लक्ष्मण के घायल होने और उनके उपचार के संबंध में कुछ विवादास्पद सवाल
तुलसीकृत रामचरित मानस और वाल्मीकिकृत रामायण में विवरणों के कई प्रसंग में अंतर है। रामचरितमानस और अन्य कई ग्रन्थों के आधार पर सामान्यतः माना जाता है कि मेघनाद से युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लगी थी। इससे वे बहुत घायल और बेहोश हो गए थे। हनुमान विभीषण के कहे अनुसार लंका के राजवैद्य सुषेण को ले आए। सुषेण के कहने पर ही वे संजीवनी बूटी लाने हिमालय के किसी पर्वत शिखर पर गए। पर उस विशेष औषधि को नहीं पहचान पाने के कारण वे पहाड़ की वह चोटी ही ले आए। इसी बूटी से सुषेण ने लक्ष्मण को ठीक किया था। लेकिन अन्य कई प्रसंगों की तरह रामचरित मानस एवं अन्य कई रामायण से वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का विवरण अलग प्रकार से मिलता है।
इस संबंध में मुख्य अंतर दो प्रश्नों पर है।
लक्ष्मण का उपचार करने वाले सुषेण कौन थे?
पहला अंतर वैद्य के विषय में है। समान्यतः उनका इलाज करने वाले वैद्य को लंका का राज वैद्य माना जाता है। लेकिन वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट बताया गया है कि वे सुषेण युवराज अंगद के नाना और वानर राज बाली की पत्नी तारा के पिता थे। वे एक योद्धा भी थे। वानर सेना में वे एक सेनापति की भूमिका भी निभा रहे थे। सेना की जो अग्रिम टुकड़ी लंका के किले पर अधिकार कर शत्रुओं पर नजर रख रही थी, उसके सेनापति सुषेण ही थे।
यह पूछने पर कि औषधियों की इतनी जानकारी उन्हें कैसे हुई, सुषेण ने बताया था कि देवताओं और असुरों के बीच होने वाले कुछ युद्धों में भी उन्होने भाग लिया था। उन्हीं युद्धों में देवता पक्ष के घायल सैनिकों की चिकित्सा के लिए इन औषधियों का प्रयोग किया जाता था। इन औषधियों का निर्माण स्वयं ब्रह्मा ने किया था।
वानर योद्धा सुषेण द्वारा एक से अधिक अवसरों पर अपने पक्ष के घायल योद्धाओं के इलाज का विवरण है। इससे स्पष्ट होता है कि सुषेण वानर सेना के योद्धा और चिकित्सक थे। संभवतः समान नाम होने से बाद के ग्रंथो में उन्हें लंका का राज वैद्य सुषेण माना जाने लगा।
किसने लक्ष्मण को घायल किया था?
दूसरा विवाद इस बात पर है कि लक्ष्मण को घायल किस ने किया था? वाल्मीकि रामायण के अनुसार चार बार वे गंभीर रूप से घायल हुए थे। सबसे पहले मेघनाद ने युद्ध में उन्हें और राम को नागपाश से घायल कर बांध दिया था। इस बार उन दोनों को विष्णु भगवान के वाहन गरुड़ ने मुक्त कर स्वस्थ किया था। गरुड़ को उनके घायल होने का समाचार देवताओं से मिला।
दूसरी बार रावण ने शक्ति प्रहार से उन्हें घायल किया था। अचेत लक्ष्मण को रावण ने जब उठाना चाहा तो वह उठा नहीं सका लेकिन भक्ति भाव से उठाने पर हनुमान ने उन्हें उठा लिया। इस बार वे बिना किसी विशेष उपचार के स्वयं ठीक हो गए।
तीसरी बार जब राम-लक्ष्मण सहित अनेक वानर सेनापति और सैनिक घायल हुए थे, तब सुषेण ने इन औषधियों के विषय में बताया था। हनुमान औषधियों वाला पहाड़ ले आए थे। उन औषधियों के गंध मात्र से घायल ही नहीं बल्कि मृत योद्धा भी जीवित और स्वस्थ हो गए। हनुमान फिर उस पहाड़ को वहीं रख आए जहां से लाए थे।
मेघनाद से युद्ध में भी लक्ष्मण और अनेक वानर योद्ध घायल हुए थे। इस बार भी सुषेण ने ही उन सबका इलाज किया था।
चौथी बार रावण से विभीषण की रक्षा करते हुए लक्ष्मण ने वह शक्ति अपनी छाती पर झेल लिया जो विभीषण को लक्ष्य कर रावण ने चलाया था। पहली शक्ति लगने पर वह घायल तो हुए लेकिन होश में रहे। लेकिन दूसरी शक्ति उनके छाती में गहरे घुस गयी जिससे वे अचेत हो गए। सुषेण के कहे अनुसार हनुमान औषधि युक्त पहाड़ की चोटी ले आए। जिससे लक्ष्मण का उपचार सुषेण ने किया।
वाल्मीकि रामायण में रावण के शक्ति प्रहार से विभीषण को बचाते हुए लक्ष्मण के घायल होने और उनके ठीक होने से संबन्धित प्रसंग इस तरह है:
लक्ष्मण का विभीषण की रक्षा करते हुए घायल होना
