राम का वनगमन- part 17

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राम के वनगमन की तैयारी

पिता के वचन की मर्यादा रखने के लिए राम ने वन जाने का निश्चय कर लिया। उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण उनके बिना घर में रहने के लिए तैयार नहीं हुए। अंततः राम को उन्हे भी साथ चलने के लिए अनुमति देनी पड़ी।

राम उसी दिन वन के लिए निकलना चाहते थे। राम, लक्ष्मण और सीता– ये तीनों रानी कैकेयी के महल से पैदल ही राजकीय चिन्हों के बिना वापस आए थे। यद्यपि महल में आते समय उन्होने ये चिह्न धारण कर रखा था। रास्ते में जो लोग उन्हे इस तरह जाते देखते थे, वे इस घटनाक्रम से खिन्न और शोकातुर हो जाते थे। सभी अपना-अपना मत दे रहे थे। लेकिन कोई भी राम को वन जाने नहीं देना चाहता था। राम जब सभी समुचित व्यवस्था करने और इष्ट-मित्रों एवं सगे-संबंधियों से विदा लेकर माता कैकेयी और पिता दशरथ से विदा लेने दुबारा उनके महल में आए। तब तक वहाँ अंतःपुर की अन्य स्त्रियाँ और गुरुजन आदि भी पहुँच गए थे। उन सब से रानी कैकेयी को राम को रोक लेने के लिए बहुत समझाया। कटु वचन भी बोले। उसने रानी को उनकी माता का उलाहना भी दिया लेकिन वह अडिग रही।

इस समय तक महल के बाहर भी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। राज्याभिषेक के बदले राम के निर्वासन की खबर अयोध्या में फैलने लगी। जो लोग बड़े उत्साह से अपने प्रिय राजकुमार का राज्याभिषेक देखने के लिए आए थे, वे सब विषाद में डूब गए।

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इधर रानी कैकेयी के महल में दशरथ जी को शोक और मानसिक आघात से बार-बार मूर्च्छा आ रहा था। राम ने उन्हे बहुत तरह से समझाया। उनके द्वारा खजाना और सेना साथ ले जाने के प्रस्ताव को राम ने अस्वीकार कर दिया। यहीं राम, सीता और लक्ष्मण ने राजसी वस्त्र त्याग कर वल्कल वस्त्र पहने।

राजा दशरथ का शोक

जब तीनों में से कोई भी रुकने के लिए तैयार नहीं हुए तब शोकातुर होकर राजा ने उनसे कम-से-कम एक दिन और रुक जाने का आग्रह किया और कल चले जाने के लिए कहा। पर राम कैकेयी को दिए अपने वचन के कारण आज ही जाना चाहते थे। तब मंत्री ने भी समझाया कि राम तपस्वी जीवन तो आज ही शुरू कर चुके है, अगर आज ही निकल जाएँगे तो चौदह वर्ष की गिनती आज से ही शुरू हो जाएगी। अन्यथा एक दिन और बढ़ जाएगा।

तब तक कौशल्या, सुमित्रा आदि अन्य लोग भी वहाँ आ गए। कौशल्या ने सीता को उपदेश दिया। सब से विदा लेकर और सबको प्रणाम कर, पिता की प्रदक्षिणा कर राम, लक्ष्मण और सीता रथ में चढ़ गए।

राम, लक्ष्मण और सीता का वन के लिए विदा होना

सुमंत्र ने रथ हांक दिया। लेकिन राम के पुरजन और परिजन रोते हुए रथ के पीछे-पीछे चलने लगे। कुछ लोग रथ पर लटक गए। ऐसे में रथ चलाना कठिन हो गया। लोग धीरे-धीरे रथ चलाने के लिए कहने लगे ताकि वे लोग राम का मुख देख सके।

इधर राजा दशरथ भी यह कहते हुए महल से बाहर आ गए कि “मै अपने प्यारे पुत्र राम को देखूंगा।” उनके साथ कौशल्या, सुमित्रा आदि अन्य स्त्रियाँ भी महल से बाहर आ गईं। सब रोते हुए रथ के पीछे चल पड़े।

