राम चारों भाइयों की मृत्यु क्यों नहीं हुई थी?-भाग 74

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भगवान राम, उनके तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न– ये चारों शरीर के साथ ही अपने धाम गए थे। इसलिए इनके लिए मृत्यु शब्द का उपयोग सही नहीं है। इतना ही नहीं कृष्ण अवतार में भी कृष्ण सशरीर ही गए थे। इन पाँचों का मृत शरीर धरती पर नहीं मिला था। सीता पहले ही शरीर के साथ ही भूमि में समाई थी।

भागवत में इस का कारण बताते हुए कहा गया है कि भगवान का पार्थिव शरीर मनुष्य रूप में होने पर भी अलौकिक होता है। वह भगवान की मूर्ति की तरह ही होता है, जिस के लिए भक्त भक्ति करते हैं। इसलिए भागवत मूर्ति होने के कारण उन्हें जलाया नहीं जाना चाहिए। अगर शरीर छोड़ कर जाते हो उनके मृत शरीर को जलाना पड़ता। भगवान राम के तीनों भाई भी भगवान के ही विभिन्न अंशों से उत्पन्न हुए थे। इसलिए ये सब अपने शरीर के साथ ही गए थे।   

लेकिन अपने धाम वापस जाने के लिए मनुष्य लीला करते हुए कोई बहाना चाहिए। इसलिए राम ने सरयू के जल में समाधि ली। लेकिन इस समाधि से उनकी मृत्यु नहीं हुई अर्थात उनका शरीर निष्प्राण नहीं हुआ। यह पूरा प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इस तरह है:

लक्ष्मण का स्वर्ग गमन

अपने वचन का पालन करने के लिए राम को लक्ष्मण को मृत्युदण्ड देना था। कुलगुरु वशिष्ठ के सलाह से उन्हें मृत्यु के बदले निर्वासन का दण्ड देकर परित्याग करना पड़ा। लक्ष्मण भाई के बिना जीवित नहीं रहना चाहते थे।

अतः वे सरयू के तट पर समाधि लगा कर बैठ गए। वहीं से इन्द्र उन्हें सशरीर स्वर्ग ले गए। इस समस्त घटनाक्रम का आरंभ हुआ था काल के राम से मिलकर उन्हें अपने धाम लौटने की प्रार्थना से। अब राम भी अपनी लीलाओं का अंत कर अपने धाम लौटने का मन बना चुके थे। 

कुश और लव का राज्याभिषेक

भाई के बिना अब राम भी पृथ्वी पर नहीं रहना चाहते थे। अतः उन्होंने उसी दिन भरत को राजपद देकर “लक्ष्मण का अनुसरण” करने की घोषणा की। लेकिन भरत भी राम के साथ ही जाना चाहते थे। इसलिए उनके अनुरोध पर राम ने उसी दिन अपने दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक क्रमशः दक्षिण कोशल और उत्तर कोशल जनपद के राजा के रूप में कर उन्हें उनकी राजधानी के लिए विदा कर दिया।   

भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव और अन्य बहुत से लोगों का राम से साथ जलसमाधि का दृढ़ निश्चय

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राम ने अपने धाम लौटने की घोषणा आकस्मिक रूप से ही लक्ष्मण के जाने के बाद किया था। फिर भी यह समाचार बहुत तेजी से फैला। ऋषि-मुनि आदि उनके दर्शन के लिए आने लगे। भरत और शत्रुघ्न तो पहले ही तैयार हो गए थे। राज कर्मचारी, अयोध्या के आम लोग आदि भी बड़ी संख्या में राम के साथ ही “जहाँ वह जाएँ… नदी में, या समुद्र में, या कहीं और” जाने का निश्चय कर चुके थे।

