राम द्वारा राक्षसवध का आरंभ हुआ राक्षसराज रावण की बहन शूर्पनखा के द्वारा राम-लक्ष्मण के प्रति प्रणय निवेदन से। शूर्पनखा को लक्ष्मण ने नाक, कान काट कर कुरूप और घायल कर दिया।
शूर्पनखा प्रसंग संबंधी विवाद
इस प्रसंग में राम-लक्ष्मण की आलोचना दो कारणों से की जाती है। पहला, कुछ लोग मानते हैं कि उसने राम और लक्ष्मण से विवाह का प्रस्ताव रखा था। केवल इस अपराध के लिए इतना बड़ा दण्ड उचित नहीं था। इस संबंध में दूसरी आलोचना तुलसीदास के रामचरितमानस के आधार पर की जाती है। इसमें एक चौपाई का वाक्यांश है “अहइ कुमार मोर लघु भ्राता”, जो कि राम ने लक्ष्मण के विषय में शूर्पनखा से कहा है। कुछ लोगों के अनुसार लक्ष्मण जी कुवांरे नहीं शादीशुदा थे। इसलिए मर्यादा पुरुषोतम माने जाने वाले राम द्वारा मजाक में ही सही, लेकिन झूठ बोला गया। लेकिन यह आलोचना अधूरी जानकारी के कारण की जाती है।
वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का विस्तृत वर्णन है। यह वर्णन इस प्रकार है:
पंचवटी में रहते हुए शरद ऋतु बीत गई। हेमंत ऋतु आ गया। एक दिन राम स्नान करने गोदावरि तट पर गए। पीछे-पीछे लक्ष्मण घड़ा लेकर पानी भरने गए। सीता भी उनके साथ थी। वे तीनों मौसम, अपने परिवार, भाई भरत आदि की बाते करते हुए स्नान कर कुटी पर आए। कुछ अन्य कार्य करके दोनों भाई साथ बैठ कर बातें करने लगे।
शूर्पनखा का राम के कुटी में आगमन
उसी समय रावण की बहन राक्षसी शूर्पणखा वहाँ आ गई। वह राम के रूप पर मोहित होकर एक सुंदर स्त्री का वेश बना कर उनके पास गई। उसने राम का परिचय, प्रयोजन आदि पूछना शुरू किया। राम ने सरलता से सबका उत्तर दे दिया। साथ ही उसका परिचय पूछते हुए आशंका जाहिर किया कि वह उन्हे इच्छानुसार वेश धारण करने वाली कोई राक्षसी प्रतीत होती थी।
शूर्पणखा ने इसे स्वीकार करते हुए अपना, अपने भाईयों और पिता का नाम बताया। अपनी शक्ति का बखान करते हुए उसने राम को सीता को छोड़ कर अपना पति बनने का प्रस्ताव दिया।
इस बात पर हँसते हुए राम ने उसे टालने के लिए कहा कि वे विवाहित हैं और उनके साथ उनकी पत्नी है।
लेकिन उनके छोटे भाई की पत्नी साथ नहीं है, इसलिए वे उनसे पूछ सकती है। लक्ष्मण ने भी अपने को राम का दास बता कर उसे टाल दिया। दोनों भाई मजाक में उसे एक-दूसरे पर टाल रहे थे, लेकिन वह इस मजाक को सच मान लेती थी।
शूर्पनखा द्वारा सीता पर हमला
शूर्पनखा को सीता ही अपने प्रणय में बाधक लगने लगी। अतः अचानक वह उन पर झपट पड़ी। लेकिन राम उससे अधिक फुर्ती दिखाते हुए बीच में आ गए। उनके हुंकार से शूर्पणखा रुक गई।
क्रोधित होकर राम ने कहा “क्रूर कर्म करने वाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास भी नहीं करना चाहिए। देखो न, सीता के प्राण बड़ी मुश्किल से बचे है। इस राक्षसी को किसी अंग से हीन कर देना चाहिए।”
लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के नाक-कान काटना
इस पर क्रुद्ध लक्ष्मण ने तलवार निकाल कर उसके नाक कान काट लिए। नाक-कान काटे जाने के बाद खून बहाती हुई अपने वास्तविक रूप, जो कि कुरूप राक्षसी का था, में आकर वह ज़ोर से रोते हुए जंगल में भाग गई।
घटनाक्रम के इस संक्षिप्त विवरण के बाद अब हम फिर आते हैं, इस संबंध में की जाने वाली आलोचनाओं पर।
