख कर लक्ष्मण ने स्वयं उन्हें मृत्युदण्ड देकर अपना वचन पूरा करने के सुझाव दिया। लेकिन राम ने ऐसा करने के बजाय इस विषय पर सलाह देने के लिए सभा बुलाया। इस सभा में सभी मंत्री और पुरोहित शामिल थे।
लक्ष्मण को मृत्युदण्ड पर में विचार-विमर्श
सभा में राम ने सारा वृतांत कहने के बाद उन सबसे सलाह माँगा। समस्त प्रसंग को सुनकर सभा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। कोई भी निर्णय लेना कठिन था। भाई के प्रेम में अपने वचन तोड़ना धर्म के प्रतिकूल होता। लेकिन एक निर्दोष राजकुमार लक्ष्मण को मृत्यु दण्ड देना भी उचित नहीं लग रहा था।
कुलगुरु वशिष्ठ की सलाह पर मृत्युदण्ड के बदले परित्याग का निर्णय
सभा में कोई भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। तब कुलगुरु वशिष्ठ ने राम को सांत्वना देते हुए कहा कि यह जो कुछ हो रहा था, वह पूर्वनिर्धारित था। वे तपबल से सब जानते थे। उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्मण को दण्ड केवल एक घटना नहीं बल्कि एक बहुत ही भयंकर घटनाक्रम का आरंभ होगा जिसमें एक विशाल प्राणी समूह अपने प्राणों का त्याग करेंगे। पर इसके लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि यह अटल था।
(ऐसी भविष्यवाणी दुर्वासा ने दशरथ जी से उसी समय कर दिया था जब राम-लक्ष्मण बालक ही थे। इस भविष्यवाणी के विषय में सुमंत्र ने लक्ष्मण को तब बताया था जब वे सीता को निर्वासित कर वाल्मीकि आश्रम के आसपास छोड़ने गए थे। इसलिए लक्ष्मण इसके लिए मानसिक रूप से तैयार थे।)
गुरु वशिष्ठ की यह भविष्यवाणी सुनकर सभा और भी स्तब्ध रह गई। कोई कुछ बोल नहीं पाया। तब वशिष्ठ ने पुनः कहा कि धर्म रक्षा सर्वोपरि है। लक्ष्मण को मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए। लेकिन शास्त्र कहते हैं कि साधू पुरुष के लिए उसका परित्याग ही उसके लिए मृत्यु के समान होता है। इसलिए राम को अपने भाई लक्ष्मण का परित्याग कर देना चाहिए।
राम द्वारा लक्ष्मण का परित्याग
गुरु के इस सलाह को मानते हुए राम ने कहा “लक्ष्मण! मैं तुम्हारा परित्याग करता हूँ, जिससे धर्म का लोप न हो। साधु पुरुषों का त्याग किया जाय अथवा वध– दोनों समान ही हैं।”
राम की तरह लक्ष्मण को भी अपने बड़े भाई से बहुत प्रेम था। वे राम के बिना नहीं जीना चाहते थे। राम के वचन सुनकर उनकी आँखें भर आई। लेकिन उन्होंने इस आज्ञा का पालन करते हुए सभी को प्रणाम किया और सभा से निकल गए।
लक्ष्मण का सशरीर स्वर्ग गमन
लक्ष्मण सभा से निकल कर सीधे अयोध्या नगर के बाहर सरयू नदी के तट पर गए। वहाँ जाने से पहले वे अपने महल में अपने परिवार से मिलने भी नहीं गए थे। सरयू के किनारे जाकर उन्होंने जल से आचमन किया और देह त्याग करने के आशय से साँस रोक कर योग की अवस्था में बैठ गए।
लक्ष्मण विष्णु के ही चौथे अंश से उत्पन्न हुए थे। उनके अवतार लेने का उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। राम आदि अन्य तीनों भाई भी अब अपने धाम जाने का मन बना चुके थे। राम ने स्वयं काल को यह बताया था। इसलिए लक्ष्मण भी धरती से जाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होकर बैठे थे।
यह देख कर सभी देवता वहाँ आ गए। उन्होंने लक्ष्मण पर स्वर्ग के फूलों की वर्षा किया। इन्द्र उन्हें तब तक अपने पास स्वर्ग में रखना चाहते थे, जब तक कि राम आदि तीनों भाई अपने धाम के लिए प्रस्थान न कर जाए। क्योंकि ये चारों ही भाई एक ही विष्णु के अलग-अलग अंश थे। अतः देखते-देखते अचानक लक्ष्मण का शरीर अंतर्धान् हो गया।
इस तरह लक्ष्मण सशरीर स्वर्ग चले गए। जब राम, भरत और शत्रुघ्न ने एकाकार होकर पृथ्वीलोक छोड़ कर अपने धाम के लिए प्रस्थान किया। तब लक्ष्मण भी उनमें विलीन हो गए और चारों अंश अपने में समेट कर अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में राम ने अपने धाम में प्रवेश किया।
