श्रीकृष्ण ने शापवश अजगर बने सुदर्शन यक्ष को अपने चरण स्पर्श से मुक्ति दिलाया था। भागवत में यह कथा इस प्रकार है:
श्रीकृष्ण द्वारा सुदर्शन यक्ष का उद्धार
एक बार शिवरात्रि के अवसर पर नन्द जी और अन्य गोप अंबिका वन गए। वहाँ उन्होने सरस्वती नदी में स्नान किया और भगवान शंकर एवं देवी अंबिका की पूजा की और ब्राह्मणों को दान दिया। सभी गोपों का उस दिन उपवास था। इसलिए रात को जल पीकर वे वहीं सरस्वती नदी के तट पर सो गए।
उस वन में एक बहुत बड़ा अजगर रहता था। वह उस दिन भूखा था। संयोगवश वह उस दिन उधर ही आ निकला। उसने सोये हुए नंदजी को पकड़ लिया। उन्होने अपनी जान बचाने के लिए श्रीकृष्ण को पुकारा। सभी गोप भी जग गए और यथासंभव उन्हें उस अजगर से छुड़ाने का प्रयास किया लेकिन असफल रहे।
इतने में वहाँ श्रीकृष्ण आ पहुँचे। उन्होने अपने पैर से अजगर को छू दिया। उनके पैरों का स्पर्श पाते ही वह अजगर इस शरीर को छोड़ कर एक सुंदर विद्याधर पुरुष के रूप में प्रकट हो गया।
वह विद्याधर श्रीकृष्ण को प्रणाम कर हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। भगवान के पूछने पर उसने अपने शाप की कथा सुनाया।
सुदर्शन यक्ष के शाप की कथा
वह अजगर सुदर्शन नमक विद्याधर था। वह जितना सुंदर था उतना ही धनी। एक दिन जब वह अपने विमान पर चढ़ कर घूम रहा था तो उसने अंगिरा गोत्र के कुरूप ऋषियों को देखा। विद्याधर सुदर्शन ने अपने सौन्दर्य के अभिमान में उन ऋषियों का मज़ाक उड़ाया। इससे क्रोधित होकर ऋषियों ने उसे अजगर हो जाने का शाप दे दिया।
उस विद्याधर ने ऋषियों के इस शाप को अपने लिए परम कल्याणकारी माना क्योंकि उसी के कारण उसे भगवान के चरणकमलों का स्पर्श प्राप्त हुआ जिससे उसके सभी अशुभ कर्मों का नाश हो गया। उसने श्रीकृष्ण की स्तुति की और उनकी परिक्रमा कर उनसे आज्ञा लेकर अपने लोक को चला गया।
इस समस्त घटनाक्रम को देख कर ब्रजवासी बड़े विस्मित हुए। अपने व्रत और पूजन को सम्पन्न कर बड़े प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण की लीला का गान करते हुए वे ब्रज में लौट आए।

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