क्या एक ही रात में 80 लोगों को मारने वाला संत हो सकता है? ऐसा हत्यारा संत इतनी आध्यात्मिक शक्ति कैसे हासिल कर सकता है कि वह इतिहास के सबसे पवित्र संतों में गिना जाने लगे? वह कैसे उस पर्वत पर चढ़ सका जिस पर ज्ञात इतिहास में कोई और नहीं चढ़ सका। वहाँ उसका क्या अनुभव रहा? इस तिब्बती संत का नाम था मिलारेपा। कैलाश पर्वत की तरह ही स्वयं उसका अपना जीवन भी रहस्य, रोमांच और साधना से भरा है। तो आज बात करते हैं कैलाश शिखर पर चढ़ने वाले एकमात्र व्यक्ति मिलारेपा की।
कौन थे मिलारेपा
यह तिब्बत के सबसे सम्मानित योगी और कवि थे। आरंभ में ये तांत्रिक थे लेकिन बाद में एक बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए। एक तांत्रिक और आध्यात्मिक योगी दोनों रूपों में बहुत ही सफल साधक थे। बौद्ध धर्म के कंग्यु संप्रदाय के वे सबसे प्रसिद्ध संत बने। इनका जीवन काल था 1052 ई से 1135 ई तक।
उनका आरंभिक जीवन
मिलारेपा शब्द का तिब्बती में उच्चारण मिला रस्पा भी होता है। मिला उनका कुल नाम था। उनके बचपन का नाम थोस्पा गाह भी मिलता है। मिलारेपा का जन्म तिब्बत के मंड्यूल गुडथड प्रांत के क्याडाचा नामक स्थान पर 1052 ई में हुआ था। इनके परिवार आर्थिक रुप से बहुत ही समृद्ध था। परिवार था भी छोटा सा। पिता, माँ और एक छोटी बहन। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन इस परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ तब टूट पड़ा जब उनके पिता की मृत्यु हो गई। इस समय मिलारेपा की आयु सात वर्ष और उनके बहन की लगभग तीन वर्ष थी। पिता को लगा कि ये छोटे बच्चे संपत्ति की अच्छे से देखभाल नहीं कर पाएंगे इसलिए उन्होने मरने से पहले एक विल बना दिया। इसके अनुसार उन्होने अपनी सारी संपत्ति अपने भाई और बहन को इस उम्मीद पर दे दिया कि वह उनके परिवार की अच्छे से देखभाल करेंगे और जब मिलारेपा जब 15 वर्ष के हो जाते तब उन्हें सारी संपत्ति लौटा देते।
क्यों उसने इतने लोगों की हत्या की?
मिलारेपा के पिता ने वसीयत अपने परिवार की भलाई के लिए बनाया था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पिता के मरते ही चाचा और बुआ मिलारेपा और उनकी माँ एवं बहन के साथ बहुत बुरा व्यवहार करने लगे। नौकरों की तरह उन सबसे काम करवाते पर खाना कुत्तों से भी बुरा देते थे। जब मिलारेपा बड़े हुए तब माँ ने चाचा और बुआ से अपनी संपत्ति मांगना शुरू किया। पर उन दोनों ने लौटाने से मना कर दिया और उन्हें और भी कष्ट देने लगे। माँ बेटे ने गाँव के लोगों से सहायता की गुहार की लेकिन किसी ने उनकी सहायता नहीं की। एक दिन जब माँ ने गाँव के बहुत से लोगों के सामने अपनी संपत्ति फिर से मांगा तब चाचा ने सबके सामने दोनों माँ बेटे को बुरी तरह पिता और उन्हें अपमानित किया। इतना कुछ होने के बावजूद गाँव के किसी ने उनकी सहायता नहीं की।