अंगद को राजगद्दी देकर सुग्रीव भी बहुत-से वानर और रीछों के साथ पहुँच गए। विभीषण भी राक्षसों के साथ आ पहुँचे। लेकिन विभीषण और हनुमान सहित पाँच लोगों के राम जी ने जीवित रहने का आदेश दिया। पर बाकी लोग जब समझाने पर भी नहीं माने तब उन्हें अपने साथ जाने की अनुमति दे दी। 

देखते-ही-देखते एक विशाल जन समूह अपनी इच्छा से राम के साथ अपने प्राणों का त्याग करने के लिए तैयार होकर अयोध्या में राजमहल के आसपास बैठ गए। 

वह सारी रात उस सब ने बिल्कुल शांत और प्रसन्न मुद्रा में व्यतीत किया। उन्हें मृत्यु का दुख नहीं बल्कि राम के साथ उनका दर्शन करते हुए मृत्यु की प्रसन्नता थी।

राम द्वारा जलसमाधि के लिए तैयारी

सुबह होने पर राम ने महाप्रयाण की तैयारी शुरू की। उन्होने पुरोहित को आज्ञा दिया “मेरे अग्निहोत्र की प्रज्वलित आग ब्राह्मणों के साथ आगे-आगे चले। महाप्रयाण के पथ पर इस यात्रा के समय मेरे वाजपेय यज्ञ का सुंदर छत्र भी चलना चाहिए।”

कुलगुरु वसिष्ठ ने राम का आदेश मिलने पर महाप्रयाण के लिए शास्त्रों द्वारा निर्धारित समस्त धार्मिक क्रियाओं का विधिपूर्वक अनुष्ठान किया।

राम का सरयू तट के लिए प्रस्थान

सभी तैयारी हो जाने के बाद राम सूक्ष्म वस्त्र धारण कर दोनों हाथों में कुश लेकर वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए सरयू नदी के तट पर चले।

इस समय राम के दाहिनी तरफ श्रीदेवी और बाईं तरफ भूदेवी विराजमान थी। उनके आगे-आगे उनकी संहारक शक्ति चल रही थी। समस्त दैवी शक्तियाँ, दिव्य अस्त्र-शस्त्र, वेद आदि पुरुष वेश में उनके साथ चल रहे थे।

अन्य अनेक लोगों का राम का अनुगमन करना

यद्यपि सभी अन्य लोगों ने राम के साथ अपने शरीर का त्याग करने के लिए उनसे अनुमति पहले ही ले लिया था और इसी प्रतीक्षा में वहाँ बैठे थे। लेकिन राम ने प्रस्थान करते समय उन्हें चलने के लिए नहीं कहा। बिना किसी से कुछ बोले मंत्र पाठ करते हुए वे पैदल ही सरयू तट की ओर चल पड़े।

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उनके पीछे अपने आप पहले भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव आदि, उनके पीछे अंतःपुर की स्त्रियाँ, उनके पीछे कर्मचारी गण, फिर नगर के लोग आदि चलने लगे। जो भी इस समूह को सरयू की तरफ बढ़ते हुए देखता वह भी अपने आप इसके साथ हो जाता था। इस प्रकार राम के पीछे प्राणियों का एक विशाल समुदाय चल पड़ा।

लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि किसी के मुख पर दुख, भय या दीनता का कोई चिह्न नहीं था। सभी प्रसन्नचित्त होकर वेदपाठ करते हुए राम के पीछे चले जा रहे थे। पाठ और पदचाप के अतिरिक्त न तो कोई ध्वनि थी और न ही कोई क्रिया।

सरयू तट पर राम के साथ विशाल जन समुदाय का जलसमाधि के लिए एकत्र होना

अयोध्या से डेढ़ योजन दूर सरयू के दर्शन हुए। राम प्रजाजनों के साथ सरयू के एक स्थान पर आए। इसी समय ब्रह्मा समस्त देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं और ऋषि-मुनियों के साथ उस स्थान पर आए। उनके साथ करोड़ो दिव्य विमान थे। सुखदायिनी हवा चलने लगी। देवता स्वर्ग के दिव्य फूलों की वर्षा करने लगे। वाद्य यंत्र बजने लगे। वे सब राम के दर्शन और उनका स्वागत करने आए थे। 

