धृतराष्ट्र की संताने एवं कौरवों का जन्म-part 8

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धृतराष्ट्र की गांधारी से एक सौ पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। कुरु वंश का होने के कारण ये सौ पुत्र कौरव कहलाए। धृतराष्ट्र ने गांधारी के अतिरिक्त एक वैश्य जाति की कन्या से भी विवाह किया था। इस विवाह से युयुत्सु नामक एक पुत्र हुआ था। लेकिन उसकी गिनती कौरवों में नहीं होती है। महाभारत के युद्ध में सभी सौ कौरव मारे गए थे लेकिन युयुत्सु धृतराष्ट्र का एकमात्र पुत्र था जो जीवित रह गया था।      

कौरवों का जन्म

एक बार महर्षि व्यास धृतराष्ट्र के यहाँ आए। गांधारी के आतिथ्य से प्रसन्न होकर उन्होने वर देने की इच्छा जताया। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलशाली सौ पुत्रों का वरदान माँगा। महर्षि ने यह वरदान दे दिया। समय आने पर गांधारी ने गर्भ धारण किया। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रसव नहीं हुआ। इसी बीच कुंती ने एक पुत्र को जन्म दिया। अब गांधारी का धैर्य जाता रहा। उन्होने अनजाने में ही अपने गर्भ पर आघात किया। इससे उनके गर्भ से एक मांस का पिण्ड प्रकट हुआ जो लोहे के समान कड़ा था।

यद्यपि उन्होने उस पिण्ड को अपने गर्भ में दो वर्षों से धारण किया था लेकिन उसे इतना कड़ा देख कर ममता त्याग कर उसे फेंकने का विचार किया। यह बात जब महर्षि व्यास को पता चली तो वह वहाँ आए। महर्षि के आदेश के अनुसार गांधारी ने सौ मटके (कुंड) तैयार करवाया और सब को घी से भरवाया। उनके कथनानुसार उस मांस पिण्ड को ठंढे जल से सींचा। जल से सींचते ही वह पिण्ड अंगूठे के पोर के बराबर के सौ टुकड़ों में बंट गया। इन सब को उस कुंड में रख कर बंद कर ढँक दिया गया। एक गुप्त स्थान में रख कर उनकी सुरक्षा का पूरा प्रबंध कर दिया गया।

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गांधारी को अब इस में कोई संदेह नहीं रहा कि महर्षि की कृपा से उन्हें सौ पुत्र होंगे। लेकिन मन में एक लालसा उत्पन्न हुई कि इन्हें एक पुत्री भी हो। लेकिन मांस पिंडों की गिनती उन्होने स्वयं की थी जो कि पूरे सौ थे। इसलिए इन से पुत्री की प्राप्ति कठिन थी। उन्होने यह इच्छा महर्षि को बताया तो महर्षि ने बचे मांस के भाग को उसी तरह के एक कुंड में रख देने के लिए बोला जिससे पुत्री होती। इस तरह उस मांस पिण्ड से कुल एक सौ एक बच्चे होते। आवश्यक निर्देश देने के बाद महर्षि व्यास हिमालय में तपस्या करने चले गए।

महर्षि व्यास के निर्देशानुसार दो वर्षों के बाद उन कुंडों का ढ़क्कन उसी क्रम में हटाया गया जिस क्रम में उन्हे स्थापित किया गया था। कुंडों के ढ़क्कन हटाने के बाद उनमें शिशु पाए गए। सबसे पहले जिस शिशु को कुंड से निकाला गया उसका नाम आगे चल कर दुर्योधन रखा गया। वह धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में सबसे बड़ा था। इसके बाद एक-एक कर निन्यानवे शिशु और निकले।   

दुर्योधन का जन्म     

जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ उसी दिन कुंती के दूसरे पुत्र भीम का भी जन्म हुआ। कौरवों में सबसे बड़ा दुर्योधन था लेकिन उम्र के अनुसार कुंती के पुत्र युधिष्ठिर से वह दो वर्ष का छोटा और भीम के बराबर था।

दुर्योधन जन्म लेते ही गदहे के रेंकने की सी आवाज में रोने लगा। उसकी आवाज सुनकर दूसरे गदहे भी रेकने लगे। गीध, गीदड़ और कौए भी कोलाहल करने लगे। बड़े ज़ोर की आँधी चलने लगी।

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इन सब लक्षणों को देख कर धृतराष्ट्र भयभीत हो उठे। उन्होने भीष्म, विदुर तथा अन्य कुरु वंशियों और ब्राह्मणों को बुला कर पूछा कि युधिष्ठिर सबसे बड़े और योग्य होने के कारण राजा बनने के सर्वथा योग्य थे। युधिष्ठिर के बाद दुर्योधन ही सबसे बड़ा था। क्या यह भी राजा बन सकेगा?