इस से क्रोधित और अपमानित होकर माँ ने मिलारेपा से कहा कि अगर वह चाचा से अपनी संपत्ति नहीं ले सकते तो कम से कम बदला ही ले ले। माँ ने यह धमकी भी दी कि अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो वह बेटी के साथ आत्महत्या कर लेगी।
अब मिलारेपा ने बदला लेने के निश्चय किया। लेकिन वह ऐसे बदला लेना चाहते थे जिससे उन्हें सामने नहीं आना पड़े ताकि राजकीय दंड से वह बच जाए। बहुत सोच समझ कर उन्होने तंत्र विद्या सीखने का निश्चय किया।
कड़ी मेहनत और साधना से मिलारेपा ने तंत्र विद्या सीखा। उन्होने प्रकृतिक शक्तियों पर बहुत हद तक तंत्र विद्या से नियंत्रण करना सीख लिया। इसके बाद उन्होने इस विद्या का उपयोग कर ओला वर्षा कर चाचा और चाची को मार डाला। इतना ही नहीं उनकी सारी फसल भी बर्बाद कर दिया।
लेकिन इसके बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्हें गुस्सा गाँव वालों पर भी था जिनहोने उनका साथ नहीं दिया था। एक बार उन्हें पता चला कि उनके चाचा के बेटे की शादी थी। इस शादी में गाँव के बहुत से लोग आने वाले थे। मिलारेपा ने इसी समारोह में कोई आपदा लाने के सोचा ताकि दूल्हा दुल्हन के साथ गाँव वाले भी मर जाए। उन्होने ऐसा ही किया। जब सभी लोग निश्चिंत होकर शादी के समारोह में खुशियाँ मना रहे थे तब उन्होने अपनी तंत्र विद्या का ऐसा प्रयोग किया कि विवाह स्थल पर अचानक से सांप, बिच्छू जैसे जहरीले जीव प्रकट होने लगे। ये इतनी संख्या में थे कि बहुत कम लोग भाग सके। घर की छत गिर गई। दूल्हा दुल्हन, मिलारेपा के सभी सगे संबंधी सहित करीब 80 लोग इस घटना में मारे गए। कहीं-कहीं मरने वालों की संख्या 35 बताई गई है। संख्या चाहे जो तो पर इस में मरने वालों में निर्दोष लोग भी थे, बच्चे और बूढ़े भी थे।
मिलारेपा का तांत्रिक से योगी बनना
चाचा-चाची, उनके बच्चे, अपने सभी संबंधियों और पड़ोसियों को मारने के बाद मिलारेपा को लगा था कि उनका बदला अब पूरा हो चुका था और अब उन्हें शांति मिलेगी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उनका मन और अपराध बोध से ग्रसित हो गया। अब उन्हें संपत्ति की कोई चाह नहीं रही। लोग जानते थे कि यह सब मिलारेपा का ही काम था लेकिन वे कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से मिलारेपा वहाँ नहीं थे। अब लोग उनसे डरने लगे और कुछ नफरत करने लगे। उनकी शक्ति का सबको पता चल चुका था। स्वयं अनुपस्थित रह कर प्रतिशोध लेने का उनका मकसद पूरा हो चुका था जिसके लिए उन्होने इतने दिनों तक कठोर साधना किया था। फिर भी उनका मन शांत और खुश नहीं हो पा रहा था।
मिलारेपा ने गाँव छोड़ कर शांति की तलाश में यात्रा शुरू कर दिया। वे कई मठ और विहार भी गए। इसी समय उन्हें एक लामा मिले जिनहोने उन्हे समझाया कि असली शक्ति काले जादू और तंत्र विद्या नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना से मिलती है। वही शक्ति सदा स्थिर रहने वाली और मन को आनंद देने वाली होती है।
मिलारेपा ने अब आध्यात्मिक साधना करने का विचार किया। वे इसके लिए गुरु खोजने लगे। किसी ने उन्हें योग्य गुरु के रूप में उस समय मर्पा लोचावा का नाम सुझाया।

