गोपियों की कृष्णभक्ति- part 20

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गोपियों की कृष्णभक्ति

गोपियों की कृष्णभक्ति कृष्ण के चरित का एक ऐसा पक्ष है जो महाभारत सहित अनेक युद्ध करने वाले महान योद्धा, रणनीतिकार, अजेय नारायणी सेना के संगठनकर्ता और गीता के रचनाकार श्रीकृष्ण के चरित के मधुर पक्ष को उजागर करता है। साथ ही कुछ लोग उनके चरित पर प्रश्न भी खड़े करते हैं।

गोपियों की कृष्णभक्ति: अनेक व्याख्याएँ

गोपियों की कृष्णभक्ति और उनके प्रति प्रेम की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। सगुण उपासक गोपियों को कृष्ण के भक्ति और प्रेम का प्रकट रूप मानते हैं। निर्गुण उपासक गोपियों को आत्मा और कृष्ण को परमात्मा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

साहित्य में इनके लिए गोपी शब्द आया है। गोपी गोप यानि ग्वाले का स्त्रीलिंग है। गोपी का तात्पर्य गोप कन्याओ और गोप पत्नियों से है। साहित्य में इन गोपियों में सबसे प्रमुख के रूप में राधा का निरूपण हुआ है। राध-कृष्ण की जोड़ी को मध्य काल के कवियों और लेखकों ने विशेष लोकप्रिय बना दिया। लेकिन भागवत में राधा या किसी अन्य विशेष प्रेमिका का नाम नहीं है न ही उनके किसी तरह के प्रेम प्रसंग का उल्लेख है।

भागवत में एक सामान्य वर्णन है जिससे पता चलता है कि सभी गोपियाँ कृष्ण से स्नेह करती थी। गोपकन्याएँ उन्हे पति रूप में पाना चाहतीं थीं। गोपियों के वस्त्र को चुराना और रास लीला– इन दो प्रसंगों के आधार पर उनकी प्रेमी और रसिक की छवि बनाई गई।

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यह भी ध्यातव्य है कि कृष्ण बाल्यकाल तक ही गोपियों के पास रहे थे। किशोरावस्था में वे मथुरा चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। इन गोपियों से उनकी दुबारा भेंट प्रौढ़ा अवस्था में तब हुई ब्रज और द्वारका, दोनों स्थानों के लोग सूर्य ग्रहण के स्नान के लिए एक तीर्थ में गए थे। इस समय तक कृष्ण द्वारका जा चुके थे और उनकी सभी शादियाँ हो चुकी थी। गोपियाँ उनकी पत्नियों से भी मिली थीं।

भागवत में गोपियों की कृष्णभक्ति का वर्णन

भागवत में गोपियों की कृष्णभक्ति और प्रेम का कई बार वर्णन है। लेकिन उपर्युक्त दो प्रसंगों के अतिरिक्त अन्य प्रसंग शुद्ध आत्मिक प्रेम के हैं। श्रीकृष्ण बलराम और ग्वाल बाल के साथ में गाय चराने जाते। वे अपनी वंशी पर मदुर तान छेड़ते। श्रीकृष्ण की वह मधुर बंसी भक्तों में भगवान के प्रति प्रेमभाव को और उनके मिलन की आकांक्षा को जगाने वाली थी। 

इस वंशी को सुनकर गोपियों का हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो गया। इन गोपियों में सभी उम्र की गोप पत्नियाँ और गोप कन्याएँ थीं। कुछ विवाहित और कुछ अविवाहित थीं।

गोपियाँ एकांत में अपनी सखियों से कृष्ण के रूप-गुण और उनके वंशी की ध्वनि के प्रभाव का वर्णन करने लगीं। ब्रज की गोपियों ने ध्वनि का वर्णन करना चाहा लेकिन वंशी का स्मरण होते ही कृष्ण का स्मरण हो आया और कृष्ण का स्मरण आते ही कृष्ण से मिलने की आकांक्षा और भी बढ़ गई। फिर मन-ही-मन वहाँ पहुँच गईं जहाँ कृष्ण थे।

इस आनंद में मग्न होने के कारण उनकी वाणी वर्णन करने में असमर्थ हो गई। गोपियां आपस में कृष्ण के संबंध में बातचीत करने लगतीं। उनका तरह-तरह से वर्णन करते-करते वे कृष्ण की लीलाओं और कृष्ण प्रेम में तन्मय हो जाती थी।

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दिन में जब कृष्णजी गाय चराने वन में चले जाते थे तब वह समय गोपियों के लिए बड़ा कठिन हो जाता था। वे मन-ही-मन उनका चिंतन करतीं रहती थीं और वाणी से उनकी लीलाओं का गान करतीं रहतीं थीं। गोपियाँ आपस में उनके बारे में ही बातें करतीं रहतीं थीं। इस तरह उनका मन श्रीकृष्ण में ही लगा रहता था। वे कृष्णमय हो गईं थीं।

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