राम का सरयू में प्रवेश और विष्णु रूप में स्थित होना

राम ने जब सरयू जल में प्रवेश के लिए अपने पैर बढ़ाए। तभी ब्रह्मा उनके समक्ष आए और उनके (विष्णु के) अपने लोक में उनका स्वागत करते हुए उन्हें अपनी इच्छानुसार किसी भी रूप में अपने लोक में प्रवेश करने के लिए कहा।

ब्रह्मा की बात सुनकर राम अपने विष्णु रूप में प्रकट हो गए। राम, भरत और शत्रुघ्न तीनों ही शरीर के साथ ही विष्णु में समा गए। फिर वे विष्णु स्वरूप होकर सरयू जल के ऊपर स्थित हो गए। यह अद्भुत दृश्य देख कर देवता आए और विष्णु रूप भगवान राम की पूजा की।

राम द्वारा ब्रह्मा से अपने साथ आए सभी प्राणियों को उत्तम लोक देने के लिए कहना 

उन सब की पूजा स्वीकार करने के बाद विष्णुरूप राम ने ब्रह्मा से अपने साथ आए समस्त प्राणियों को उत्तम लोक प्रदान करने के लिए। ब्रह्मा ने इसे स्वीकार करते हुए कहा कि उनके साथ आए हुए सभी प्राणी चाहे वे मनुष्य हो या पशु-पक्षी, चाहे दृश्य हो या अदृश्य– संतानक लोक में जाएँगे। (संतानक लोक विष्णु के परम धाम साकेत का ही एक भाग है और उस के पास ही है)।

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ब्रहमा ने यह भी कहा कि सुग्रीव आदि जो वानर, रीछ आदि देवताओं के अंश थे, वे सब अपने-अपने मूल देव में प्रवेश हो जाएँगे।

विष्णु रूपी राम का साकेत धाम जाना

यह सुनकर विष्णु रूप राम सबके देखते-देखते अपने लोक (साकेत) को चले गए। लक्ष्मण जो अभी तक स्वर्ग में इन्द्र के पास थे, वे भी आए और अपने विष्णु रूप में समा गए। जैसा कि ब्रह्मा ने उस समय कहा था जब सीता रसातल प्रवेश की थी, उनके स्वागत के लिए महालक्ष्मी रूपा सीता जी पहले से ही वहाँ थीं।

असंख्य प्राणियों का जलसमाधि द्वारा मोक्ष

राम-ब्रह्मा का यह संवाद सुनकर राम के साथ आए हुए लोग बहुत प्रसन्न हुए। उन सबने प्रसन्नता के साथ राम का स्मरण करते हुए सरयू नदी में डुबकी लगाया। ऐसा करते ही वे सब अपना पार्थिव शरीर छोड़ कर दिव्य शरीर से आकाश स्थित विमान में जा बैठे। पशु-पक्षियों ने भी ऐसा ही किया।

सुग्रीव अपने पिता के सूर्य मंडल में प्रविष्ट हो गए। अन्य वानर भी सब के देखते-देखते अपने पिता के स्वरूप मे मिल गए। उस समय जो कोई भी प्राणी वहाँ आ गए सब ने अपने शरीर को सरयू जल में डाल कर परम धाम संतानक को प्राप्त किया।

सरयू के जल में शरीर जाते ही उन सब की आत्मा निकल कर अपने स्थान को चली जाती थी। इसलिए मृत्यु के समय होने वाला कष्ट किसी को नहीं होता था।

इतने सारे लोगों का एक साथ जलसमाधि द्वारा देहत्याग (आत्महत्या) एक महा विनाश का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। लेकिन इस महा विनाश में किसी को कोई पीड़ा नहीं थी, बल्कि आनंद था।   

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