गुरु द्वारा कठिन परीक्षा लेना
मिलारेपा ने निश्चय कर लिया कि वह मर्पा लोचावा से ही दीक्षा और शिक्षा लेंगे। मर्पा लोचावा उस समय तिब्बत के सबसे सम्मानित धर्मगुरु, महासिद्ध योगी और शिक्षक थे। इनका गहरा संबंध भारत से भी था। भारत के सिद्ध योगी नरोपा इनके गुरु थे।
मिलारेपा गुरु मर्पा लोचावा के निवास स्थान, जो कि लोडग स्थान पर डोवोलूड विहार में था, वहाँ गए। गुरु से वह जब पहली बार मिले तब उसे पहचान नहीं पाए क्योंकि वह एक साधारण किसान की तरह खेत में काम कर रहे थे। फिर भी उनकी बात मानते हुए खेत में काम किया। गुरु ने जब देखा कि अपने ही लोगों का हत्यारा उनसे शिक्षा लेने आया है तब वह उन्हें आसानी से अपना शिष्य नहीं बनाने के लिए तैयार हुए। लेकिन मिलारेपा की एक बात ने उन्हें प्रभावित भी किया। मिलारेपा ने उनसे कहा “मैं अपना शरीर, वाणी और मस्तिष्क आपको अर्पित करता हूँ, इसके बदले मुझे भोजन, आश्रय और धर्म का ज्ञान दीजिए।“ साधारणतः लोग कहते थे “मैं अपनी आत्मा आपको अर्पित करता हूँ।“ जबकि आत्मा पर तो हमारा कोई वश ही नहीं होता है। पर मिलारेपा ने वही चीजें अर्पित करने के लिए कहा जो उसके नियंत्रण में था। अतः गुरु ने पहले परीक्षा लेकर उन्हें पाप मुक्त करने का फिर शिक्षा देना का विचार किया।
पहली परीक्षा यह कि अगर वह शिक्षा देते तो रहने और खाने का प्रबंध उन्हें स्वयं करना होता। मिलारेपा मान गए और बोरी लेकर भीख मांगने के लिए लोडग नगर में निकल गए। जब इतना अन्न हो गया कि उनके पूरे शिक्षा काल का कम उनसे चल जाता तब वह गुरु के पास लौट आए। गुरु ने उनसे अनाज की वह बोरी रखने के लिए कहा लेकिन भारी होने के कारण मिलारेपा के हाथ से छुट कर वह गिर गया। इस पर गुरु ने उन्हें बहुत बुरा भला कहा।
दूसरी परीक्षा इससे भी कठिन थी। गुरु ने शिक्षा देने से पहले मिलारेपा से अपने पुत्र के लिए एक गोल घर बनाने के लिए कहा। साथ ही शर्त यह भी रख दी कि इस कार्य में वह किसी की सहायता नहीं लेंगे। पत्थर काटने, लाने और लगाने का सारा काम मिलारेपा को अकेले ही करना था। उन्होने बिना कुछ बोले इस आज्ञा का पालन किया। घर जब लगभग बन गया और मिलारेपा गुरु को दिखाने ले गए तब गुरु ने बड़ा ही आश्चर्यजनक बात कही। उन्होने कहा घर तोड़ दो और पत्थरों को जहां से लाए तो वहीं पहुंचा आओ। मिलारेपा ने बिना कुछ बोले चुपचाप स्वीकार किया।
गुरु ने अब फिर से एक तिकोना घर बनाने के लिए कहा। मिलारेपा ने वैसा ही घर बनाना शुरू किया। लेकिन फिर जब घर पूरा होने ही वाला था तब गुरु ने उसे तोड़ कर पत्थरों को वापस अपने स्थान पर रख देने के लिए कहा।
गुरु की पत्नी को मिलारेपा से शुरू से ही सहानुभूति थी। उसे अपने पति का व्यवहार बहुत अधिक कठोर लगा। उन्होने पति से एकांत में कहा कि अब और परीक्षा नहीं लीजिए और उसे शिक्षा दे दीजिए। लेकिन गुरु बोले कि वह चाहते हैं कि मिलारेपा अपने पुराने पापों से पूरी तरह शुद्ध हो जाए तभी वह उनकी शिक्षाओं का अधिकारी होगा।