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राम ने पीछे मुड़ कर अपने पिता-माता को अपने पीछे आते देखा। उनकी हालत असह्य हो रही थी। अतः उन्होने जल्दी रथ चलाने के लिए कहा। लेकिन रथ पर लोगों के लटके होने और अन्य अनेक लोगों के रथ के चारों ओर होने के कारण सुमंत्र ऐसा नहीं कर सके।

सुमंत्र ने पीछे से आने वाले लोगों से आज्ञा लेकर रथ की गति बढ़ा दिया। कुछ लोग रुक गए लेकिन अन्य बहुत से लोग रथ के पीछे दौड़ते गए।

राम-लक्ष्मण-सीता के अयोध्या से जाने के बाद उनके माता-पिता

राजा और रानियाँ तब तक उन्हे देखते रहे जब तक रथ के जाने से उड़ती हुई धूल भी उन्हे दिखती रही। जब धूल भी दिखनी बंद हो गई तब अचानक राजा रोने लगे और वही जमीन पर गिर गए। दुख से उन्होने वहीं कैकेयी का त्याग करने और अपने मरने के बाद भी जलांजलि देने का अधिकार नहीं होने के लिए कहा। उन्होने यह भी कहा कि अगर उनके पुत्र भरत भी माँ से सहमत हो तो वे राजा के मरने के बाद भी उनका कोई क्रियाकर्म न करें।

इस प्रकार अनेक विलाप करने के बाद राजा कैकेयी के महल में न जाकर कौशल्या के महल में गए। वे दुख के कारण इतने अशक्त हो गए थे कि वे स्वयं नहीं जा सके, सेवकों ने उन्हे वहाँ पहुँचाया। सुमित्रा भी कौशल्या के महल में ही आ गईं। वे तीनों एक-दूसरे को कभी ढांढस बंधाते कभी विलाप करते। इसी तरह वह रात्री बीती।

प्रजाजनों का राम के साथ जाने की जिद और राम द्वारा उन्हें सोते छोड़ कर जाना

इधर राम, लक्ष्मण, सीता साथ आए लोगों को बार-बार नगर लौट जाने के लिए कहते हुए तमसा नदी के किनारे पहुँच गए। नगर के वृद्ध ब्राह्मण, जो उनके साथ वहाँ तक आ गए थे, ने फिर उन्हे लौट चलने के लिए समझाया। शाम हो गई थी। सब लोग थके हुए थे, इसलिए राम ने वहीं तमसा किनारे वह रात्री यानि वनवास की प्रथम रात्री बिताने का निश्चय किया।

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जब सब सो गए तो राम के आदेशानुसार सुमंत्र ने रथ को कुछ दूर चलाने के बाद विपरीत दिशा में घुमा कर इस प्रकार चलाया ताकि पीछे से आने वाले प्रजा जनों को रथ के पहियों के निशान से उसके जाने के मार्ग का पता नहीं लग सके।

प्रजाजनों का अयोध्या लौटना

जैसा कि राम ने सोचा था, सुबह प्रजाजन जब उठे तो किसी को वहाँ नहीं पाकर रथ के निशान देखते हुए उसके पीछे कुछ दूर तक गए लेकिन आगे रास्ता नहीं मिलने पर निराश होकर रोते हुए दुखी होकर अयोध्या लौट आए।

उनलोगों को राम के बिना अकेले लौटे देख कर नगर के लोग भी विलाप करने लगे। समस्त अयोध्या में उस दिन न तो किसी घर में भोजन बना, न ही किसी ने कोई कार्य किया। कोई दुकान भी नहीं खुला। राम के बिना किसी का किसी कार्य में मन नहीं लग रहा था। समस्त नगर में उदासी छाई हुई थी।

वनगमन के लिए राम की अयोध्यापुरी से आगे की यात्रा

इधर अगले दिन राम वेदश्रुति, गोमती और स्यंदिका नदियों को पार करते हुए कोसल जनपद की सीमा तक पहुँच गए। उस समय देश के लिए ‘जनपद’ शब्द प्रयुक्त होता था। अयोध्या कोसल जनपद की राजधानी थी।

कोसल जनपद की सीमा पार कर उन्होने अयोध्यापुरी को प्रणाम कर वनवास की आज्ञा माँगी। कुछ प्रजाजन यहाँ भी उनके साथ आ गए थे। उन सब को भी राम ने विदा किया। सभी दुखी मन से रोते हुए वहाँ से विदा हुए।  

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