अपने सभी सेनापतियों के मारे जाने से क्रुद्ध रावण वानर सेना का भयंकर संहार करते हुए राम की ओर बढ़ा। इसी बीच लक्ष्मण ने रावण की ध्वजा और धनुष काट डाला तथा सारथी को भी मार डाला। विभीषण ने गदा से उसके घोड़ों को मार दिया। अब रावण रथ से कूद कर नीचे आ गया। उसने अपने भाई विभीषण को मारने के लिए एक प्रज्वलित शक्ति चलाया। उस शक्ति को रास्ते में ही काट कर लक्ष्मण ने विभीषण को बचा लिया।
रावण की इस पराजय से वानर दल में हर्षध्वनी हुई। क्रुद्ध होकर रावण उससे भी अधिक शक्तिशाली शक्ति फिर विभीषण पर छोड़ने के लिए उद्धत हुआ। लक्ष्मण उसका मन्तव्य समझ कर विभीषण के सामने आ गए और रावण पर बाणों की बौछार कर दी। रावण ने वह शक्ति लक्ष्मण पर ही छोड़ दिया।
यह शक्ति लक्ष्मण के हृदय में लगी। वे खून से लथपथ और अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े। भाई की यह स्थिति देख राम विषाद में डूब गए। पर शीघ्र ही समय की आवश्यकता देखते हुए, युद्ध करने लगे।
शक्ति लक्ष्मण के हृदय में गहरे तक ऐसे घुसा था कि वानर गण प्रयत्न कर भी उसे नहीं निकाल सके। राम ने अपने दोनों हाथों से उस शक्ति को लक्ष्मण के शरीर से निकाला और उसे तोड़ डाला।
राम-रावण युद्ध और घायल रावण का रणभूमि से पलायन
राम जब इसे निकाल रहे थे, तब भी रावण उन पर बाणों की वर्षा कर रहा था। लेकिन इसकी परवाह किए बिना राम ने लक्ष्मण को हृदय से लगाया। उन्होने वानर योद्धाओं से अचेत लक्ष्मण की सुरक्षा के लिए उन्हें घेर कर खड़े हो जाने के लिए कहा और स्वयं रावण से युद्ध के लिए तत्पर हो गए। रावण के वध की प्रतिज्ञा कर के वे खड़े हो गए।
राम क्रोधित, पर साथ ही सावधान, होकर अपने बाणों से रावण को घायल करने लगे। रावण ने भी कुछ देर समुचित प्रत्युत्तर दिया। लेकिन जब वह बहुत घायल हो गया तब रणभूमि से भाग गया।
लक्ष्मण का उपचार के लिए हनुमान द्वारा पर्वत शिखर उठा लाना
रावण के भागने के बाद राम जल्दी से भाई के पास आए। लक्ष्मण के घाव से अभी भी खून निकल रहा था। उनकी चेतना नहीं लौटी थी। उन्हे देख कर राम विषाद में डूब गए। उस समय सुषेण नामक वानर सेना का एक सेनापति, जो कि युद्ध में घायलों की चिकित्सा में काम आने वाले औषधियों के भी जानकार थे, भी वहीं थे। वे युवराज अंगद के नाना थे। राम को विलाप करते देख कर उन्होने उनसे कहा कि लक्ष्मण के शरीर में अभी भी प्राण हैं। इनका उपचार हो सकता है।
सुषेण ने किन औषधियों को लाने के लिए हनुमान से कहा?
सुषेण ने हनुमान से महोदय पर्वत (जिसका पता जांबवान पहले बता चुके थे) के दक्षिण शिखर पर उगे हुए चार महाऔषधि लाने के लिए कहा। इन औषधियों के नाम थे– विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी और संधानी।
विशल्यकरणी शरीर में धँसा हुआ बाण आदि निकाल कर पीड़ा दूर करता था। सावर्ण्यकरणी शरीर में पहले जैसी रंगत लाता था। संजीवकरणी मूर्च्छा को दूर कर चेतना लाता था। संधानी टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने में काम आता था)।
हनुमान जी द्वारा महोदय पर्वत लाना
सुषेण के ऐसा कहने पर हनुमान महोदय पर्वत (औषधि पर्वत) पर गए। लेकिन वे उन औषधियों को पहचान नहीं पाए। इतना समय भी नहीं था कि दुबारा इन औषधियों की पहचान पूछ कर आते। अतः हनुमान ने उस पर्वत के शिखर को, जहाँ सुषेण के बताने के अनुसार औषधियां होना चाहिए था, को उखाड़ लिया और लेकर वापस आ गए। हनुमान का यह कार्य देख कर वानर ही नहीं देवता भी विस्मित हुए।
लक्ष्मण का स्वस्थ होना
सुषेण ने आवश्यक औषधि लेकर उसे कूट कर लक्ष्मण के नाक में डाला। औषधि के प्रभाव से लक्ष्मण के शरीर से बाण निकल गए और घाव ठीक हो गए। वे सचेत हो गए।
लक्ष्मण की मूर्च्छा टूटते ही समस्त सेना में हर्ष छा गया। राम ने लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया। उन्होने लक्ष्मण के बिना युद्ध में जीत और अपने जीवन को भी निरर्थक बताया।
लक्ष्मण ने कहा कि राम विभीषण को लंका का राज्य देने की प्रतिज्ञा कर चुके थे। ऐसे भी विभीषण की रक्षा और लंका को जीतना- दोनों ही आवश्यक था। उन्होने शीघ्र-से-शीघ्र रावण को मार डालने के लिए राम से प्रार्थना किया।

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