मेघनाद के क्षणिक जीत से राक्षसों का मनोबल फिर बढ़ गया था। इधर घायल और मरे हुए राम सेना के जीवित और स्वस्थ होने से उनका मनोबल भी बढ़ गया था। सामान्यतः रात में युद्ध नहीं होता था लेकिन ये नियम तो राक्षस सेना पहले दिन से ही तोड़ चुकी थी। अब युद्ध दिन रात थोड़े-थोड़े विराम के बाद हो रहा था। जो युद्ध के लिए नहीं आया हो उस पर प्रहार करना नियम के विरुद्ध था और राम स्वयं भी इसके पक्ष में नहीं थे। लेकिन जब राक्षस जीत खुशी मनाते हुए नगर में चले गए थे तब सुग्रीव ने सोचा नगर में जाकर उन्हें राम सेना की शक्ति का दर्शन करा दिया जाय। पर वे लोग किसी निर्दोष नागरिक पर प्रहार नहीं करना चाहते थे। उनके नगर आक्रमण का उद्देश्य केवल शत्रु सेना का मनोबल तोड़ना था।
सुग्रीव द्वारा लंका नगर पर आक्रमण
फिर से नया जीवन पाकर वानर सेना में नया उत्साह आ गया। अभी तक रावण के भाई, पुत्र और बड़े-बड़े सेनापतियों की मृत्यु हो चुकी थी। अधिकांश सेना का भी संहार हो चुका था। इसलिए लंका नगर की सुरक्षा अधिक नहीं था। राम, लक्ष्मण, सुग्रीव आदि को मरा समझ कर मेघनाद नगर मे जा चुका था। इसलिए सुग्रीव ने अब लंका नगर पर हमला करने का विचार किया।
सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार सूर्यास्त होने पर प्रदोष काल में शीघ्रगामी और महाबली वानरों की एक सैन्य टुकड़ी ने हाथों में मशाल लेकर किले के द्वारों को पार कर लंका नगर पर आक्रमण कर दिया। उनके अचानक आक्रमण से द्वार रक्षक भाग खड़े हुए। वानर सैन्य दल तेजी से आगे बढ़ा और मशालों से नगर में आग लगाने लगा।
लंका नगर का जलना
शीघ्र ही समस्त नगर जलने लगा। हाथी, घोड़ों आदि के स्वामियों ने उन्हे जलने से बचाने के लिए खोल दिया। वे सभी इधर-उधर भागने लगे। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में आग लग गई। लंका की प्रतिछवि समुद्र के जल में पड़ रही थी। यह अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहा था।
दूर से जलता हुआ समस्त नगर पलाश के फूल की तरह लग रहा था। (हनुमान जी ने लंका में दिन के समय आग लगाया था, इसलिए ऐसी प्रतिछवि उस समय नहीं दिखी थी।)
समस्त नगर में कोलाहल मच गया। जलते हुए नगर में वानर सैनिक घोर गर्जना करते हुए घूम रहे थे। कहीं से उन्हे कोई कठोर प्रतिरोध नहीं मिल रहा था।
राक्षसों में घबड़ाहट
नगर जल रहा था। इधर रणभूमि में खड़े राम ने अपनी धनुष से घोर टंकार किया। वानरों के गर्जन, राक्षसों के चित्कार और राम के धनुष की टंकार- ये सब मिल कर एक अद्भुत ध्वनि उत्पन्न कर रहे थे। समस्त राक्षसों में भय छा गया। राम ने अपने बाणों से लंका के नगर द्वार को तोड़ डाला और ऊँचे-ऊँचे भवनों को निशाना बनाया।
राक्षसों के लिए यह रात्रि कालरात्रि बन गई। वे सब अपने-अपने कवच और अस्त्र आदि लेकर जल्दी से युद्ध करने के लिए बाहर आ गए। वानर वीर भी अपने-अपने हाथों में जलती मशाल ले कर अपने निकटवर्ती द्वारों पर आ डटे।
रात्री में भयंकर युद्ध शुरू होना
क्रोधित रावण ने कुंभकर्ण के दो पुत्रों कुंभ और निकुंभ को बहुत से राक्षसों के साथ युद्ध के लिए भेजा। इस तरह रात में ही भयंकर युद्ध शुरू हो गया। (भारतीय संस्कृति में युद्ध के भी कुछ नियम थे। रात्री में आक्रमण करना अधर्मसम्मत माना जाता था। लेकिन रात्री में राक्षसों की शक्ति बढ़ जाती थी। इसलिए वे शक्तिशाली शत्रुओं से रात्री में ही युद्ध करते थे। इसलिए राम-रावण युद्ध दिन और रात्री दोनों में हुआ था।)
रात्रि युद्ध में भी राक्षस सेना की पराजय
राक्षस सेना को वानर सेना ने चारों ओर से घेर लिया। इस भयंकर युद्ध में अंगद ने कंपन और प्रजाङ्ग्घ को, द्विविद ने शोणिताक्ष को, मैंद ने युपाक्ष को और सुग्रीव ने कुंभ को मार डाला। हनुमान ने निकुंभ को मारा।
इस तरह विशाल सेना लेकर आए सभी सेनापति मारे गए। जो राक्षस सैनिक बचे थे वे डर कर भागने लगे। अब रावण ने खर (जिसे राम ने पंचवटी में मारा था) के पुत्र मकराक्ष को भेजा। वह भी राम के हाथों मारा गया।
इस घोर युद्ध में राक्षसों के पराजय के बाद फिर युद्ध में थोड़ा विराम आया।

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