लगभग ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करने के बाद राम ने देखा कि उनके अवतार लेने का उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। अतः अब उन्हें अपने धाम लौट जाना चाहिए। देवता भी अब ऐसा ही मान रहे थे। इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें याद दिलाने के लिए काल को भेजा था।
लक्ष्मण के स्वर्ग जाने के बाद राम अब जल्दी-से-जल्दी पृथ्वी लोक से जाना चाहते थे। अतः उन्होंने उसी दिन ‘लक्ष्मण के रास्ते का अनुसरण’ करने की घोषणा की। राम की ये बातें सुनकर लोग समझ गए कि अब वे अपनी लीलाओं का अंत कर अपने धाम जाने का मन बना चुके थे।
भरत का राम के साथ जाने का निश्चय
राम ने पहले भरत को राजगद्दी देकर जाने का विचार प्रकट किया था क्योंकि वे ही युवराज थे। लेकिन भरत उनके साथ ही जाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बड़े राजकुमार कुश को राजगद्दी देने का सुझाव दिया। भरत ने अपने सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न को इस महाप्रयाण की सूचना देने के लिए शीघ्रगामी दूत शूरसेन जनपद भेज दिया।
प्रजाजन का राम के साथ ही प्राण त्याग करने का निश्चय
राम ने जिस समय अपना निर्णय बताया, उस समय बहुत-से प्रजाजन उनके पास बैठे थे। राम की बात सुनकर वे शोक मग्न होकर वहीं धरती पर बैठ गए। वे अपने प्रिय राम के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे। भरत ने भी जब राम के साथ ही धरती से जाने का निश्चय किया तब वे लोग और भी विह्वल हो गए।
लोगों को इस तरह अनाथ की तरह धरती पर बैठ देख कर कुलगुरु वशिष्ठ ने राम से कहा कि उन्हें अपने प्रजाजनों का मन रखना चाहिए। इस पर राम ने उनलोगों को उठाया और पूछा कि वे उनके लिए क्या कर सकते थे। समस्त प्रजाजन ने एक साथ यही विनती की कि “आप जहाँ भी जाएँगे, आपके पीछे-पीछे हम भी वहीं चलेंगे।” उनलोगों ने अपने परिवार सहित राम के ही रास्ते पर राम के ही साथ चलने की अनुमति मांगी, भले ही वे कहीं भी जाए “नदी में, समुद्र में … या कहीं और।”
राम ने प्रजाजनों को समझाकर रोकने का प्रयास किया। लेकिन अंततः उनकी दृढ़ भक्ति और उनके बिना जीवित नहीं रहने की प्रतिज्ञा के कारण उन्हें अनुमति देनी पड़ी।
शत्रुघ्न का इस महाप्रयाण में शामिल होना
इधर भरत द्वारा भेजा गया शीघ्रगामी दूत शूरसेन जनपद की राजधानी मधुरा पुरी पहुँचा। उसने शत्रुघ्न को अयोध्या के समस्त घटनाक्रम के विषय में बताया। उनके दोनों बड़े भाइयों के साथ ही बड़ी संख्या में उनके पुरजन और परिजन अपने प्राणों का अंत करने का निश्चय कर चुके थे। लक्ष्मण पहले ही धरती से जा चुके थे।
अतः शत्रुघ्न ने भी अपने दोनों भाइयों के साथ ही प्रयाण करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने राजपुरोहित कांचन और समस्त प्रजाजनों को बुलाकर समस्त समाचार कह सुनाया। अपने दोनों पुत्रों- सुबाहु और शत्रुघाती- का राज्याभिषेक कर वे अकेले ही रथ से अयोध्या के लिए शीघ्रता से विदा हो गए।
अयोध्या पहुँच कर उन्होंने भी राम से उनके साथ ही धरती से महाप्रयाण की अनुमति मांगी। उनका दृढ़ निश्चय देख कर राम को उन्हें भी अनुमति देनी पड़ी।
वानर और रीछ का राम के साथ महाप्रयाण में शामिल होना
लक्ष्मण को दण्ड, राम द्वारा धरती छोड़ कर अपने लोक जाने का निर्णय बहुत शीघ्रता से घटित हुआ। पर यह समाचार भी बहुत शीघ्रता से फैला। जो भी सुनता था, वह उनके दर्शन के लिए आने लगा। यह सूचना सुग्रीव और विभषण तक पहुँच गई।
अतः सुग्रीव के साथ बहुत बड़ी संख्या में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानर और रीछ भी आ गए। सुग्रीव भी उनके साथ ही प्राणों का त्याग करना चाहते थे। इसलिए वे भी युवराज अंगद का राज्याभिषेक कर अपने राज्य में सबसे अंतिम विदा लेकर आए थे।
सुग्रीव सहित उनके साथ आने वाले वानर और रीछ किसी-न-किसी देवता, गंधर्व या ऋषि कि संतान थे। वे ब्रह्मा के आदेश के अनुसार राम की सहायता और सेवा करने के लिए ही यह शरीर लेकर धरती पर आए थे। अतः राम के नहीं रहने पर धरती पर उनके लिए भी कोई कार्य शेष नहीं रह गया था। वे सब भी राम के साथ ही देहत्याग करना चाहते थे।
सुग्रीव और अन्य वानरों का दृढ़ निश्चय देख कर राम ने उन्हे भी आज्ञा दे दी।
लेकिन हनुमान, द्विविद, मैंद, जांबवान और विभीषण को “कलयुग के आने तक या प्रलय काल तक धरती पर जीवित रहने” का आदेश दिया।
इस प्रकार राम के साथ बहुत से लोग अपने प्राणों का त्याग करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो कर अयोध्या नगरी में एकत्र हो गए थे।
राम का सरयू तट जाना
अगली सुबह राम ने शास्त्रीय विधि का पालन करते हुए पैदल ही सरयू तट की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। वे वेद मंत्रों का पाठ करते हुए जा रहे थे।
राम के विदा होते ही भरत और शत्रुघ्न ने उनका अनुगमन किया। उन दोनों के पीछे अंतःपुर की स्त्रियाँ भी चल पड़ीं। ऋषि, मुनि और ब्राह्मणों ने देखा राम से साथ ब्रह्मलोक के द्वारा खुले हुए थे, तो वे भी साथ चल पड़े। मंत्री और सेवक भी अपने बंधु-बांधवों और पशुओं एवं पक्षियों के साथ चलने लगे। वानर, रीछ, राक्षस, अयोध्या के नर-नारी सभी राम का अनुगमन करते चले जा रहे थे।
जब ये सब इस तरह चलते हुए सरयू की तरफ बढ़ रहे थे, तो रास्ते में जो भी उन्हें देखता, वह भी साथ लग जाता था। इंसानों की कौन कहे पशु-पक्षी भी साथ होते जा रहे थे। समस्त अयोध्या नगर वीरान हो गया। सब राम के पीछे सरयू तट जा रहे थे। इस प्रकार एक विशाल सामूहिक जलसमाधि के लिए पृष्ठभूमि बन गई।

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