गुरु ने तीसरी बार फिर से एक नया घर बनाने के लिए कहा। इस समय तक मिलारेपा की उम्र हो चली थी। पत्थरों को काटने और ढ़ोने से उसकी गर्दन, हाथ और पैरों में अनेक घाव और छाले पड़े हुए थे। लोगों से मांग कर लाए हुए अनाज खतम होने वाले थे। लेकिन फिर भी मिलारेपा ने बिना कुछ कहे इतने तकलीफ़ों के बावजूद गुरु की आज्ञा मान कर घर बनाना शुरू किया। तीसरे घर को भी हालांकि गुरु ने तुड़वा दिया लेकिन इसके बाद वह शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए।
योग की शिक्षा और आध्यात्मिक साधना
गुरु ने मिलारेपा को पहले आध्यात्मिक मार्ग की कठिनाइयाँ बताया। लेकिन वह अपने निश्चय पर अड़े रहे। अंतत: गुरु मर्पा लोचावा ने उन्हें आध्यात्मिक साधना का तरीका सिखाया। गुरु के बताए हुए तरीके से वह अनेक साधना के बाद उन्होने लोडग तग्न की गुफा में ग्यारह महीने तक एकांत में साधना किया। माना जाता है कि यहीं उन्हें ईश्वर के दर्शन हुए और उनकी साधना पूरी हुई। इसी साधना के बाद उन्होने अपना पहला गीत गाया।
इसके बाद कुछ वर्षों तक और वह गुरु के पास लोडग में रहे। फिर उनसे आज्ञा लेकर अपने गाँव लौट आए।
मिलारेपा का अपने गाँव वापस आना
गुरु की आज्ञा लेकर वह जब अपने गाँव लौटे तब तक उन्हें गाँव से गए हुए आठ वर्ष बीत चुके थे। इन आठ वर्षों में उनकी माँ का देहांत हो चुका था। अकेली बची बहन की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वह भीख मांगने लगी। भीख मांगते वह कहीं चली गई। उसके बारे में फिर कुछ पता नहीं चल सका।
मिलारेपा को जीवन और दुनिया के सारहीन प्रतीत होने लगा। उन्होने घर छोड़ दिया और गाँव के पास के ही एक गुफा में जाकर फिर से कठोर तपस्या करना शुरू किया। यहाँ उन्हें और कई सिद्धियाँ मिली। जिनमें अपने इच्छा अनुसार शरीर परिवर्तित करना, आकाश में चलना आदि शामिल था। उनके इन सिद्धियों का पता गाँव वालों को उस समय चल गया जब कुछ लोगों ने उन्हें आकाश मार्ग से चलते हुए देख लिया। धीरे-धीरे लोग उनके पास आने लगे।
लेकिन मिलारेपा को अब लोक मान्यता की कोई चाह नहीं थी। इसलिए वे अब गुरु के बताए छुअर गुफा में तपस्या करने लगे।
मिलारेपा के गीत
मिलारेपा ने अपने जीवन काल में एक हजार गीतों की रचना की जिन्हें ‘मिलारेपा के सहस्त्र गीत’ कहा जाता है। उन्होने अनेक ग्रन्थों का अनुवाद भी किया।
कैलाश शिखर पर चढ़ना
अपने गीतों, तपस्या और सिद्धियों के कारण मिलारेपा की चर्चा सारे तिब्बत में होने लगी। दूर-दूर से विद्वान और सिद्धि प्राप्त योगी उनसे मिलने और शास्त्रार्थ करने आने लगे। इनमें से कुछ ऐसे लोग भी थे जो उनसे ईर्ष्य रखते थे। ऐसा ही एक व्यक्ति था नारो बॉन चुंग। इसी के कारण मिलारेपा कैलाश शिखर पर चढ़े थे।