शूर्पनखा का व्यवहार और राम-लक्ष्मण की प्रतिक्रिया
वाल्मीकि रामायण राम के संबंध में पहला और इसलिए मौलिक ग्रंथ माना जाता है। इसके अनुसार जिस समय शूर्पनखा राम के आश्रम में आई थी, तीनों लोग आराम से आपस में बातें कर रहे थे। शूर्पनखा एक सुंदर स्त्री का वेश बना कर आ गई। उसने राम का परिचय, प्रयोजन आदि पूछना शुरू किया। राम ने सरलता से सबका उत्तर दे दिया। साथ ही उसका परिचय पूछते हुए आशंका जाहिर किया कि वह उन्हे इच्छानुसार वेश धारण करने वाली कोई राक्षसी प्रतीत होती थी। फिर भी उन्होने उसके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया।
शूर्पनखा ने राम से विवाह का प्रस्ताव रखा। अगर हम उन्हें भगवान नहीं भी माने तो एक सामान्य पुरुष की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है अगर वह पत्नी और भाई से साथ अपने घर में बैठा हो। और कोई अनजान स्त्री अचानक से आकर उसे विवाह का प्रस्ताव दे दे तो? इस बात के लिए वह उसे मार नहीं डालेगा। राम ने भी उसकी बातों को अधिक गंभीरता से नहीं लिया और मजाक में बोले कि वे विवाहित हैं, उनकी पत्नी साथ है। हाँ, उनके छोटे भाई अकेले हैं (अकेले कहा था, कुंवारे नहीं।) उनकी पत्नी साथ नहीं थी, उनसे पूछ कर देख सकती थी।
शूर्पनखा उनके इस परिहास को समझ नहीं सकी और सच में लक्ष्मण को विवाह का प्रस्ताव दे डाला। लक्ष्मण ने भी अपने को राम का सेवक बताते हुए उसका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
दोनों भाई उसकी बातों को अनसुना करके आपस में बातें कर रहे थे और उसे टालने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन शूर्पनखा बारी-बारी से दोनों भाइयों के समक्ष प्रस्ताव रख रही थी। यहाँ तक कि उसने सीता को कुरूप, बूढ़ी, बड़े पेट वाली इत्यादि कह कर अपने को उससे सुंदर कह कर भी स्वीकृति लेने का प्रयास किया। लेकिन सीता के इस बुराई को भी दोनों भाइयों ने मजाक में ही लिया।
जब दोनों भाइयों ने शूर्पनखा के प्रस्ताव को स्वीकार करने की बात तो क्या गंभीरता से भी नहीं लिया। तो अचानक ही वह क्रोधित हो कर सीता को मार डालने के लिए उनपर झपट पड़ी। हमला अचानक था, लेकिन फिर भी राम अधिक फुर्तीले निकले। वे तेजी से सीता के आगे आ गए और शूर्पनखा को रोक दिया।
शूर्पनखा को दंड
अभी तक राम लक्ष्मण दोनों ने ही शूर्पनखा से कोई कठोरता नहीं की थी। लेकिन जब उसने बिना किसी अपराध के सीता को मार डालने के लिए उस पर हमला किया तब राम को क्रोध आ गया। उन्होनें लक्ष्मण से कहा “इस राक्षसी को किसी अंग से हीन कर देना चाहिए।” तब लक्ष्मण ने तलवार से शूर्पनखा के नाक और कान काट दिए।
स्पष्टतः लक्ष्मण ने शूर्पनखा को घायल विवाह का प्रस्ताव देने के लिए नहीं बल्कि बिना किसी कारण के सीता की हत्या करने के प्रयास के लिए किया था। दूसरा यह क्रोध के आवेश में अचानक किया गया कार्य नहीं था। बल्कि राम ने सीता को बचा लेने के बाद उनसे शूर्पनखा को दंडित करने लिए किसी अंग से हीन करने के लिए कहा।
चूँकि शास्त्रों के अनुसार स्त्री का वध वर्जित था। लेकिन अगर कोई स्त्री ऐसा कोई कार्य करे जिसके लिए मृत्यु दण्ड निर्धारित था तो इस स्थिति में नाक-कान काट कर उसे जीवित छोड़ देना उस समय के न्याय शास्त्र में मान्य दंड था।

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