श्रीराम ने मारीच और सुबाहु से युद्ध क्यों किया और मिथिला क्यों गए?- part 8

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राम-लक्ष्मण पिता की आज्ञा से ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा करने के लिए आए थे। रास्ते में उन्होने ताड़िका का वध किया और ऋषि ने उन्हें अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और विद्या दिया। ऋषि उन्हें उनकी पिता से केवल 10 दिनों के लिए मांग कर लाए थे। लेकिन यज्ञ सम्पन्न होने के बाद वे दोनों भाइयों और अन्य कुछ शिष्यों के साथ मिथिला गए। मिथिला यात्रा के क्रम में राम ने अहल्या को शापमुक्त किया। मिथिला में ही चारों भाइयों का विवाह हुआ। 

विश्वामित्र के अनुष्ठान का सम्पन्न होना

राम-लक्ष्मण के साथ अपने आश्रम में पहुँच कर विश्वामित्र ने पुनः यज्ञ की दीक्षा ले ली और मौन धारण कर लिया। सिद्धाश्रम वर्तमान बिहार के बक्सर जिला में स्थित है।

उनके शिष्य कौशिक मुनि के निर्देशानुसार दोनों भाई छह दिन और छह रात तक लगातार यज्ञ की रक्षा करते रहे। इस बीच उन्होंने नींद भी नहीं ली।

मारीच को सौ योजन दूर फेंकना 

छठे दिन जब दोनों भाई यज्ञ स्थल की रखवाली कर रहे थे, मारीच और सुबाहु अपने अनुचरों के साथ आ पहुँचे। राम ने लक्ष्मण से यह यह कहते हुए कि “ऐसे कायरों को मैं मारना नहीं चाहता” अपने धनुष से शितेषु नामक मानवास्त्र अस्त्र चलाया। शितेषु बिना नोक के तीर की तरह का था। यह तीर मारीच की छाती में लगा। इसमें इतना अधिक वेग था कि मारीच सौ योजन दूर समुद्र में जा गिरा। यही मारीच आगे चल कर सीता-हरण के समय माया मृग बना था। उसकी माँ राक्षसी ताड़िका को आश्रम आते समय रास्ते में ही राम मार चुके थे।             

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सुबाहु और अन्य राक्षसों का वध

इसके बाद राम में फुर्ती से सुबाहु की छाती पर आग्नेय अस्त्र चलाया। सुबाहु मर कर जमीन पर गिर पड़ा। उन्होने वायव्य अस्त्र से अन्य राक्षसों का भी संहार कर दिया। इसके बाद ऋषियों ने प्रसन्नता पूर्वक अपना अनुष्ठान और यज्ञ पूरा किया।

राम-लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ मिथिला जाना

यज्ञ सम्पन्न होने के अगले दिन विश्वामित्र ने राम-लक्षमण से मिथिला राज्य में होने वाले यज्ञ के विषय में बताया और उन्हें भी अपने साथ चलने के लिए कहा। उन्होने वहाँ जनक जी के अद्भुत धनुष के विषय में भी बताया जिसके दर्शन इस यज्ञ में जाने पर होते।

विश्वामित्र राम-लक्ष्मण और अनेक ऋषियों के साथ मिथिला के लिए चले।    

रास्ते में पड़ने वाले स्थान, आश्रम, देश, नदी इत्यादि के विषय में राम जिज्ञासा करते और विश्वामित्र उनका उत्तर देते हुआ समस्त प्रसंग बताते। गंगा का पृथ्वी पर आना, क्षीर सागर मंथन, दिति की तपस्या इत्यादि अनेक प्रकरणों को रास्ते में विश्वामित्र ने इसी तरह सुनाया।

मिथिला पहुँचने से एक रात पहले वे सब विशाला नगरी के राजा सुमति के आतिथ्य में रहे। अगले दिन सब मिथिला राज्य की सीमा में पहुँचे। मिथिला की शोभा की सबने प्रशंसा किया।

अहल्या को शाप मुक्त करना

मिथिला नगर के बाहर उपवन में उन्हे एक रमणीय लेकिन सुनसान पुराना आश्रम दिखा। यह ऋषि गौतम का आश्रम था। यहाँ उनकी शापग्रस्त पत्नी अहल्या अभी भी राम की प्रतीक्षा कर रही थी। विश्वामित्र ने अहल्या के शाप की कथा राम को सुनाया। विश्वामित्र ने सारा वृतांत सुनाने के बाद राम से अहल्या के उद्धार के लिए कहा। राम ने ऐसा ही किया।

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अहल्या के आश्रम से निकल कर वे सभी मिथिला नगर पहुँचे। इस तरह राम-लक्ष्मण यद्यपि प्रकट रूप से ऋषि विश्वामित्र द्वारा उनके यज्ञ और अनुष्ठान की रक्षा के लिए लाए गए थे। लेकिन इस यात्रा में उन्होंने और कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

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