हुआ यह कि नारो बॉन चुंग ने उनसे मिलने आया और उन्हें कैलाश के शिखर पर चढ़ने की चुनौती देने लगा। मिलारेपा इस चुनौती के लिए बहुत उत्सुक नहीं थे। उसके और लोगों के बार-बार कहने पर जाने के लिए तैयार हो गए। निश्चित समय पर मिलारेपा और नारो बॉन चुंग शिखर के आधार के पास पहुंचे। और भी बहुत से लोग वहाँ जमा हुए। यात्रा शुरू करने की घोषणा होते ही नारो बॉन चुंग तेजी से शिखर की तरफ चल पड़ा क्योंकि वह अपने को मिलारेपा से बड़ा साधक और योगी साबित करना चाहता था। लेकिन मिलारेपा कुछ देर वहीं ध्यान करते हुए बैठ गए। ध्यान से उठने के बाद उन्होने चढ़ाई शुरू की।
लोगों ने देखा कि नारो बॉन चुंग जो कि शिखर के पास पहले पहुँच गया था वह एक जगह रुक गया। और फिर उतर गया। लेकिन मिलारेपा बिना किसी बाधा के आराम से शिखर तक चढ़ गए। पर वह वहाँ ज्यादा देर रुके नहीं। कुछ देर में ही वह नीचे आ गए।
नीचे लोगों के पूछने पर नारो बॉन चुंग ने बताया कि जब वह शिखर के पास पहुंचा और सूर्य की किरण उस पर पड़ने लगी तब उसे बहुत बेचैनी होने लगी। उसे लगने लगा जैसे उसे वहाँ नहीं रहना चाहिए। उसी इतनी बेचैनी हुई कि शिखर के पास पहुँच कर भी वह ऊपर चढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाया और लौट आया। जबकि मिलारेपा ने केवल इतना ही कहा कि वह जब ऊपर चढ़े तो उन्हें लगा जैसे उन्होने किसी की तपस्या भंग कर दी हो। उन्होने कहा किसी की तपस्या भंग करना सही नहीं है इसलिए किसी को इस पवित्र पर्वत शिखर पर नहीं चढ़ना चाहिए। अपने पूरे जीवन में उन्होने इस चढ़ाई के बारे में कोई बात नहीं की, कोई भी गीत इस पर नहीं लिखा।
मिलारेपा की मृत्यु
किसी ईर्ष्यालु पुजारी द्वारा जहर देने से चौरासी वर्ष की आयु में 1134 में मिलारेपा की मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उस पुजारी ने जिस स्त्री को हीरों का हार देने और शादी करने का वचन देकर दहि में जहर डाल कर उन्हें खिलाने भेजा था उसे देखते थी मिलारेपा ने सबके सामबे कहा कि शादी तो वह तुमसे करेगा नहीं, इसलिए मुझे खिलाने से पहले वह हीरों की हर ले आओ। यह सुन कर वह पुजारी और महिला दोनों आश्चर्य में पड़ गए। पुजारी ने महिला को हीरों का हार दे दिया। लेकिन महिला रोने लगी और मिलारेपा से क्षमा मांगते हुए जहरीला दही नहीं खाने के लिए कहने लगी। पर मिलारेपा ने यह कहते हुए उसे खा लिया कि अब उनका समय पूरा हो चुका है।
मिलारेपा को तिब्बत और बौद्ध धर्म में बहुत सम्मान दिया जाता है। उन पर अनेक कलाकृतियाँ बनी हैं, अनेक मठ में उनकी मूर्तियाँ हैं। आधुनिक काल में उन पर कई फीचर फिल्म और डॉकयुमेंट्री बनी हैं। तिब्बत के बाहर के लोग उन्हें विशेष रूप से इसलिए जानते हैं कि वह कैलाश पर चढ़ने वाले अभी तक के एकमात्र व्यक्ति हैं। लेकिन यह भी सही है कि चढ़ने के बाद उनकी प्रतिक्रिया और चुप्पी के कारण यह विश्वास और दृढ़ हो गया कि इस शिखर पर वही चढ़ सकता है जो पूर्णत: निष्पाप हो और जिसकी आध्यात्मिक शक्ति बहुत उच्च स्तर की हो। ऐसे असाधारण लोग ‘पंछी की तरह’ इस पर चढ़ जाएंगे लेकिन सामान्य मनुष्यों के लिए इन पर चढ़ना असंभव है। क्योंकि इस क्षेत्र में सक्रिय दैवीय शक्तियाँ उन्हें रोक देगी।

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