मधुराष्टकम (हिन्दी अर्थ सहित)

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कहा जाता है कि एक बार सावन के शुक्ल पक्ष के एकादशी को आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण वल्लभाचार्य के सामने प्रकट हुए। तब आचार्य ने उनकी स्तुति में मधुराष्टकम की रचना की थी।

मधुराष्टक, जिसे संस्कृत में मधुराष्टकम कहते हैं, दो शब्दों से मिल कर बना है– मधुर और अष्टकम यानि आठ का समूह। मधुर का आशय होता है, मीठा यानि माधुर्य लिए हुए। अष्टक संस्कृत काव्य की एक ऐसी विधा है, जिसमें आठ श्लोक या छंद में अपने भावों को कविता रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। रुद्रष्टाक्म, मधुराष्टकम, राधाष्टकम आदि अनेक स्तोत्र अष्टक के रूप में लिखे गए हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह होती हैं कि इन्हें बहुत अच्छे से मधुर धुनों में लयबद्ध रूप में गाया जा सकता  है।

मधुराष्टक भी इसी शैली में संस्कृत में लिखा गया स्तोत्र यानि प्रार्थना गीत है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप के स्वरूप और भाव-भंगिमा के माधुर्य को याद किया गया है।

मधुराष्टक की रचना प्रमुख भक्ति संत वल्ल्भाचार्य जी ने किया था। वल्लभाचार्य का जन्म पन्द्रहवीं शताब्दी में एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे भक्त होने के साथ-साथ बहुत विद्वान दार्शनिक भी थे। उन्होने भक्ति के पुष्टिमार्ग की स्थापना की थी। इसके अनुसार बिन शर्त भक्ति, प्रेम और सेवा से ही भगवान को पाया जा सकता है। उन्होने अनेक पुस्तकों की रचना की थी।

आचार्य वल्लभ ने मधुराष्टम में भगवान के नाम और रूप के माधुर्य का वर्णन और स्मरण कर उनके प्रति अपना प्रेम प्रकट किया है। ऐसा माना जाता है कि जो कोई इस स्तुति का पाठ या गायन करता है, उनकी तरह ही वह भी भगवान का प्रिय हो जाता है। 

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अब देखते हैं मधुराष्टक के आठ श्लोक कौन से हैं और उनके अर्थ क्या हैं?

आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है। 1

आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है। 2

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आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं , आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है।3

आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपके तिलक मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है। 4

आपके कार्य मधुर हैं, आपका आचरण मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्रेम करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है।

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आपका गुंजन मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है। 6

आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है, आप उनके साथ मधुर हैं, आप उनके बिना मधुर हैं, आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है। 7

आपके गोप मधुर हैं, आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विनाश करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के अधिपति (हे श्रीकृष्ण!) आपका सब कुछ मधुर है।

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