धृतराष्ट्र की ये बाते समाप्त होते ही अपशकुन होने लगे। इस सब पर विचार कर ब्राह्मण गण और विदुर जी बोले “राजन! आपके बड़े पुत्र के जन्म लेने पर जिस प्रकार के भयंकर अपशकुन हो रहे हैं, उससे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुल का संहार करने वाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नों की शांति हो जाएगी। आपके निन्यानवे पुत्र रहें। आप अगर अपने कुल की शांति चाहते हैं तो इस एक पुत्र का त्याग कर दे।”

विदुर जी ने नीति वचन कहा “नीति कहती है कि समूचे कुल के हित के लिए एक व्यक्ति को त्याग दें, गाँव के हित के लिए एक कुल का त्याग कर दें, देश के हित के लिए गाँव का परित्याग कर दें और आत्मा के कल्याण के लिए सारे भूमंडल का त्याग कर दें।” किंतु विदुर और अन्य ब्राह्मणों के कहने पर भी धृतराष्ट्र पुत्र स्नेह के कारण ऐसा नहीं कर सके। उनके सभी सौ पुत्रों का लालन-पालन राजकुमारों की तरह होने लगा।

पुत्री का जन्म

जिस दिन दुर्योधन आदि सौ पुत्रों का जन्म हुआ था उसके एक महिने के अंदर ही गांधारी ने एक पुत्री  को भी जन्म दिया। भाइयों की तरह इसका जन्म भी कुंड से हुआ था। इस पुत्री का नाम दुःशला रखा गया।

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युयुत्सु का जन्म  

जिन दिनों गांधारी गर्भ से थी। उन्हीं दिनों अपनी सेवा में लगी एक वैश्य जाति की स्त्री से धृतराष्ट्र ने विवाह कर लिया था। उस सेविका से धृतराष्ट्र को एक पुत्र हुआ। उसका नाम युयुत्सु रखा गया। युयुत्सु का एक नाम करण भी था। वह बहुत ही बुद्धिमान था।

इस तरह धृतराष्ट्र के सौ पुत्र जो, कि कौरव कहलाते थे, के अतिरिक्त एक पुत्र एवं एक पुत्री और हुए।

धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के नाम 

धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों (कौरवों) के नाम इस प्रकार थे:

  • दुर्योधन
  • दुःशासन
  • दुस्सह
  • दुश्शल
  • जलसंध
  • सम
  • सह
  • विन्द
  • अनुविन्द
  • दुर्धर्ष
  • सुबाहु
  • दुष्प्रधर्षण
  • दुंघर्षण
  • दुर्मुख
  • दूषकर्ण
  • कर्ण
  • विविंशति
  • विकर्ण
  • शाल
  • सत्त्व
  • सुलोचन
  • चित्र
  • उपचित्र
  • चित्राक्ष
  • चारुचित्रशरासन (चित्रचाप)
  • दुर्मद
  • दुर्विगाह
  • विवित्सु
  • विकटानन (विकट)
  • ऊर्णनाम
  • सुनाम (पद्मनाभ)
  • नन्द
  • उपनन्द
  • चित्रवाण (चित्रबाहु)
  • चित्रवर्मा
  • सुवर्मा 
  • दुर्वरोचन
  • अयोबाहु
  • महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद)
  • चित्रकुंडल (सुकुण्डल)
  • भीमवेग
  • भीमबल
  • बलाकी
  • बलवर्धन (विक्रम)
  • उग्रायुध
  • सुषेण
  • कुंडोदर
  • महोदर
  • चित्रायुध (दृढ़युद्ध)
  • निषंगी
  • पाशी
  • वृदारक
  • दृढ़वर्म
  • दृढ़क्षत्र
  • सोमकिर्ति
  • अनूदर
  • दृढ़संध
  • जरासंध
  • सत्यसंध
  • सदहसुवाक (सहस्त्रवाक)
  • उग्रश्रवा
  • उग्रसेन
  • सेनानी (सेनापति)
  • दुष्पराजय
  • अपराजित
  • पंडितक
  • विशालाक्ष
  • दुराधर (दुराधन)
  • दृढ़हस्त
  • सुहस्त
  • वातवेग
  • सुवर्चा
  • आदित्यकेतु
  • बहलाशि
  • नागदत्त
  • अग्रयायी (अनुयाई)
  • कवची
  • युयुत्सु
  • क्रथन
  • दण्डी
  • दण्डधार
  • धनुग्रर्ह
  • उग्र
  • भीमरथ
  • वीरबाहु
  • अलोलुप
  • अभय
  • रौद्रकर्मा
  • दृथरथाश्रय (दृथरथ)
  • अनाधृष्य
  • कुंडभेदी
  • विरावी
  • प्रमथ
  • प्रमाथी
  • दीर्घरोमा (दीर्घलोचान)
  • दीर्घबाहु
  • महाबाहु व्युढोरु
  • कनकध्वज (कनकांगद)
  • कुंडाशी (कुंडज)
  • विरजा 

ये सभी 100 भाई अतिरथी शूरवीर और युद्ध विद्या में पारंगत थे। बड़े होने पर इन सभी का विवाह हुआ। इनकी एकलौती बहन दुःशला का विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ।

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